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दा कपिल शर्मा शो बनाम दा कश्मीरी फाइल्स

by Isht Deo Sankrityaayan
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दा कपिल शर्मा शो बनाम दा कश्मीरी फाइल्स

 

जो कमेडी शो के नाम पर अपनी ही बुआ और दादी को मर्दखोर बाजारू औरतों के रूप में दिखाता हो उससे अगर आप सच्चे इतिहास पर आधारित एक अच्छी फिल्म के प्रमोशन की उम्मीद करते हैं, तो वाकई बड़े भोले हैं आप। उनसे भी ज्यादा भोले जिन्होंने ये समझ लिया था कि ‘पाकिस्तान’ वाकई ‘गांधी जी की लाश पर बनेगा’। और उनसे भी ज्यादा जिन्होंने सन 1947 के बाद भी यह उम्मीद पाले रखी कि अगर नाली के कीड़ों को दूध पिलाकर पालेंगे तो वे उनके सेब-अखरोट के बागों से लेकर बहन-बेटियों तक पर बुरी नजर नहीं रखेंगे।
उन्होंने ए. ओ. ह्यूम के सपनों वाले भारत के महान नेताओं द्वारा देश का कलेजा चीड़ दिए जाने के बाद दूसरे हिस्से में बहन-बेटियों के साथ जो कुछ हुआ था उसकी खबरों को सच नहीं माना था। ये तो एक हिस्से की ही बात है। आपने कभी सोचा कि ए. ओ. ह्यूम के सपनों वाले भारत के महान नेताओं द्वारा देश को सिर्फ टुकड़े नहीं, उसी समय टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया था।
हम जितना जानते हैं वह केवल पश्चिमी टुकड़े की बात है। उंस पूर्वी टुकड़े के बारे में तो किसी को कुछ पता ही नहीं है जिसका पहले ही एक और टुकड़ा हो चुका था। जो समय रहते निकल गए थे वे तो बच गए लेकिन टुकड़ा होने के बाद निकले उनका दर्द न कहीं आया और न कभी आ सकेगा। उंस दर्द का बहुत मामूली बयान तस्लीमा नसरीन के कुछ उपन्यासों में बहुत बाद में आ सका। पूरा सच भी नहीं, केवल सत्यांश लिखने के लिए तस्लीमा नसरीन को आज तक निर्वासन झेलना पड़ रहा है।
पूर्वी टुकड़े से जुड़े लोगों का दावा है कि उसने देश को बहुत ज्यादा बुद्धिजीवी दिए। दिए भी हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या उनमें एक भी ऐसा बुद्धिजीवी, ऐसा कवि, ऐसा लेखक नहीं था जो इस दर्द को बयान कर पाता? उन तमाम बुद्धिखोरों से बेहतर मैं तसलीमा नसरीन को मानता हूँ। क्योंकि उंस बौद्धिक आतंकवाद के प्रभाव को स्वीकार नहीं किया जिसके कारण बहुत लोगों ने चाहकर भी पूर्वी टुकड़े के दर्द को नहीं लिखा और जिन्होंने पश्चिमी टुकड़े के दर्द पर केवल अकादमी-ज्ञानपीठ के लिए शौच कर डाला।
यह पाप बहुत बड़े बड़े लेखकों – बुद्धिजीवियों ने किया है और वे अभी भी कर रहे हैं। इस बेचारे निहायत घटिया लबार से तो यह उम्मीद की ही नहीं जानी चाहिए। क्योंकि इसने कभी किसी बौद्धिकता या सत्यवादिता का दावा नहीं किया। यह केवल अपना पेट पाल रहा है। उसकी मजबूरी हो सकती है। लेकिन आपकी कोई मजबूरी नहीं है। मैं शुरू से कह रहा हूँ कि आपके बच्चों के संस्कार बिगाड़ रहा है। जिन परिवारों में इसे देखा जाता है उनके बच्चों के अवचेतन मन मे एक ही बात भर रही है। यह कि माँ – बहन – दादी – बुआ यानी हर औरत मर्दखोर होती है।
अगर आप अपने बच्चों को यही संस्कार देना चाहते / चाहती हैं हँसी के नाम पर उसका निहायत भोंडा और घटिया शो जरूर देखें । साथ ही, उंस दिन के लिए तैयार हो जाएं जब आपके साथ भी वही सब होगा जो कश्मीर फाइल्स में घटना के वर्षों बाद दिखाया जा रहा है। अगर आप ऐसी घटिये से भी निहायत घटिया चीजें देखते रहे तो स्वयं भगवान भी आपके साथ वह सब होने से नहीं रोक सकते। और हाँ, इसे देखने का एक फायदा भी होगा। यह कि आपके साथ जब सब होगा तो आपको दर्द उतना नहीं होगा जितना कश्मीर, पंजाब, सिंध या बंगाल के निर्वासितों को हुआ। क्योंकि जैसे आपका मन इसके निहायत फूहड़ और गलीज बेहुदेपन को हास्य समझने लगा है, वैसे ही आने वाले दिनों में यह अपने साथ वही सब होने को सहज सामान्य मान लेगा। मान लेगा कि आप बने ही इसीलिए हैं।
बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी मजबूरी में कोठे पर जा चुकी औरतें यह मान लेती हैं। हालांकि उनमें और आपमें फिर भी एक अंतर होगा। यह कि वे तो मजबूरी में गई हैं, लेकिन आप इस महान त्रासदी को बाकायदा आमंत्रित करेंगे, अपने घर में, मनोरंजन के नाम पर।

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