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चाय की प्याली को अभी गुरु गोवलकर ने हाथ में लिया ही था कि ….

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चाय की प्याली को अभी गुरु गोवलकर ने हाथ में लिया ही था कि एक व्यक्ति उनके पास दौड़ कर आया और बोला..
गांधी जी की हत्या हो गयी ..!!
गोवलकर ने चुस्कियां लेना बंद कर दिया कुछ क्षण तक एक दम से शांत हो गए और फिर धीरे से कुर्सी पर बैठते हुए बोले..
कितना दुर्भाग्य है इस देश का…!
सब कुछ तहस नहस हो गया था जो प्लान बनाया गया था उस पर मिट्टी डाल दी जाएगी इसका आभास गोवलकर को हो चुका था..
उदंड अनुयायी ऐसे ही अदूरदर्शी कार्य करते हैं जिसका भुगतान श्रेष्ठजनों को करना पड़ता है,
हिन्दू चेतना का क्या
संघ की स्पष्ट विचारधारा का क्या..?
जिस स्पष्ट विचारधारा के तहत हेडगवार ने 1930 _ 31 असहयोग आंदोलन को लेकर कहा था कि संघ किसी भी आंदोलन में आगे नहीं आएगा वह अपना काम बिना राजनीति के करेगा ,
हाँ व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवक आंदोलन में भाग ले सकते थे। जंगल आंदोलन में भाग लेने से पहले संघ के संचालक का पद त्याग कर देते हैं और परांजपे को सरसंघचालक बना देते हैं …..
गुरु गोवलकर द्वारा 1942 में ठीक इसी तरह से कदम उठाया गया था।
उनके नियम केवल दूसरो के लिए नहीं थे बल्कि स्वयं भी कड़ाई से पालन करते थे।
सिवाय हिन्दू चेतना के संघ प्रत्यक्ष रूप से किसी भी राजनीतिक क्रिया में भाग नहीं लेगा और चुपचाप अपना कार्य करता रहेगा पर संघ घसीटा जा चुका था गांधी की हत्या में,
गोवलकर की आंखें सत्य देख चुकी थी कि अब अपने जीते जीते जी वो उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे जिसका उन्होंने सपना देखा था, गोवलकर अपने सारे दौरे को रद्द कर देते हैं और पंडित नेहरू तथा सरदार पटेल को तार भेजकर वापस नागपुर लौट आते हैं……..
हिंदुत्व का जो दीपक आज़ादी के बाद सूर्य बनकर चमकने वाला था गोडसे ने उस पर 70 साल के लिए मिट्टी डाल दिया,
कैसे भी करके कुछ लोगो ने उस दीपक को जलाये रखा,
पर प्रश्न फिर वही है,
क्या आज फिर हिदुत्व सूर्य की तरह चमकेगा या फिर कोई गोडसे उसकी रक्षा का दावा करके फिर मिट्टी डाल देगा…
यकीनन जिन्ना को फिर एक गोडसे की प्रतीक्षा है ताकि जिन्ना का राज फिर निष्कंटक हो जाये, देखना है जिन्ना की ये इच्छा कब पूरी होती है,
गुरु गोवलकर और सावरकर में कुछ वैचारिक मतभेद अवश्य रहें लेकिन हर एक कदम फूँक फूँक कर रख रहे थे,
पर गोडसे ने दावा किया कि उसने गोवलकर और सावरकर को एकदम से एक कर दिया है पर सत्य इससे एकदम भिन्न था ….
इसीलिए अत्यंत आवश्यक है कि भाषणों में अत्यंत स्पष्टता होनी चाहिए। यही कारण है संघ इतिहास की गलतियों से सीखकर कभी कभी अपने स्पष्ट वक्तव्य देता है जिसके कारण कुछ गोडसे वादी संघ पर विफर जाते हैं और कहते हैं ” संघ में अब वो बात नहीं रही”
देखना यह भी है कि संघ कितने दिनों तक खुद को गोडसे से बचा पायेगा,
गोडसे उतावलापन का पर्याय है तो संघ धैर्य और निश्चित दिशा में धीरे धीरे संरचनात्मक तरीके से कार्य करने का,
गोडसे फिर आएगा इसमें कोई दो राय नहीं है पर क्या इस बार संघ बच पायेगा..?
इस बार गोडसे का गांधी प्रत्यक्ष तौर पर संघ ही रहेगा और गोडसे यह तर्क भी देगा वह संघ से प्रेम भी करता था ठीक जैसे गांधी को,
भविष्य के गर्भ में उलझा प्रश्न..
क्या संघ , गोडसे को जिन्ना की ओर केंद्रित कर पायेगा …..?

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