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ताजमहल को लेकर हिंदुओं की मनोग्रंथि

लेखक - देवेन्द्र सिकरवार

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हिंदुओं की मनोग्रंथि चैनल्स की तरह होती है जहाँ अलग अलग समय में अलग भावनाएं अभिव्यक्त होती हैं।
जयपुर राजघराने की राजकुमारी दिया ने ताजमहल विवाद में दस्तावेजी प्रमाण होने की बात क्या की चारों ओर आग लग गई।
सी. मंडल, कांग्रेसी, वामपंथियों सबको याद आ गया कि दिया कुमारी की रगों में गद्दारों का खून बह रहा है जैसे कि कुछ समय पहले ही ज्योतिरादित्य के भाजपा ज्वाइन करते ही इन सबको याद आ गया था कि सिंधिया गद्दार खानदान का खून है और उससे पहले सब कुछ सही था।
चलो ये सब बोले समझ आता है लेकिन स्वघोषित हिंदुत्ववादियों के पेट में आंव मरोड़ क्यों उठने लगी, समझ से परे है।
इन नैतिकतावादियों से परे मैं शायद वो अकेला हूँ जो मानसिंह से लेकर मिर्जा राजा जयसिंह तक की मुग़लपरस्ती के लिए आलोचना करने पर राजपूत बन्नाओं और मूँछ मरोड़ों से सबसे ज्यादा ट्रोल हुआ लेकिन कभी भी वर्तमान पीढ़ी को कुछ नहीं कहा क्योंकि अतीत पर किसी का बस नहीं।
जब इन्ही दिया कुमारी ने रामजन्मभूमि प्रकरण में अदालत की मांग पर श्रीराम के वंशज होने की घोषणा पर बड़ी वाहवाही की थी, फिर आज क्या हो गया?
इनके मूढ़तापूर्ण प्रश्न देखिये-
1)अभी तक क्यों नहीं बोलीं?
2)क्या ताजमहल को प्राइवेट प्रॉपर्टी बनाने की ख्वाइश है?
3)पहले अपने पुरखों की गद्दारी के बारे में कुछ क्यों नहीं कहते?
ब्ला…..ब्ला…..ब्ला…
व्यक्तिगत तौर पर राजघरानों व सामंतशाही आडंबरों के विरुद्ध हद दर्जे की चिढ़ के बावजूद ऐसे तर्कों पर कहीं ज्यादा चिढ़ आती है।
भलेमानसो पी एन ओक की पुस्तक पढ़ो जो इस पूरे आंदोलन का आधार है, उन्होंने भी जयपुर राजघराने के दस्तावेज़ों का जिक्र किया है। दिए इसलिये नहीं कि जैसे कांग्रेस ने नीचे ताजमहल तहखाने के किवाड़ और किशनगढ़ का खजाना गायब कर दिया तो ये दस्तावेज कौन से खेत की मूली हैं।
रही ताजमहल को प्रायवेट प्रॉपर्टी बनाने के लालच की बात तो बेट्टाओ ग्वालियर व जयपुर इन दो घरानों के पास जितनी संपत्ति है वह तुम्हारे अनुमान की औकात से भी बाहर है।
अब पुरखों की गद्दारी की बात कर लें।
क्या चाहते हैं वर्तमान पीढ़ी आत्महत्या कर ले? अगर इसी आधार पर बात करनी है तो सवाई जयसिंह और कर्नल भवानी सिंह के बारे में भी बात कीजिये। ये सवाई जयसिंह थे जिन्होंने मालवा में बाजीराव के लिए रास्ता तैयार किया और एक रुपये वेतन पर भारतीय सेना के कर्नल भवानी सिंह 1971 में ढाका में पैराशूट से जंप करने वाले पहले सैनिक थे जिसमें गोलियों से बचने की संभावना सिर्फ किस्मत पर होती है।
अगर पूर्वजों के आधार पर आकलन करना है तो श्रीराम के वंशज कामुक, मद्यप अग्निवर्ण और कौरवों के पक्ष में खड़े होने वाले बृहद्वल को क्या कहेंगे?
हिरण्यकश्यप की गलतियों का जवाब प्रह्लाद से मांगा गया था क्या?
सीधी बात है दिया कुमारी हो या अक्षय कुमार या कंगना , जो भी आज हमारे पक्ष में बोल रहे है, स्वागत है, जब विरोध में बोलेंगे लंका लगा देंगे।
क्या किसी मु स्लिम, यहां तक कि ओवैसी को उद्धव ठाकरे से बाल ठाकरे के बयानों को लेकर सवाल करते देखा है?
तो भाइयो इस्तेमाल करना सीखो न कि खुद को इस्तेमाल होने देना।
हर बार इतनी मूर्खताओं से तो ऊपरवाला भी उकता जाएगा।

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