Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय टेलीविजन और हमारा जीवन

टेलीविजन और हमारा जीवन

दयानन्द पांडेय

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अभी तक हम संसदीय राजनीति, भ्रष्ट राजनीति के साक्षी थे। अब टेलीविजन राजनीति के साक्षी हैं। नतीज़ा है कि संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति भी आंदोलनकारी बन गया है। टेलीविजन के कैमरे न रहें तो सारा धरना, सारा प्रदर्शन बे-पानी, बे-नमक हो जाएगा। यह कैमरे इतने बड़े राक्षस हो कर उपस्थित होंगे और घर-घर में घुस जाएंगे, जनमत बनाने लग जाएंगे कौन जानता था? कि संविधान, अनुच्छेद, धाराएं सब झाड़ू के आगे असहाय हो गए हैं।

 

संवैधानिक पद और उस की शपथ की ऐसी-तैसी करना किसी को सीखना हो तो वह दिल्ली जाए और टेलीविजन कैमरे का इंतजाम करे और जो चाहे सो करे। कोई उस का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। कभी राहुल देवता बन जाते हैं तो कभी नरेंद्र मोदी तो कभी अन्ना हजारे, कभी रामदेव और कभी अरविंद केजरीवाल। कभी अमिताभ, कभी सचिन तेंदुलकर भगवान बन जाते हैं। या फिर कोई और। कोई भी चार सौ बीसी टाइप की फ़िल्म बना कर, इन चैनलों पर लफ़्फ़ाज़ी झोंक कर, कुछ क्लिपिंग दिखा कर करोड़ों-अरबों रुपए कमा सकता है, गरीब जनता की जेब से निकाल कर।

 

उस की आंख में धूल झोंक कर। और महान फ़िल्मकार और अभिनेता बन सकता है दो कौड़ी की फ़िल्म बना कर। सिनेमा, क्रिकेट और टेलीविजन ने लगता है हमारे सारे सामाजिक जीवन और राजनीति का अपहरण कर लिया है। तिस पर यह फ़ेसबुक, यह ट्विटर ! गरज यह कि समाज और राजनीति के बाद अब पारिवारिक जीवन भी निशाने पर है ! जय हो आम आदमी की ! जय हो झाड़ू की ! जय हो टेलीविजन राजनीति की ! संविधान आदि की ऐसी-तैसी !

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