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चेतना की यह बातें सुन कर संजय चुप

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चेतना की यह बातें सुन कर संजय चुप लगा जाता। चुप-चुप बैठे-बैठे वह उस से लिपटने लगता। चूमने लगता। वह फुंफकारती, ‘‘यह कोई बेडरूम नहीं है।’’
‘‘बेडरूम में इस तरह लिपटा या चूमा नहीं जाता। सीधे शुरू हो जाया जाता है।’’ संजय उस का प्रतिरोध करते हुए बोलता। और चेतना की फुंफकार की परवाह किए बगैर उसे फिर से चूमने लगता।
‘‘हाई कोर्ट में मुकदमा लड़ते-लड़ते आप वहां के वकीलों की तरह बेहया भी हो गए हैं। कुछ भी कहा सुना आप पर फर्क नहीं डालता। कुछ तो सुधरिए और समझिए कि मैं हाई कोर्ट नहीं हूं।’’ वह दूर छिटकती हुई बोलती।
‘‘तो क्या सुप्रीम कोर्ट बनना चाहती हो ?’’ चुहुल करता हुआ संजय पूछता।
‘‘जी नहीं। कोई कोर्ट वोर्ट नहीं। बनाना हो तो बीवी बना लीजिए।’’
‘‘फिर चाहे चौराहे पर ही शुरू हो जाऊं ?’’
‘‘तब चाहे जहां शुरू हो जाइए !’’
‘‘पर मेरी एक बीवी है। दूसरी कैसे कर लूं ?’’
‘‘तो जाइए उस एक बीवी के साथ लिपटिए। यहां मेरे साथ क्या कर रहे हैं ?’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘मतलब यह कि एक बीवी के रहते आप दूसरी बीवी नहीं कर सकते। अच्छी बात है। बहुत अच्छी बात। पर एक बीवी के रहते किसी और के साथ लिपटिए-चिपटिए यह भी गलत है। बहुत गलत बात !’’
‘‘तो ?’’
‘‘तो क्या जाइए और बीवी के पल्लू में लिपटिए।’’ कहती हुई वह मुसकुराई।
‘‘सच।’’
‘‘हां, एक काम और करिए कि हाई कोर्ट का चक्कर छोड़िए। मुकदमेबाजी से बाज आइए और कोई एक ठीक ठाक नौकरी कर लीजिए। इसी में आप की भलाई है।’’ वह रुकती हुई बोली, ‘‘अब यहां से चलिए। अंधेरा हो रहा है।’’
‘‘ठीक है।’’ कहते हुए संजय ने उसे फिर से बांहों से भर कर चूम लिया।
‘‘आप सुधरेंगे नहीं।’’ अपने को संजय से छुड़ाती हुई चेतना बोली।
स्कूटर स्टार्ट करते हुए संजय चेतना से पूछने लगा, ‘‘कुछ पैसे हैं क्या ?’’
‘‘क्यों क्या हुआ ?’’
‘‘कुछ नहीं। स्कूटर रिजर्व में है। पेट्रोल भरवाना है।’’
‘‘कितना लगेगा ?’’
‘‘बीस रुपए में भी काम चल सकता है और सौ रुपए में भी।’’
‘‘यह लीजिए।’’ उस ने सौ रुपए का नोट पर्स से निकालते हुए कहा।
‘‘हम को नहीं चाहिए। पेट्रोल पंप पर ही दे देना।’’
‘‘वहां देना ठीक नहीं लगेगा। यहीं ले लीजिए।’’
‘‘नहीं। देना हो तो पेट्रोल पंप वाले को ही देना।’’
‘‘आप तो कुछ समझते ही नहीं। क्या बताऊं। अच्छा चलिए।’’ वह स्कूटर पर बैठती हुई बोली।
‘‘रास्ते में वह पीछे से अचानक चिपट गई। उस के चिपटने में कसाव इतना ज्यादा था कि संजय बहकता हुआ बोला, ‘‘कहीं और चलूं क्या ?’’
