Home राजनीति जातीय नहीं, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता तथा विकास और सुशासन की राजनीति

जातीय नहीं, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता तथा विकास और सुशासन की राजनीति

by Pranjay Kumar
176 views

जातीय नहीं, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता तथा विकास और सुशासन की राजनीति

अथवा
विकास व सुशासन के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना के सतत प्रवाह एवं सम्यक बोध की राजनीति (या आप ही कोई उपयुक्त शीर्षक दें)
इस देश ने एक ऐसा दौर भी देखा है, जब राजनीति या तो बाहुबलियों-अपराधियों-धनकुबेरों की बपौती मानी जाती थी या चंद कुनबों और परिवारों की निजी संपत्ति व विशेषाधिकार। भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने राजनीति के प्रति आम जनमानस की परंपरागत अवधारणा को बदला। आज इस देश का प्रबुद्ध एवं जिम्मेदार नागरिक यह जानता और मानता है कि राजनीति भी व्यापक मानवीय संस्कृति का एक प्रमुख आयाम है, एक ऐसा महत्त्वपूर्ण आयाम, जिस पर देश का विकास एवं भविष्य निर्भर करता है। आज पढ़े-लिखे युवा, दक्ष एवं कुशल प्रशासक-प्रोफेशनल्स-टेक्नोक्रेट्स से लेकर आम आदमी तक की राजनीति में परोक्ष या प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ी है। वे राजनीति को सेवा एवं परिवर्तन का सबसे समर्थ एवं सशक्त वाहक मानते हैं। जिन राज्यों में जातीय आधार एवं समुदाय विशेष के तुष्टिकरण के बिना राजनीति की कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, उन राज्यों में भी विकास और सुशासन को केंद्र में रखकर भाजपा ने आम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित किया। कई राज्यों में तो वह लगातार जीतती रही है। भारतीय राजनीति में यह किसी दुर्लभ चमत्कार से कम नहीं। यह केवल प्रचार-प्रसार के बल पर संभव नहीं, इसके लिए जनता की अपेक्षाओं व भावनाओं पर खरा उतरना पड़ता है, उनकी माँगों और ज़रूरतों को पूरा करना पड़ता है, लगातार परफॉर्म करना पड़ता है।
अभी हाल ही में संपन्न हुए पाँच राज्यों के चुनावों में चार में भाजपा और एक में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी। पंजाब को छोड़कर शेष किसी राज्य में सरकार विरोधी कोई लहर दिखाई नहीं दी। बल्कि उत्तरप्रदेश में तो 1985 के बाद पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने वहाँ दुबारा शपथ-ग्रहण की। उत्तराखंड में भी हर चुनाव के बाद सरकार बदलने का चलन था। भाजपा की यह जीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि तमाम समाचार-पत्रों, चैनलों एवं सोशल मीडिया से लेकर अभिव्यक्ति के अन्य अनेक मंचों व माध्यमों से भाजपा के विरुद्ध व्यापक जनाक्रोश होने का लगातार दावा किया जा रहा था। कभी कृषि कानून, कभी नागरिकता संशोधन बिल तो कभी पिछड़ों-दलितों-अल्पसंख्यकों की कथित उपेक्षा के नाम पर भारतीय जनता पार्टी को निरंतर कठघरे में खड़ा किया जा रहा था। जबकि चुनाव-परिणामों से बिलकुल स्पष्ट है कि इस बार जनता ने जाति-क्षेत्र-मज़हब जैसी विभाजनकारी प्रवृत्तियों को तो पूरी तरह निरस्त किया ही है, इसके साथ-साथ किसान-आंदोलन एवं सीएए प्रतिरोध के नाम पर हुई हिंसक एवं अराजकतावादी राजनीति को भी सिरे से ख़ारिज किया है। उत्तरप्रदेश में चुनाव से ठीक पूर्व तमाम छोटे-छोटे दलों एवं चेहरों को सामने रखकर जातीय अस्मिता को उभारने का जैसा प्रयास एवं प्रचार किया जा रहा था, उसे बहुसंख्यक समाज के हर वर्ग और जाति ने अपनी सूझ-बूझ से विफल एवं निरस्त कर दिया। परिणाम बताते हैं कि उनके लिए जातीय अस्मिता से अधिक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता रही। ये चुनाव-परिणाम छोटी-छोटी अस्मिताओं के स्थान पर बड़ी एवं विराट अस्मिता या व्यापक पहचान से बहुसंख्यक समाज के लगभग सभी वर्गों एवं जातियों के गहरे जुड़े होने के ठोस एवं जीवंत प्रमाण हैं। वस्तुतः जातीय अस्मिता के स्थान पर राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता से भारतीय जनमानस को जोड़ना भाजपा की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। चुनाव के परिणामों से स्पष्ट है कि स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी, ओमप्रकाश