Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय ‘‘कचहरी तो बेवा का तन देखती है

‘‘कचहरी तो बेवा का तन देखती है

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‘‘कचहरी तो बेवा का तन देखती है, खुलेगा कहां से बटन देखती है।’’ तथ्य से वाकिफ होते हुए भी वह तब अपने को राम की भूमिका में पाता और समूची व्यवस्था को रावण की भूमिका में। वह ‘‘धर्मयुद्ध’’ के नशे में यह भूल गया कि हाईकोर्ट भी न्याय का घर नहीं, रावण ही का घर है। वह घर जहां कोई विभीषण भी नहीं होता कि जिस से पूछ कर वह रावण की नाभि में बाण मार दे। दूसरी तरफ उस के पास कोई हनुमान भी नहीं था जो उस अन्याय की नगरी हाईकोर्ट को जला देता। वह तो धर्मयुद्ध के नशे में था और बिल्ली की भूमिका में बाघ से लड़ रहा था यह गाते हुए कि, ‘‘लड़ाई है दिए की और तूफान की।’’ बिन यह जाने कि उस की जिंदगी में अब एक नया तूफान बसने वाला है और कि वह दीया नहीं आदमी है। दीया बुझ जाने पर कोई उसे फिर जला देता है, तूफान से ओट कर बचा लेता है। पर जब आदमी बुझता है तो कोई उसे जलाता नहीं, उस पर थूक देता है।
हाईकोर्ट जो रावणों का घर है। जहां हर जज, हर वकील रावण है। न्याय वहां सीता है और कानून मारीच। जैसे रावण अपने मामा मारीच को आगे कर सीता को हर ले गया ठीक वैसे ही हाईकोर्ट में जज और वकील कानून को मामा मारीच बना कर न्याय की सीता छलते हैं। ‘‘राम’’ को हिरन की तलाश में भटकाते हुए न्याय की सीता को हर लेते हैं। क्या तो अपना-अपना इंटरप्रेटेशन है ! लॉ का एक प्रोसिजर है ! तिस पर तुर्रा यह कि ‘‘वादकारी का हित सर्वोच्च होता है।’’ पर वास्तविकता यह है कि वादकारी राम बना मारीच के पीछे-पीछे भागता रहता है और थक-हार कर वापस आता है ! तो पाता है कि सीता यानी न्याय का हरण हो गया है। फिर वह व्यक्ति राम की तरह ‘‘तुम देखी सीता मृगनयनी’’ कहता हुआ यहां-वहां तारीख़ों के मकड़जाल में भटकता रहता है। फिर भी जैसे राम को भी पता था कि मृग सोने का नहीं होता, फिर भी सीता के कहे पर पीछे-पीछे भागे वैसे ही हाईकोर्ट का ‘‘राम’’ भी जानता है कि कानून न्याय के लिए नहीं होता फिर भी वह उस के पीछे-पीछे भागता है। न्याय पाने की आस में। ऐसा भी नहीं कि न्याय वहां नहीं मिलता। न्याय मिलता भी है पर राम को नहीं। रावण को और उस के परिजनों को। हत्यारों, डकैतों को जमानत मिलती है। हां, राम को तारीख़ मिलती है !