‘‘नहीं !’’ वह जोर दे कर बोली।
संजय चुपचाप रहा।
दूसरे दिन हाई कोर्ट में उस की तारीख़ थी।
वह हाई कोर्ट की एक अदालत में बैठा था। इस अदालत में बैठे न्याय मूर्ति इलाहाबाद से आए थे। यह न्याय मूर्ति हिंदी में आदेश लिखवाते थे इस लिए संजय इन की खा़स इज्जत करता था। संजय इन दिनों अपने पक्ष में मिले अंतरिम आदेश का अनुपालन न हो पाने पर अवमानना याचिका दायर किए हुए था। आज उसी की सुनवाई थी। वह बैठा-बैठा अपनी बारी जोह रहा था। कि तभी एक दहेज हत्या का मुकदमा आ गया। पति ने अपनी पत्नी को जला कर मार डाला था। पति पक्ष का वकील उस की जमानत मांग रहा था। वह जोरदार पैरवी भी कर रहा था। पर सरकारी वकील जो विरोध में खड़ा था, मिमिया रहा था। शायद इस केस की फाइल भी उस के पास नहीं थी। पति पक्ष के वकील ने बात ही बात में बताया कि वह अपनी पत्नी को ‘‘बचाने’’ की गरज से अस्पताल ले गया। जहां डाक्टर उसे बचा नहीं सके।
‘‘अच्छा तो वह पत्नी को अस्पताल ले गया ?’’
‘‘येस मी लार्ड।’’
‘‘मतलब बचाने की कोशिश की ?’’
‘‘येस मी लार्ड।’’
‘‘वेल देन, बेल !’’ हिंदी में आदेश लिखवाने वाले यह न्याय मूर्ति अंगरेजी में बोले। और पत्नी के हत्यारे पति को जमानत दे दी। अब इन न्याय मूर्ति से भला कौन पूछता कि जब पति ने पत्नी को आग लगाई होगी तब पत्नी बेचारी चिल्लाई होगी। उस का चिल्लाना सुन कर अड़ोसी-पड़ोसी इकट्ठे हुए होंगे। दबाव पड़ा होगा तो उसे मजबूरीवश-भयवश अस्पताल तो ले ही जाना था। पर मुख्य सवाल तो यह था कि उस ने उसे जलाया। पर न्याय मूर्ति को यह तथ्य बेकार लगा और देखते हुए उठा और पच्च से थूकता हुआ चलता बना। घर आ कर वकील से फोन पर पूछा तो पता चला कि संजय के केस में ‘‘नेक्स्ट काज लिस्ट’’ हो गया था। सुनते ही वह बोला, ‘‘अच्छा हुआ इस मूर्ख के यहां मेरा केस टेक-अप नहीं हुआ।’’ फोन रख कर वह प्रेस क्लब चला गया।
आज जी भर कर और छक कर वह पीना चाहता था।
वह जब प्रेस क्लब पहुंचा तो तमाम लोगों के साथ मनोहर और प्रकाश भी पंत के साथ एक कोने में बैठे दिखे। पंत ने संजय को देखते ही, ‘‘आइए भाई साहब’’ की गुहार लगाई। पर उस ने नोट किया कि मनोहर और प्रकाश को पंत द्वारा उसे बुलाना अच्छा नहीं लगा। फिर भी वह तब तक बैठ चुका था। वह तीनों रम का एक अद्धा लिए बैठे थे। संजय मनोहर और प्रकाश की उदासीनता का कारण समझ गया। पर पंत ने जब गिलास मंगवा कर उस के लिए भी पेग बना दिया तो संजय शुरू हो गया। बात मनोहर ने ही शुरू की। पूछा, ‘‘संजय तुम्हारा हाई कोर्ट में क्या हुआ ?’’
‘‘हाई कोर्ट में जो होना था हो चुका। अब तो जो होना है आफिस में ही होना है।’’ संजय बिफरता हुआ बोला।
‘‘ख़ुद जो कर सको करना। हम लोग कुछ बहुत इनीसिएटिव नहीं ले पाएंगे।’’ सिगरेट पीते हुए प्रकाश बोला, ‘‘आखि़र हम लोगों को उसी संस्थान में नौकरी करनी है।’’
‘‘क्यों जब मैं तुम लोगों के लिए लड़ रहा था, तब मुझे नौकरी नहीं करनी थी ? तुम्हारी नौकरी, नौकरी है। और मेरी नौकरी, नौकरी नहीं थी ?’’ कहते हुए संजय ने अपनी रम ख़त्म की और बाथरूम जाने के लिए उठ खड़ा हुआ। पंत ने टोका, ‘‘भाई साहब कहां जा रहे हैं ? बैठिए तो।’’ संजय चलता हुआ बोला, ‘‘आ रहा हूं बाथरूम से। जा नहीं रहा।’’ और बाथरूम की ओर चला गया।
‘‘पंत तुम भी !’’ मनोहर बुदबुदाया
‘‘क्या हुआ भाई साहब !’’ पंत अचकचाता हुआ बोला।
‘‘अरे किस साले टैंकर को बुला लिया।’’ मनोहर ने जोड़ा, ‘‘यह अद्धा उस अकेले के लिए कम है। तिस पर साले का फ्रस्ट्रेशन ! क्या बताएं, शाम ख़राब हो गई !’’