राजभर से लेकर जयंत चौधरी जैसे तमाम नेताओं और जातीय क्षत्रपों के दावों और बयानों को जनता ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया। इनमें से स्वामी प्रसाद मौर्या और धर्म सिंह सैनी तो अपनी सीट बचाने में भी विफल रहे। बल्कि विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में पड़े भिन्न-भिन्न जातियों एवं वर्गों के मत-प्रतिशत व चुनाव-परिणाम से यह संदेश अवश्य निकलता है कि हर वर्ग एवं जाति की अपनी मौलिक एवं स्वतंत्र सोच होती है, हरेक को अपने हित-अहित, शत्रु-मित्र का सम्यक एवं संतुलित बोध होता है। किसी वर्ग या जाति-विशेष को निजी संपत्ति मानने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए और किसी गठबंधन को छोड़ने या जुड़ने से पूर्व संबंधित दलों और नेताओं को अपने-अपने आधार मतदाता-वर्ग से सलाह-संपर्क एवं विचार-विमर्श अवश्य करना चाहिए। एक ओर जहाँ उत्तरप्रदेश में मायावती के परंपरागत वोट-बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने में भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली, वहीं दूसरी ओर पंजाब में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को दलित चेहरा बता-जताकर प्रचारित-प्रसारित करने का काँग्रेस को कोई लाभ नहीं मिला। स्पष्ट है कि आम जनता या जाति-विशेष के लिए भी नेताओं के चेहरों-नारों-वादों से अधिक महत्त्वपूर्ण किसी दल की नीति और नीयत रही। ज़मीन पर किया गया ठोस काम रहा, दुःख-सुख में साझेदारी रही। भाजपा की सर्वसमावेशी नीति और सर्वस्पर्शी विकास का ही परिणाम है कि उसे हाल ही में संपन्न उत्तरप्रदेश चुनाव में जाटव वर्ग के 34 और अनुसूचित जाति के 45 प्रतिशत से भी अधिक मत प्राप्त हुए।
गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड एवं उत्तप्रदेश में भाजपा को मिली आशातीत बढ़त एवं ऐतिहासिक जीत से यही सिद्ध होता है कि जनता ने विकास एवं सुशासन की उसकी नीति एवं कार्यशैली पर जीत की मुहर लगाई। लोक-कल्याणकारी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने एवं सीधे लाभार्थियों तक सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों को पहुँचाने का उसे अत्यधिक लाभ मिला है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मठता एवं सक्रियता, उनका निष्कलंक एवं पारदर्शी व्यक्तित्व, क़ानून-व्यवस्था से किसी भी सूरत में समझौता नहीं करने वाले सख़्त एवं कठोर प्रशासक की उनकी छवि, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर दिखाई गई उनकी तत्परता एवं संवेदनशीलता, कोविड के संकटकालीन दौर में स्वयं संक्रमित होने के बावजूद हर जिला-केंद्रों पर नियमित प्रवास एवं निरीक्षण, दूसरे राज्यों में फँसे विद्यार्थियों एवं प्रवासी मजदूरों को सकुशल एवं सुरक्षित घर पहुँचाने के लिए दिखाई गई उनकी सक्रियता, तीनों लहर एवं लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा किए गए कार्य एवं लिए गए त्वरित व कल्याणकारी फैसले, रिकॉर्ड वैक्सीनेशन, तुष्टिकरण के स्थान पर सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के नारे को यथार्थ के धरातल पर साकार करने हेतु किए गए गंभीर प्रयास एवं पहल, नाम-क़द, प्रभाव-पहुँच आदि को नजरअंदाज कर अपराधियों एवं बाहुबलियों पर नकेल कसने का साहस एवं संकल्प, परिवारवादी एवं जातिवादी राजनीति की उपेक्षा तथा राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर दुर्लभ मुखरता एवं निर्द्वंद्वता आदि कारक अत्यंत महत्त्वपूर्ण, परिणामदायी एवं निर्णायक सिद्ध हुए। शुभ संकेत है कि इन चुनावों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की निर्णायक भागीदारी रही। उत्तरप्रदेश में जहाँ पुरुषों का मत प्रतिशत 59.6 रहा, वहीं महिलाओं का 62.2, 75 में से 43 जिलों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया और जहाँ-जहाँ महिलाओं ने अधिक मतदान किया, वहाँ-वहाँ भाजपा को अधिक सीटें मिलीं। उन्होंने घर-परिवार या पति की मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर अपनी सुरक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार जैसे मुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इन मुद्दों पर बेहतर