तो तारीख़ों के तंत्र से बेख़बर संजय ऐसे मारा-मारा फिरता, जैसे रोशनी की तलाश में पतंगा दीए के आगे पीछे घूमता है और मारा जाता है। दूसरों को सलीका सिखाने वाले संजय को लगता था कि वह एक नई राह गढ़ने वाला है। उसे यह नहीं पता था कि वह नई राह गढ़े न गढ़े किसी राह के गड्ढे में खुद को औंधा जरूर पाएगा।
लेकिन अभी तो शुरुआत थी।
शुरुआती दौर में उस ने लड़ाई लगभग जीत ली थी। अंतरिम आदेश उस के पक्ष में था। अब अलग बात है कि अंतरिम आदेश झुनझुना ही साबित हुआ। पर तब तो वह कहता था कि देश में न्याय तो है। लेकिन इस न्याय को अन्याय में बदलते ज्यादा देर नहीं लगी। वह तारीख़ों के तंत्र में टूटता-फूटता जड़ होता गया। डिप्रेशन का दंश उसे और हीन बनाता। वह घर लौटता तो सोचता कि वह इस नपुंसक न्याय व्यवस्था का क्या करे ? सोचते-सोचते वह यह भी सोचता कि वह कहीं खुद भी तो नपुंसकता की राह नहीं चल पड़ा ! लेकिन जब वह कई और दूसरों को देखता; निर्धन, दबे कुचले और असहाय लोगों को जब हाई कोर्ट के बरामदे में आस की रोशनी के लिए भागते देखता, उसे जैसे थोड़ी देर के लिए आक्सीजन मिल जाती। जब यह सारे लोग अगली तारीख़ों पर आने की बात करते, लगता जैसे वह रेगिस्तान में भटक रहे हैं। चुल्लू भर पानी के लिए जल के रेत में मर रहे हैं। लेकिन वकीलों और न्यायमूर्तियों की सेहत पर इन सब चीजों से शिकन तक नहीं आती। सैकड़ों आदमी उन की आंखों के सामने बरबादी के ढूह पर चढ़ते जाते और वह ‘‘मूर्ति’’ बने न्याय की प्रोसीडिंग का कहवा पिला देते।
संजय को अकसर एक बूढ़ी महिला हाई कोर्ट के बरामदे में रोती मिल जाती। उस की तकलीफ यह थी कि वह एक तो विधवा थी, दूसरे कोई बीस साल मुकदमा लड़ने के बाद अपने मकान का मुकदमा जीती थी। लेकिन चार साल से उस के मकान पर गुंडों ने कब्जा कर रखा था। लेकिन हाई कोर्ट अपने आदेश का अनुपालन कराने में अक्षम था। गुंडे उस के मकान पर कब्जा भी किए थे और धमकाते भी थे। उस ने न्यायमूर्ति बने कई मूर्तियों से यह बात कही थी, लेकिन मूर्तियां तो जैसे पत्थर की थीं, सब कुछ अनसुना कर देती थीं। वह बूढ़ी महिला इतनी आहत हुई कि एक दिन भरी अदालत में उस ने अपनी जीत के फैसले का कागज जला दिया और ख़ुद भी जलने को उद्धत हो गई। न्याय मूर्तियों का न्याय देखिए कि अपने ही आदेश का अनुपालन करवा पाने में अक्षम उस बूढ़ी महिला को दोषी करार दे दिया और उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया। संजय यह देख कर दहल गया।
वह सोचता यह कौन-सी राह है ?
वह सोचता रहता अदालतों की किसी बेंच पर बैठा न्यायमूर्तियों के ‘‘मूर्ति’’ में तब्दील होते जाने के ख़तरों से विवश। पहले वह सुनता था कि कोई पोस्ट कार्ड पर लिख कर अपना दुखड़ा भेजता था तो न्यायमूर्ति लोग उसे ही याचिका मान कर उस पर फैसला दे देते थे। और वह यहां देखता कि पोस्ट कार्ड की कौन कहे, याचिकाओं पर ही सुनवाई के लिए न्यायमूर्तियों के पास समय नहीं होता। वकीलों की दलाली, अपराधियों का गठजोड़ और धनपशुओं का बोलबाला जैसे हाई कोर्ट का अविभाज्य अंग बन चुका था। और उस दिन तो संजय की आंखें खुली की खुली रह गईं जब एक काफी बड़े वकील ने उस से पूछा, ‘‘आप पढ़े लिखे आदमी हैं ?’’ संजय ने जब ‘‘हां !’’ कहा तो वह वकील बोले, ‘‘तो फिर आप यहां क्या कर रहे हैं ? हाई कोर्ट कोई पढ़े लिखों की जगह नहीं है।’’ लेकिन संजय फिर भी बिदका नहीं उसे तो अगली तारीख़ पर अपनी विजय पताका फहराती दिखती थी। और ऐसा सपना संजोने वाला संजय कोई अकेला नहीं था, सैकड़ों-हजारों लोग थे। इन सैकड़ों हजारों लोगों का अपराध सिर्फ इतना था कि वह कहीं न कहीं अन्याय के शिकार हुए थे और न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे।