‘‘हां, भई कहीं और चलें। नहीं संजय तो साला हाई कोर्ट-हाई कोर्ट का रिकार्ड बजा कर सारा मजा बदमजा कर देगा।’’
‘‘किस का मजा बदमजा हो रहा है भई !’’ संजय वापस आ कर कुर्सी खींचता हुआ बोला।
‘‘अरे नहीं भाई साहब आप बैठिए !’’ दूसरा पेग बनाता हुआ पंत बोला।
‘‘मेरे लिए तो अब मत बनाना भई पंत। आज अब पीने का मूड नहीं है।’’ संजय संजीदा होता हुआ बोला, ‘‘वैेसे भी इस अद्धे में चार लोगों का कुछ बने बिगड़ेगा नहीं। और मेरे पास पैसे भी नहीं हैं। स्कूटर में पेट्रोल तक कल एक लड़की से कह कर भरवाया था !’’
‘‘पैसे की बात नहीं है भाई साहब। मेरे पास हैं। अभी एक अद्धा और मंगवाता हूं।’’ कर कर पंत जेब से पैसे निकालने लगा।
‘‘नहीं पंत पैसे मत निकालो मैं नहीं पिऊंगा।’’
‘‘क्यों ? बात क्या हुई ?’’ पंत बोला।
‘‘बात-वात कुछ नहीं। हालां कि सोच कर तो आया था कि आज छक कर और जी भर के पीऊंगा। पर अब नहीं, अब नहीं।’’
‘‘नहीं भाई साहब आप चिंता मत करिए। जितनी चाहिए, पीजिए।’’ पंत फिर बुदबुदाया।
‘‘नहीं, पंत अब चिंता तो करनी पड़ेगी। दोस्त, वह दोस्त जो कल तक साथ जीने मरने का दम भरते हों, और आज टैंकर कहने लग जाएं, फ्रस्ट्रेशन देखने लग जाएं तो चिंता होनी चाहिए। ज्यादा होनी चाहिए।’’
‘‘तुम तो बेवजह फैले जा रहे हो !’’ मनोहर सिगरेट झाड़ते हुए बोला।
‘‘बेवजह नहीं, वजह है।’’ संजय बोला, ‘‘फिर मैं फैल नहीं रहा। वजह है इस लिए नहीं पिऊंगा।’’
‘‘क्या वजह है ?’’ प्रकाश बिदकते हुए बोला।
‘‘बेरोजगारी !’’ संजय हुंकारते हुए बोला, ‘‘आज यह समझ में आ गया कि बेरोजगारी में शराब वगैरह जैसे शौक नहीं पालने चाहिए। सो आज से शराब बंद। बिलकुल बंद। और अभी से।’’
‘‘सिगरेट तो पी सकते हैं ?’’ पंत भावुक होता हुआ बोला।
‘‘हां, सिगरेट तो चल सकती है। पर आज और अभी तो कुछ भी नहीं !’’ कह कर संजय प्रेस क्लब से बाहर निकलने लगा।
‘‘अरे क्या हुआ तुम्हारा हाई कोर्ट में भाई ?’’ माथुर एक कोने से चिल्लाता हुआ चल कर संजय के पास आ गया। पर संजय ने माथुर की बात अनसुनी कर दी। तो माथुर ने फिर पूछा, ‘‘क्या हुआ ?’’
‘‘कहां क्या हुआ ?’’ संजय बिदक कर बोला।
‘‘हाई कोर्ट में ?’’ माथुर फिर जोर से बोला।
‘‘हाई कोर्ट की मां की चूत !’’ संजय बौखला कर बोला, ‘‘समझे माथुर कि कुछ और डिटेल्स दूं ?’’
‘‘नहीं भइया माफ करो !’’ बुदबुदाता हुआ माथुर उलटे पांव लौटा। कहने लगा, ‘‘चढ़ गई है साले को !’’