काम करने वाले दल व नेता के प्रति अपना विश्वास जताया। उजाला, उज्ज्वला, जन-धन, आवास, मुफ़्त राशन जैसी योजनाओं को महिलाओं ने ख़ूब सराहा। मंदिरों और तीर्थस्थलों के चहुँमुखी विकास तथा सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम करने का भी भाजपा को विशेष लाभ मिला। क्षद्म पंथनिरपेक्षता एवं तथाकथित प्रगतिशीलता के नाम पर की जाने वाली पक्षपातपूर्ण एवं कथित ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ वाली प्रचलित एवं बनावटी राजनीति के प्रति भी इस बार बहुसंख्यक समाज विशेष सतर्क एवं सचेत दिखा। पृथक पहचान एवं जातीय अस्मिता के आवरण में फलने-फूलने वाले अपराध एवं भ्र्ष्टाचार को भी वह भली-भाँति देखता-समझता आया है। प्रायः राज्य और केंद्र के बीच चलने वाली खींचतान को भी जनता ने ख़ारिज कर डबल इंजिन की सरकार में भरोसा जताना उचित एवं श्रेयस्कर समझा। यही कारण रहा कि पाँच में से चार राज्यों में न केवल भाजपा पुनः सरकार बना पाई, बल्कि सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद उत्तरप्रदेश में उसके 1.6, गोवा में 1.3 तथा मणिपुर में 3.0 प्रतिशत वोट बढ़ गए। हाँ, यह सत्य है कि आम आदमी पार्टी की पंजाब की जीत ऐतिहासिक एवं उल्लेखनीय है। परंतु यह भाजपा से अधिक काँग्रेस के लिए चिंतनीय है। काँग्रेस को सोचना होगा कि वह गुटबाज़ी एवं भितरघात से कैसे पार पाए और अपने क्षेत्रीय नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगाकर पार्टी को कैसे एकजुट रखे? राहुल गाँधी के बाद अब प्रियंका गाँधी भी अपने कार्यकर्त्ताओं का मनोबल बढ़ाने एवं जनता का भरोसा जीतने में विफल रही हैं। अतः काँग्रेस के समक्ष उसके केंद्रीय नेतृत्व को लेकर भी गंभीर संकट हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषक पंजाब जीतते ही आम आदमी पार्टी को भाजपा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, कुछ इसे प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे में आई कमी के रूप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं, जो निराधार एवं सरलीकृत निष्कर्ष है। बल्कि तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा न केवल क़ायम है, बल्कि चुनाव-दर-चुनाव और बढ़ा है। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश में कुल 32 रैलियाँ कीं, जिनका प्रभाव लगभग 200 सीटों पर था और उनमें से भाजपा ने 160 सीटें जीतीं यानी उनका स्ट्राइक रेट 80 प्रतिशत रहा। वहीं प्रियंका गाँधी 150 सीटों पर सक्रिय रहीं, जिनमें काँग्रेस केवल 2 सीटें जीत पाई और उसका मत-प्रतिशत भी 2017 के 6.3 से घटकर 2.7 प्रतिशत रह गया। अरविंद केजरीवाल भी पंजाब को छोड़कर गोवा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाए। आम आदमी पार्टी ने चुनाव पूर्व इन राज्यों में भी जीत के बड़े-बड़े दावे किए थे। पंजाब की जीत में भी ‘आप’ के केंद्रीय नेतृत्व की तुलना में स्थानीय मुद्दे अधिक प्रभावी एवं निर्णायक रहे। सही मायने में यह आप की जीत की तुलना में काँग्रेस और अकाली दल जैसी पुरानी एवं स्थापित पार्टी की हार अधिक है। प्राइम टाइम राजनीतिक विश्लेषक भले ही इसे मानें या न मानें, पर सच यही है कि भाजपा का विकल्प बनकर उभरने के लिए आम आदमी पार्टी को अभी मीलों का सफ़र तय करना है, आरोप-प्रत्यारोप की अवसरवादी राजनीति का परित्याग करना है तथा मुफ़्त बिजली-पानी जैसे लोकलुभावन मुद्दों से आगे जाकर शासन का गंभीर एवं टिकाऊ स्वरूप (मॉडल) प्रस्तुत करना है। राष्ट्रव्यापी प्रसार के लिए समग्रतावादी सोच एवं सुस्पष्ट नीति के साथ-साथ स्वस्थ नीयत की भी महती आवश्यकता होती है, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि भाजपा के अतिरिक्त अन्य कोई दल इस निकष पर स्वयं को कसने तक के लिए तैयार नहीं है। पंजाब एक सीमावर्त्ती प्रदेश है, समय-समय पर वहाँ अलगाववादी एवं आतंकवादी तत्त्व भी सिर उठाने की चेष्टा करते रहे हैं। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की कसौटी पर खरा उतरे बिना आम आदमी पार्टी या अरविंद केजरीवाल की स्वीकार्यता सीमित एवं संदिग्ध ही रहेगी, भले ही एजेंडा आधारित मीडिया इनका ख़ूब प्रचार-प्रसार ही क्यों न करे!

Related Articles

Leave a Comment