Home राजनीति कोई नहीं आ पाएगा बचाने; अब ये बताओ आप क्या करेंगे?

कोई नहीं आ पाएगा बचाने; अब ये बताओ आप क्या करेंगे?

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एक अंग्रेजी शब्द है, rhetoric – जिसे वाक्पटुता कहा जाता है। लेकिन असल में समझा जाए तो यह होता है दूसरे को निरुत्तर करनेवाली बात करना, बोलती बंद करना।
यह कला भी होनी चाहिए, लेकिन यही कला पर्याप्त नहीं है सशस्त्र शत्रु से जान बचाने। यह तब ही काम आती है जब दोनों भी पक्ष तर्क में मानते हों।
बात यूं हुई, परसों एक ग्रुप में एक व्यक्तिने चिंता जताई कि हम युद्ध जैसे माहौल में हैं। मैंने कहा, हाँ, कई सालों से बता रहा हूँ, अभी स्थिति ये है कि इस बात को नकारनेवाले अब इसे नकार नहीं सकते।
उत्तर में उसने लफ्फाज लोगों का ऑल टाइम फ़ेवरीट प्रश्न पूछा – तो, संघ क्या कर रहा है ?
उसको शायद मुझसे ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी – घास छील रहा है। आप बताएँ, खुद को और अपने परिवार को बचाने के लिए आप क्या करेंगे ?
पूरा डिस्कशन मायने नहीं रखता, मूल मुद्दे पर आता हूँ।
हमारे लिए समझने का मुद्दा यही है कि हमारे लिए युद्ध का क्षेत्र हमारा मोहल्ला है। उसे आप मोहल्ला कहें, एरिया कहें, सेक्टर कहें, आप की मर्जी। उस क्षेत्र में जो मिनी पाकिस्तान बना है, वह अपना दायरा बढ़ाने के लिए आप से लड़ेगा। भेद, दाम और दंड से, बातें साम की करता रहेगा। हमारी खासियत यह है कि जब तक समस्या हम तक नहीं आती, हम समस्या को इग्नोर करते रहेंगे क्योंकि समस्या का सामना करने की कल्पना से हमें क्या क्या हो जाता है, इसलिए हम सब वे सवाल गढ़ लेते हैं कि बस सामनेवाले की बोलती बंद कर ली। और विजयी मुद्रा से सब की ओर देखते हैं कि वाहवाही सुनें।
भाई, जब तक सामनेवाला भी बात से ही काम ले रहा है तब तक ही उसकी बोलती बंद करने का मौका मिलेगा।
अस्तु, मुद्दे की बात इतनी है कि आप अपने क्षेत्र का मॅप देखें, कहाँ से कौन हमला कर सकते हैं यह देखें और उनसे कैसे लड़ा जा सकता है यह सोचिए। केवल यह मत सोचिए कि कैसे जान बचाई जा सकती हैं, क्योंकि जान बचाने का पूरा मौका मिलेगा ताकि आप भाग कर क्षेत्र छोड़ जाएँ और दूसरे क्षेत्र में अपनों पर बोझ बन जाएँ। यह भी शत्रु के लिए शस्त्र का ही काम करता है। शायद आप ने इस मुद्दे पर अब तक सोचा भी नहीं होगा, लेकिन जहां संसाधन सीमित होते हैं वहाँ शरणार्थी बोझ बनते हैं और उनसे ही लड़ाइयाँ शुरू होती हैं। इसलिए जान बचाने पर जोर न दे कर अपने क्षेत्र पर अपना कब्जा बनाए रखने की सोचें।
आप के क्षेत्र के मिनी पाकिस्तानियों का युद्ध क्षेत्र केवल आप का क्षेत्र होता है। उसकी एक सीमा होती है जहां दूसरे क्षेत्र के मिनी पाकिस्तानियों की सीमा शुरू होती है। वे वहाँ नहीं जाएंगे क्योंकि उनके लिए वो एरिया वहाँ के मिनी पाकिस्तानियों का है। माल ए गनीमत को लेकर उनके बीच आपस में झगड़ा शुरू हो जाएगा। वैसे भी होगा लेकिन आप को भगाने या साफ करने के बाद। उसका आप को कोई लाभ नहीं, इसलिए अपनी तैयारी रखें।
इससे अधिक सार्वजनिक लिखना संभव नहीं। बाकी यू ट्यूब पर पर्याप्त बातें हैं देखने सीखनेवालों के लिए। नजर चाहिए, नजरिया चाहिए।
भगवान भार्गव राम का वचन है – “उभाभ्यामपि समर्थोऽस्मि शास्त्रादपि शस्त्रादपि।” उनको परशुराम, फरसाराम आदि नामों से सीमित किया गया ताकि इस वचन को कोई असल में समझ न सके। कोढ़ में खाज ये है कि जिनमें कोई निजी कर्तृत्व नहीं होता लेकिन श्रेष्ठत्व जताने की चुल्ल होती है वे केवल किसी न किसी महापुरुष के वंशज होने का दंभ भरते हैं। पूर्वजों पर गर्व अवश्य करें, लेकिन यह भी सोचिए कि आप भी कुछ वर्षों में किसी के पूर्वज बनेंगे, क्या आप के वंशज आप पर गर्व कर सकेंगे या शर्मिंदा होंगे ? और ये भी जानिए कि महान और आप के बीच कई पीढ़ियों का अंतर है, अगर उन बीच के नाम आप नहीं लेते तो क्यों नहीं यह भी सोचिए। क्या आप के वंशजों के लिए आप का नाम भी वैसा ही होगा कि वे उसे याद नहीं करेंगे ?
समस्या यह है कि हम परस्पर पूरक होने की जगह, बस अपने श्रेष्ठता के लिए आपस में मरे जा रहे हैं। हर किसी का महत्व है। वो अंग्रेजी चुटकुला याद होगा जहां शरीर के अंगों में खुद को शरीर का बॉस साबित करने के लिए होड मचती है। कौन बॉस होता है ?
बहुत बड़ी सीख है वो, कभी न भूलें। जूतों का सही होना, यहाँ तक कि उसके फीते और उनके छिद्र तक सही होना, कमांडो मिशन में बहुत महत्व रखता है, चेक किया जाता है। यह किताबों से पढ़ी बात नहीं, इसके लिए डाँट खाए ट्रेनी कमांडो से सुनी है।
तीखे प्रश्न पूछकर बोलती बंद करनेवाले आप को बचा नहीं सकते। “मैं तो सवाल करता हूँ” कहकर खुद की फैन फॉलोइंग के हीरो बने रविश कुमार के पास एक ही उत्तर है – तो क्या फर्क पड़ जाएगा ?
जिसका अर्थ इतना ही होगा कि वो सब से पहले कन्वर्ट हो जाने को दौड़ेगा – लेकिन यूजफुल इडियट्स की गति को ही प्राप्त होगा। ऐसे लोग केवल शत्रु पर इस्तेमाल किये जाते हैं, अपनी सत्ता आनेपर उनको जीवित भी रहने नहीं दिया जाता। समझ सको तो समझ लीजिए। मोदीभक्ति के मठाधीश या हो मोदी विरोध के मठाधीश – दोनों अगर केवल लफ़फाज बड़बोले हैं तो आप के कुछ काम के नहीं। मोदी अमर नहीं, इतना याद रखिए, अपनी सुरक्षा पर ध्यान दीजिए।

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