‘‘किस को चढ़ गई ?’’ मनोहर ने माथुर से पूछा।
‘‘संजय साले को !’’ माथुर बड़बड़ाया।
‘‘पर उस ने तो बस एक ही पेग लिया था।’’ मनोहर बिगड़ता हुआ बोला।
‘‘तो बेरोजगार आदमी के लिए एक पेग क्या कम है ?’’ माथुर जैसे सारा गुस्सा मनोहर पर ही निकाल देना चाहता था।
‘‘संजय जैसों के लिए तो कम है !’’ प्रकाश दाढ़ी खुजाता हुआ बाथरूम की ओर जाने लगा।
संजय प्रेस क्लब से बाहर निकल कर अपने आफिस की यूनियन के नेता दूबे के यहां चला गया। उस ने नेता से साफ कहा कि, ‘‘मैं धरना देना चाहता हूं, बल्कि अनशन करना चाहता हूं। आफिस के गेट पर । इस काम में आप की और यूनियन की नैतिक मदद चाहता हूं। तख्ता-तंबू मैं अपने खर्च पर करूंगा। बस आप लोग साथ खड़े हो जाइए!’’
‘‘भई यूनियन के एक्जिक्यूटिव मेंबर तो आप भी हैं। सब से बात कीजिए। सब से राय लीजिए। फिर कुछ करिए।’’ यूनियन नेता दूबे बोला।
‘‘लेकिन मैं तो कल से ही अनशन शुरू करना चाहता हूं। और आप रायशुमारी के लिए कह रहे हैं ?’’
‘‘ऐसे कैसे कल से ही अनशन शुरू कर देंगे ?’’ दूबे बोला, ‘‘आप व्यक्तिगत रूप से चाहें तो करिए पर वैसे कल से कुछ नहीं हो पाएगा।’’
‘‘क्यों नहीं जो पाएगा ?’’ संजय बिफरा।
‘‘कुछ कायदे कानून होते हैं। अनशन धरना देने के लिये पूरी कार्यकारिणी की राय लेनी पड़ेगी। फिर नोटिस देनी पड़ेगी मैनेजमेंट को। फिर कुछ हो सकेगा।’’
‘‘तो कार्यकारिणी की बैठक कल बुला कर नोटिस दे दीजिए !’’ संजय बोला।
‘‘कल तो मैं बाहर जा रहा हूं। हफ्ते भर बाद आऊंगा तो देखा जाएगा।’’ दूबे बोला।
‘‘हद है। सारा कायदा कानून कर्मचारी के लिए ही होता है। हाई कोर्ट का एक आर्डर है जिसे मैनेजमेंट नहीं मान रहा। और आप मैनेजमेंट से कुछ नहीं कह पा रहे। उसे कायदा कानून नहीं बता रहे हैं और हमें कायदा कानून समझा रहे हैं। यह तो सरासर अन्याय है।’’
‘‘घबराइए नहीं, धीरज रखिए। अगले हफ्ते कार्यकारिणी की बैठक में सब ठीक हो जाएगा।’’ दूबे बोला, ‘‘मैनेजमेंट से भी वार्ता करेंगे !’’
‘‘ख़ाक वार्ता करेंगे !’’ संजय बिगड़ता हुआ बोला, ‘‘तीन साल से हाई कोर्ट का एक आर्डर लिए घूम रहा हूं। कुछ होता हवाता है नहीं और आप वार्ता ही कर रहे हैं। सिर्फ वार्ता !’’
‘‘अब आप के कहे से वहां हड़ताल तो हो नहीं जाएगी।’’ दूबे बोला, ‘‘अगले हफ्ते कुछ करते हैं।’’
संजय घर चल आया। बिना खाना खाए सो गया।
दूसरे दिन भी वह घर से निकला नहीं। शाम को चेतना के घर चला गया। पर वह थी ही नहीं। वापस आ गया। घर आ कर बेवजह बीवी से झगड़ा किया। खाना खाया, टी॰ वी॰ देखा और सो गया।
अगले हफ्ते यूनियन की कार्यकारिणी बैठक में उपस्थिति बहुत कम थी। और जो सदस्य थे भी वह संजय की मांग के खि़लाफ थे। क्या तो किसी एक आदमी के लिए पूरे आफिस में आग लगाना ठीक नहीं हैं !
