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इन्द्र और महाभारत के पाँच पाण्डव

by रंजना सिंह
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संसाधनों के स्वामी इन्द्र से साँठगाँठ करके तक्षक ने सम्पूर्ण खाण्डवप्रस्थ को अपने अधिकार में कर लिया था।मायावी मय दानव की माया का बल था ही उसके पास…निश्चिन्त होकर पूरे प्रदेश को जिसमें इन्द्रप्रस्थ बनने की संभावना थी,उसने विषैला उजाड़ बंजर बना दिया था।उसके घर के अतिरिक्त इन्द्र कहीं वर्षा का जल न दे, उसके अनुयायियों तक पहुँचे तो केवल अन्धकार(अज्ञान), नकारात्मकता का विष,सामर्थ्यवान होते हुए भी असुरक्षा की भावना, आक्रामकता, हिंसा…और “यही सब सुख है”की प्रतीति ऐसी व्यवस्था थी तक्षक की।

पाँच पाण्डवों ने उन्हें प्रस्ताव दिया कि वे उनके जीवन को इस अन्तहीन अन्धकार से मुक्त कर देंगे,उन्हें स्वतन्त्रता सम्मान, समान अवसर,विकास सब देंगे,,बस उन्हें और उनके मुट्ठी भर भक्तों(जो अपना बसा बसाया घर बार छोड़कर धर्म के शासन में रहने को पाण्डवों के साथ हस्तिनापुर से चले आये थे)का वहाँ का बास वे स्वीकार कर लें,,क्योंकि वह भूमि तो असल बास पीढ़ियों से उन्हीं का था।वह तो नागों के उत्पातों से क्षुब्ध होकर उनके वंसजों ने उस भूमि से अपना वास समेट लिया था।किन्तु नाग नहीं माने।सह अस्तित्व में उनका विश्वास कतई न था, प्रकाश और सुव्यवस्था, धर्म और करुणा ही उन्हें विषमय लगती थी।

तब पाण्डवों ने अपना अस्त्र उठाया और इन्द्र सहित सभी को धर्म के बल का परिचय दिया।अपने निश्चय और तप की अग्नि का विस्तार किया।सारे नाग झुलसने लगे उसमें।स्वीकारना ही पड़ा उन्हें कि सबके लिए उपलब्ध संसाधनों पर एकाधिकार का उनका दम्भ उस अग्नि के सम्मुख टिक नहीं पायेगा।तक्षक ने अपने सम्पूर्ण विष को अपने अन्दर समेटकर नागों को मुक्त किया जिनमें से अधिकांश अन्दर ही अन्दर विष रखते हुए भी पाण्डवों के विकास के सहभागी बनने, लाभ पाने को प्रस्तुत थे।

और फिर अन्धकामय बंजर उजाड़ निर्जन उस खाण्डवप्रस्थ को पाण्डवों ने उन्हीं दानवों,नागों और धर्मप्रवण हस्तिनापुर त्यागे नागरिकों के सहयोग से इन्द्रप्रस्थ बना दिया, जिसके ऐश्वर्य की तुलना में स्वर्ग भी बहुत छोटा था। क्या यह केवल पुराण कथा लगती है आपको???सारे पात्र,सभी परिस्थितियाँ आज भी लगभग वैसी ही नहीं हैं??? संसाधनों पर अधिकार कुछ ही लोगों का हो, जिनमें अंधकार प्रसारित करने की सर्वाधिक क्षमता हो सत्ता सदैव उनकी ही मुट्ठी में हो,उनके अहंकार की तुष्टि प्रतिपल होती रहे, लोग उनसे भयभीत रहें,,यदि सत्ता पर उनकी पकड़ ढ़ीली हो तो दुरभिसधियाँ करने लगें, अपने लोगों के भी वास्तविक कल्याण से उन्हें कोई मतलब न हो,स्वयं का तथा अपने अनुयायियों का विष पोषित करना ही उनके जीवन का लक्ष्य और सुख हो…अर्थात तक्षक के सभी गुण और संस्कार,,कुछ लोगों में पूर्णतः परिलक्षित होते नहीं दीखते आपको??

वास्तव में यह युद्ध पाप,अंधकार,हिंसकों और धर्म(मानवता) में आस्था रखने वालों के बीच है।अनन्त काल से देव् दानव, असुर मानव के मध्य अनवरत चला आ रहा है और प्रवृत्तिनुसार जनसाधारण भी अपना पक्ष चुन लेते हैं।यह अवश्य है कि धर्म के कठिन व्रत को निभाने का आत्मबल कम लोगों में होता है इसलिए पाण्डव पाँच और कौरव सौ हुआ करते हैं,,, किन्तु उद्धारक कृष्ण भी सदैव पाण्डवों के पक्ष में ही रहकर उन्हें अधिकाधिक तपा कर ऐसा वज्र अवश्य बना देते हैं जो पाँच होते हुए भी सहस्त्रों को मिटाकर अन्ततः धर्म की स्थापना कर ही देते हैं।

चित्र देखिए,इसपर टिप्पणी पढ़िए,,क्या आपको दम्भी तक्षक का स्मरण नहीं हो रहा? नहीं हो रहा तो निश्चित मानिए कि आप तक्षक के गहन अंधकार के प्रभाव में हैं,,आपके पास विष ही विष है और मजे की बात कि विष ही आपको सुख लग रहा है। बाकी वह गेरुआधारी और उसके भक्त सचमुच के कुशल सँपेरे तो हैं, बिलों से बड़े से बड़े नागों को हाथ डालकर पकड़कर घसीटकर बाहर निकाल रहे हैं।सफल होंगे कि नहीं,यह तो ईश्वर के हाथ है, किन्तु धर्मपथ पर अडिग अपना कर्तब्य निभा रहे,इसमें कोई सन्देह नहीं।अतः भक्ति तो हम इन्हीं की करेंगे,तक्षकों को हम नहीं पूज सकते,,भले शेषनाग और वासुकि हमारे पूज्य हैं,क्योंकि वे उनकी शरण में हैं जिन्होंने जीवमात्र का संरक्षण करने का दायित्व लिया है।

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