रामकेवल ऐसे ही लोगों में से एक था। कोई आठ साल से अपनी नौकरी का मुकदमा लड़ रहा था। वह मुकदमा जीत चुका था लेकिन हाई कोर्ट के आदेशों का अनुपालन नहीं हो रहा था। रामकेवल जब सुबह हाई कोर्ट में मिलता तो उस के चेहरे पर दिवाली की दमक होती। पूरा दिन निकल जाता, उस की अवमानना याचिका की सुनवाई का नंबर ही नहीं आता। उस के चेहरे पर लगता किसी ने पचासों जूते मारे हों। लेकिन वह कहते हैं न कि ‘‘आंखों में नमी, हंसी लबों पर’’ ऐसी ही स्थिति रामकेवल के चेहरे पर होती। वह फिर अगली तारीख़ के लिए पेशकार के फेरे लगाता, चढ़ावा चढ़ाता और कहता, ‘‘अगली तारीख़ पर तो फाइनल हो ही जाएगा।’’ और एक दिन हुआ यह कि रामकेवल एक अदालत में बैठे-बैठे खुद ही ‘‘फाइनल’’ हो गया। इस बात की सुधि किसी न्यायपूर्ति ने नहीं ली, न ही उस के वकील ने। ली तो पेशकार ने। पेशकार सब से आखि़र में चिल्लाया, ‘‘रामकेवल तुम भी अपनी तारीख़ ले लो।’’ पेशकार यह नहीं जानता था कि रामकेवल अब ख़ुद तारीख़ बन चुका है। वह तो समझा कि रामकेवल सो गया। उस ने उसे पास जा कर झिंझोरा। रामकेवल जब गिर पड़ा तब पेशकार की समझ में आया कि रामकेवल की तारीखे़ं पूरी हो चुकी हैं। अब उस को न ‘‘अनलिस्टेड’’ की जरूरत है और न ही ‘‘नेक्स्ट काजलिस्ट’’ की।
संजय तब भीतर तक हिल गया। बिना कोई तारीख़ लिए वह घर चला गया। बहुत दिनों तक वह फिर हाई कोर्ट जाने से कतराता रहा। पर धीरे-धीरे न्याय पाने का कीड़ा उस के भीतर फिर से कुलबुलाने लगा। रामकेवल का हश्र हाशिए पर रख कर वह एक दिन फिर से अपने वकील के चैंबर में बैठा तारीख़ पाने के लिए अप्लीकेशन लिखवा रहा था। इस तरह हाई कोर्ट एक बार फिर वह जीने जा रहा था। हाई कोर्ट जीने जा रहा था कि अपने ही को छलने जा रहा था ? उस के लिए तुंरत-तुरंत यह समझ पाना मुश्किल था।
मुश्किल ही था उस के लिए न्याय पाना भी। लेकिन मोती बी॰ ए॰ के उस भोजपुरी गीत को गुनगुनाता हुआ कि, ‘‘रेतवा बतावे नाईं दूर बाड़ैं धारा, तनी अऊरो दऊर हिरना पा जइब किनारा।’’ संजय हाई कोर्ट के गलियारों की गंध एक बार फिर अपने नथुनों में भरने लगा। तारीख़ों की कील से दिल दिमाग और पावों को छीलता हुआ, न्यायमूर्तियों की मूर्तियों से अपने मन को मारता हुआ, न्याय की आस में हांफता हुआ संजय एक नया ही संजय बनता जा रहा था। बारिश में भींगता हुआ, सर्दी में गलता हुआ और धूप में तपता हुआ, आते-जाते मौसम की मार खाता वह अब न्यायमूर्तियों के सामने जब तब खुद अपने मामले की पैरवी करने लगा था। हालां कि न्यायमूर्तियों की मूर्तियां उस की बातों की परवाह नहीं करतीं पर वह जूझ-जूझ जाता। वह जब पढ़ता था तो कहीं पढ़ा था कि किसी देश के लिए सेना से भी ज्यादा जरूरी न्यायपालिका होती है।
पर क्या ‘बेल’ पालिका में तब्दील हो गई यह नपुंसक न्यायपालिका ?