‘‘मैं आग लगाने के लिए कह भी नहीं रहा।’’ संजय बोला, ‘‘मैं भी चाहता हूं बात चीत शांतिपूर्ण माहौल में हो।’’
‘‘अनशन धरने से माहौल शांतिपूर्ण तो नहीं रहेगा।’’ एक सदस्य भन्नाता हुआ बोला।
‘‘तो चूड़ियां पहन कर घर में बैठो !’’ दूबे उसे डपटते हुए बोला, ‘‘यूनियन की बैठक में क्या करने आते हो।’’
‘‘साथियों, यह मामला देखने में जरूर सिर्फ मेरा अकेला मामला लगता है। पर सच यही नहीं है। सच यह है कि मैं मैनेजमेंट के लिए एक ट्रायल केस हूं।’’ संजय आगाह करते हुए बोला, ‘‘जिस दिन मैं गिर गया। समझिए सभी गिर जाएंगे। कोई उफ्फ तक नहीं कर पाएगा और मैनेजमेंट जब जिस पर चाहेगा, तलवार चला देगा !’’
‘‘बिलकुल ठीक कहा संजय ने।’’ दूबे बोला, ‘‘आज अनशन की नोटिस मैनेजमेंट को दे दी जाएगी।’’
‘‘लेकिन….?’’ एक सदस्य अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दूबे उसे चुप कराते हुए बोला, ‘‘कोई लेकिन-वेकिन नहीं, नोटिस आज ही दी जाएगी। मैं जा रहा हूं टाइप करवाने !’’
अनशन की नोटिस शाम को मैनेजमेंट को दे दी गई।
पूरे आफिस में नोटिस की चरचा थी। हर कोई नोटिस बोर्ड पढ़ता और कहता अब सही कार्यवाई हुई है। पर बोलते सभी दबी जबान थे। खुल कर कोई सामने नहीं आता था। चरचा गरम होती देख मैनेजमेंट ने दूसरे दिन वह नोटिस, नोटिस बोर्ड से उतरवा दिया। तब चरचा और तेज हो गई। लगता कि अब आर या पार कुछ हो कर ही रहेगा।
लेकिन चार दिन बाद ही सारी हवा निकल गई। मैनेजमेंट ने अनशन करने के खि़लाफ मुंसिफ साऊथ के यहां से स्टे ले लिया था।
एक्स पार्टी स्टे। साथ ही संजय की आफिस में एंट्री बैन कर दी गई।
‘‘हद है ! गांधी जी ने अनशन की शांतिपूर्ण राह दिखाई थी। अब अदालतों की राय में यह भी अपराध हो गया !’’ संजय पान वाले से झल्लाया। पर उस की तरफदारी में बोलना तो दूर आफिस का कोई उस के पास खड़ा भी नहीं हुआ। वह गेट पर पान वाले से ही अपनी बड़बड़ कर के वापस चला आया।
दूसरे दिन मुंसिफ साऊथ की कोर्ट जा कर उस ने सरे आम मुंसिफ की ऐसी तैसी कर दी। बस मारा भर नहीं, और गालियां नहीं दी। बाकी सब किया। पर वह मुंसिफ बोला कुछ नहीं। चश्मे के नीचे से टुकुर-टुकुर ताकता रहा। लेकिन संजय जैसे सारा ठीकरा उस मुंसिफ पर ही फोड़ डालना चाहता था। वह बोला, ‘‘कितने पैसे खा लिए ?’’ पर मुंसिफ फिर भी चुप रहा। संजय फिर दहाड़ा, ‘‘आखि़र हाई कोर्ट का एक आर्डर मनवाने के लिए ही हम अनशन करने जा रहे थे और आप को वह भी अनुचित लगा?’’ संजय बोलता ही जा रहा था, ‘‘दिल्ली में एक कैदी ने यूं ही नहीं एक मुंसिफ पर भरी अदालत में लैट्रिन उठा कर फेंक दिया। आप पर भी लैट्रिन फेंकी जानी चाहिए। आप ने भी वैसा ही अन्याय किया है !’’ पर उस मुंसिफ की आत्मा जैसे मर गई थी। वह फिर भी कुछ नहीं बोला।
संजय कोर्ट से बाहर आ गया।
अगले हफ्ते हाई कोर्ट में तारीख़ थी। तारीख़ों की कीलों से अब वह आजिज आ गया था। कई बार तो केस टेकअप ही नहीं हो पाता था। कभी कभार होता भी था तो अपोजिट पार्टी का वकील कोई न कोई बहानेबाजी कर तारीख़ ले लेता था। एक बार बसु नाम का जज इलाहाबाद से आया। उस की सख़्ती के बड़े चरचे थे। लगातार तीन दिन तक उस के यहां संजय का केस टेक अप हुआ। पर अपोजिट पार्टी के वकील का जूनियर हर रोज मिमिया कर खड़ा हो जाता और बताता कि सीनियर फलां कोर्ट में पार्ट हर्ड में हैं। जब कि उस का सीनियर अदालत के बरामदे में ही कुत्ते की तरह सूंघता हुआ टहलता रहता। तीन दिन तक लगातार यही ड्रामा देखते-देखते बसु भन्ना गया। बोला, ‘‘आप के सीनियर बहुत बिजी रहते हैं ?’’
‘‘जी सर !’’ जूनियर घिघियाया।
‘‘तो ठीक है कल भी नहीं, परसों सवा दस बजे सुबह इस केस को ऐज केस नंबर वन टेक अप करूंगा। अपने सीनियर को ख़ाली रखिएगा।’’ बसु बड़ी सख़्ती से बोला।
‘‘जी सर !’’ कह कर जूनियर चलता बना।

संजय को कई वकीलों ने आ कर

बधाई

दी। कहा कि, ‘‘मिठाई खिलाइए। अब आप का संघर्ष खत्म हुआ।’’ एक वकील बोला, ‘‘अब परसों वह पार्ट हर्ड में नहीं रहेगा बल्कि आ कर कहेगा सर, आर्डर कंपलायंस कर दिया गया है।’’

संजय को लगने लगा कि अब तो किला फतह ! पर जब उस ने अपनी वकील से पूछा तो वह बोली, ‘‘अभी परसों तो आने दीजिए !’’ यह सुन कर संजय का दिल धक से रह गया। वह परसों आने तक धक-धक में ही जीता रहा। तरह-तरह के पूजा पाठ करता रहा।
परसों भी आ गया।
वह आधे घंटे पहले ही हाई कोर्ट पहुंच गया। उस की वकील भी जल्दी आ गई थीं। और अपोजिट पार्टी का वकील भी बड़ा-सा टीका लगाए आ गया।
कोर्ट शुरू हो गई। बसु आ गया था। अपने आदेश के मुताबिक औपचारिक कामों को निपटाने के बाद उस ने संजय का केस ऐज केस नंबर वन टेक अप कर लिया। लेकिन कार्रवाई देख कर संजय सन्न रह गया। अचानक एक ख़ूबसूरत-सी वकील उठीं। उन की काया काफी गठी हुई थी। वह युवा भी थीं और दर्शनीय भी। हाई कोर्ट की वह रौनक कही जातीं थीं। लोग आते-जाते आंखें तृप्त करते थे। उन की बुलबुल जैसी आवाज पर जजेज भी मोहित रहते थे। संजय भी। फिर वह एक नामी वकील की बेटी थीं। जो बतौर कम्युनिस्ट जाने जाते थे। हालां कि उस के पिता के बारे में कुछ वकील कहते थे, ‘‘काहे का कम्युनिस्ट ? अरे वह तो दल्ला है, दल्ला। बेटी पेश कर देता है जीत जाता है मुकदमा। और कि हरदम कामगारों के खिलाफ, पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ा रहता है।’’ बहरहाल उन सुदर्शनीया वकील को खड़े होते देख कर संजय खड़े-खड़े बैठ गया। उस का दिल धकधकाने लगा। वह वकील बड़ी संजीदगी से वकालतनामा न्यायमूर्ति की ओर बढ़ाती हुई, बड़ी-बड़ी छातियों को काले गाऊन के नीचे से फड़काती हुई बोलीं, ‘‘अपोजिट पार्टी नंबर दो की ओर से पावर फाइल कर रही हूं। और केस समझने के लिए कोई अगली तारीख़ दे दी जाए।’’ बसु छूटते ही, ‘‘ग्रांटेड।’’ बोल कर ‘‘नेक्स्ट केस’’। पर आ गया।
संजय के सारे सपने चूर कर दिए थे वकालत के इस नए ड्रामे ने। वह कोर्ट से बाहर निकला तो अपोजिट पार्टी का वह ‘‘सीनियर वकील’’ बड़ा-बड़ा टीका लगाए उसे ऐसे घूरते हुए निकला जैसे सैकड़ों जूते संजय को मार दिए हों।
हुआ भी यही था।
संजय की वकील ने पीछे से आ कर ढाढस बंधाया। बोलीं, ‘‘यह सब तो यहां होता ही रहता है। घबराने की बात नहीं।’’ वह बोलीं, ‘‘अगली तारीख़ पर देखते हैं।’’
संजय अभी जा ही रहा था कि एक वकील आ कर बोला, ‘‘साहब बंगालीवाद चल गया !’’ दूसरा बोला, ‘‘कुछ नहीं ‘‘रात’’ डील हो गई।’’ तीसरा वकील एक कोने में उसे खींचता हुआ बोला, ‘‘कुछ नहीं इन बुड्ढे जजों को चार पांच लाख रुपए चाहिए और एक सोलह साल की लड़की। ब्रीफकेस और लड़की ले कर सामने होटल में बुला लीजिए, इन जजों से जो चाहिए फैसला लिखवा लीजिए !’’