जो अपने ही आदेश न मनवा सके। आदमी आदेश ले कर झुनझुने की तरह बजाता घूमता रहे और कोई उस आदेश को मानना तो दूर उस की नोटिस भी नहीं ले। एक डी॰ एम॰ बल्कि उस से भी छोटा उस का एस॰ डी॰ एम॰ क्या तहसीलदार भी कोई आदेश करे तो उस का अनुपालन तुरत हो जाए। पर हाई कोर्ट के जज का आदेश रद्दी की टोकरी में चला जाए। तो ऐसे में न्यायपालिका के औचित्य पर प्रश्न उठ जाना सहज ही है। फिर सेना से ज्यादा जरूरी न्यायपालिका कैसे हो सकती है ? कि एक छोटा सा प्रशासनिक आदेश तुरत फुरत मान लिया जाता है पर न्यायपालिका के आदेश को कोई आदेश ही मानने को तैयार नहीं होता। बल्कि कई बार तो बिना आदेश का अनुपालन किए उस आदेश की वैधता को ही चुनौती दे दे जाती है। इस चुनौती का निपटारा भी जल्दी करने के बजाय न्याय मूर्तियों की मूर्तियां मुसकुरा-मुसकुरा कर तारीख़ों की तरतीब में उलझा कर रख देती हैं। फिर झेलिए स्पेशल अपील बरास्ता सिंगिल बेंच, डबल बेंच, और फुल बेंच। आप अदालतों की बेंचों पर बैठे-बैठे कमर टेढ़ी-सीधी करिए और ये ‘‘बेंचें’’ आप को तारीखे़ं देंगी। आप कहते क्या चिल्लाते रहिए कि देर से मिला न्याय भी अन्याय ही है। पर इन न्यायमूर्तियों की कुर्सियों को यह सब सुनाई नहीं देगा। सुनना भी चाहेंगे तो अपोजिट पार्टी के वकील का जूनियर खड़ा हो कर कहेगा कि, ‘‘माई लार्ड हमारे सीनियर बीमार हैं। या कि फलां कोर्ट में पार्ट हर्ड में बिजी हैं।’’ भले ही सीनियर उसी कोर्ट के बाहर बरामदे में कुत्ते की तरह यह सूंघते हुए टहल रहा हो कि भीतर क्या घट रहा है।
संजय और उस के जैसे जाने कितने न्याय के भुखाए लोग इस ‘‘न्यायिक प्रक्रिया’’ के शिकार बने तड़पते घूमते रहते हैं। न्याय व्यवस्था के दोगलेपन पर एकालाप करते रहते हैं जिस-तिस से। पर कोई सुनता नहीं।
यहां तक कि चेतना भी नहीं।
चेतना संजय से कहती कि, ‘‘बाकी सारी बातें सुन सकती हूं, पर हाई कोर्ट की भड़ास नहीं।’’ इस पर संजय बिफर पड़ता, ‘‘यहां जिंदगी जहन्नुम हुई जा रही है और तुम इसे भड़ास कहती हो !’’ वह छूटते ही बोलती, ‘‘बिलकुल ! किस डाक्टर ने कहा कि हाई कोर्ट में मुकदमा लड़िए ? मैं तो कहती हूं कि अगर कोई डाक्टर कहे भी तो मुकदमा नहीं लड़ना चाहिए !’’ वह कहती, ‘‘कोई और बात करिए । यहां तक कि जहन्नुम की बात करिए सुनूंगी। पर हाई कोर्ट और मुकदमे की नहीं। क्यों कि जहन्नुम एक बार सुधर सकता है। पर हाई कोर्ट नहीं। फिर जहन्नुम में कम से कम किसी शरीफ और भले आदमी को तो अकारण नहीं फंसना पड़ता। पर हाई कोर्ट में ?’’ वह बोलती, ‘‘अच्छा भला आदमी सड़ जाता है। जाता है न्याय मांगने और न्याय की रट लगाते-लगाते अन्याय के भंवर में डूब जाता है। और कोई बचाने नहीं आता।’’

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