संजय था तो आहत पर उन वकील से खेलता हुआ बोला, ‘‘जरा धीरे बोलिए। नहीं जस्टिस बसु सुन लेंगे तो कंटेंप्ट कर देंगे। और कंटेंप्ट करने वालों के खि़लाफ ये जस्टिस कंटेंप्ट प्रोसिडिंग्स भले न चला पाएं, इन की आत्मा मर जाती हो, पर वकीलों के खि़लाफ प्रोसिडिंग्स चलाने में इन्हें जरा देर नहीं लगती ! इस में माहिर हैं !’’
‘‘हां, ये तो है। पर आएं नोच लें।’’ वह वकील बोला, ‘‘जस्टिस के नाम पर ये सब दिन दहाड़े इनजस्टिस कर रहे हैं तो कोई कब तक चुप रहेगा। ये जस्टिस साले अब एक दिन कोर्टों में ही खींच-खींच कर मारे जाएंगे तब समझ में आएगा।’’
‘‘अच्छा ये बताइए वकील साहब कि आप के घर में नौकर हैं ?’’ संजय ने पूछा।
‘‘हैं। बिलकुल हैं।’’ वकील बोला।
‘‘तो अगर आप उस से पानी मांगें और वह न दे तो ?’’
‘‘उस की मजाल कि न दे ! कचूमर निकाल लूंगा !’’
‘‘अच्छा अगर दस मिनट में दस बार आप पानी मांगें। और वह देने से इंकार कर दे !’’
‘‘दस नहीं, सौ बार मांगूं तो उसे पानी देना पड़ेगा। नहीं जूते लगा कर निकाल बाहर कर दूंगा !’’
‘‘तो इसी लिए न कि आप के आदेश की वह अवज्ञा करेगा !’’ संजय ने छूटते हुए कहा, ‘‘तो इन न्यायमूर्तियों को यह बात कैसे सुहाती है कि उन का आदेश अगला नहीं मानता तो भी वह इस का बुरा नहीं मानते। वह भी एक संवैधानिक आदेश !’’
‘‘यही तो बात है !’’ वह वकील बोला, ‘‘पहले दो चार साल में एकाध कंटेंप्ट केस फाइल होता था। और ‘‘इशू नोटिस’’ होते ही कंपलायंस हो जाता था। और अब ? अब तो तीसियों हजार कंटेंप्ट केसेज बरसों से पेंडिंग हैं। कोई पूछने वाला नहीं। इसी नाते अब हाई कोर्ट के आर्डर को कोई आर्डर नहीं मानता। रद्दी समझ कूड़े में डाल देते हैं लोग।’’
अब तक कुछ और वकील और मुवक्किल इस बहस में शरीक हो गए। मुवक्किल-सा दीखने वाला एक आदमी कुछ किस्सा सुनाने के अंदाज में बोलने लगा। वह कहने लगा, ‘‘आप में से कोई गांव का रहने वाला है ?’’ तो चार पांच लोगों ने ‘‘हां-हां’’ कहा तो वह पूछने लगा, ‘‘ग्राम पंचायत जानते ही होंगे आप लोग !’’ उस ने जोड़ा, ‘‘इसी तरह गांवों में पहले न्याय पंचायतें भी होती थीं।’’ वह बोला, ‘‘आप लोग नौजवान हैं। नहीं जानते होंगे। पर यह न्याय पंचायतें बड़ी ताकतवर होती थीं। कोई गलत काम कर दे तो सरपंच कहिए, पंच परमेश्वर कहिए उस का हुक्का पानी तक बंद कर देते थे। बड़ा दबदबा होता था इन न्याय पंचायतों का। क्यों कि लोगों को इन में पूरा-पूरा यकीन था। यह पंचायतें करती भी थीं दूध का दूध पानी का पानी। पर बाद के दिनों में इन न्याय पंचायतों में घुन लगने लगा। गलत लोग इस में आने लगे। बेईमानी और पक्षपातपूर्ण फैसला करने लगे। सो लोगों का यकीन धीरे-धीरे इन न्याय पंचायतों से उठने लगा। नतीजा सामने है। अब यह न्याय पंचायतें ही गांवों से उठ गईं। कोई इन का नामलेवा नहीं रह गया।’’ वह आदमी दुख में भर कर लेकिन ठसक के साथ बोला, ‘‘आप लोग देखिएगा इन अदालतों का भी यही हश्र होने वाला है।
क्यों कि लोगों का यकीन अब इन अदालतों से उठता जा रहा है। चाहे सुप्रीम कोर्ट हो, हाई कोर्ट या लोवर कोर्ट। सब का एक ही हाल है।’’
‘‘बात तो आप ठीक ही कहे रहे हैं।’’ एक दूसरा आदमी बोला, ‘‘मकान ख़ाली कराने के लिए, किसी जमीन का विवाद निपटाने के लिए या और ऐसे और मामलों पर लोग पहले कोर्ट आते थे। पर अब लोग ऐसे मामले निपटाने के लिए गुंडों की शरण में जाते हैं। और जो मामला ये अदालतें बीसियों सालों तक सिर्फ तारीख़ों में उलझाए रखती हैं न्याय मांगने वाले को अन्याय के दोनाले में ढकेल देती हैं, वही मामला समाज में आपराधिक छविवाला गुंडा एक ही तारीख़ में निपटा देता है। भले पैसा ले कर सही। और फिर क्या अदालतों में पैसा नहीं लगता ?’’ वह बोला, ‘‘अब अदालतों में आने वाले बेवकूफ माने जाते हैं।’’ वह रुका और बोला, ‘‘अच्छा चलो अदालत कोई फैसला बीस-पचीस साल में दे भी देती है तो उसे मानता ही कौन है ?’’
‘‘ये बात तो है !’’ एक वकील बोला। बात बढ़ती क्या फैलती जा रही थी। संजय धीरे से वहां से खिसक गया। पर बहस चालू थी। न्याय मांगने आए, अन्याय की मार झेलने वाले कोई एक दो तो थे नहीं। पूरा का पूरा हुजूम था। अन्याय और तारीख़ों के कंटीले तारों में उलझा हुआ। मरता हुआ। तिल तिल कर। संजय के केस की फिर तारीख़ें लगीं। पर अपोजिट पार्टी के वकील ने ‘‘सरसुरारी’’ और ‘‘मेंडमस’’ का तीर चला कर एक बार कंटेंप्ट की प्रोसिडिंग ही रुकवा दी। कहा कि प्राइवेट बाडी के खि़लाफ ‘‘सरसुरारी रिट’’ लाई नहीं करती सो रिट ही मेनटेनेबिल नहीं है। और न्याय मूर्ति मान भी गए। फिर रिट की मेनटेनेबिलिटी पर तारीख़ों और बहसों का दौर साल भर चला और आखि़रकार रिट एडमिट हो गई। कंटेंप्ट की प्रोसिडिंग फिर से शुरू हो गई। पर अपोजिट पार्टी ने फिर एक बहाना लिया कि उन्हों ने रिट की मेनटेनेबिलिटी के खि़लाफ स्पेशल अपील की है। स्पेशल अपील की सुनवाई तक कंटेंप्ट प्रोसिडंग रोक दी जाए। न्याय मूर्ति फिर मान गए। कंटेप्ट प्रोसिडिंग रोक दी। कोई छः-सात महीने बाद स्पेशल अपील ख़ारिज हो गई और कंटेंप्ट प्रोसिडिंग फिर शुरू हुई तो अपोजिट पार्टी के सीनियर वकील फिर पार्ट हर्ड में ‘‘बिजी’’ रहने लगे।
संजय इस अदालती चूतियापे से हार गया था। तारीख़ दर तारीख़ वह टूटता जा रहा था पर तारीख़ों का सिलसिला नहीं टूटता था। बेरोजगारी अलग तोड़ती जा रही थी। फ्रीलांसिंग वह भी लखनऊ में अब भारी पड़ती जा रही थी। वह अब नौकरी करना चाह रहा था। पर उस की छवि एक मुकदमेबाज की बन चली थी सो जब भी कहीं नौकरी की बात वह चलाता, लोग बड़ी संजीदगी से बात टाल जाते। सो हाई कोर्ट उस की विवशता थी। इस विवशता को ढोने के लिए जैसे वह अभिशप्त हो गया था।
बेतरह !

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