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दिल्ली दंगों में और एक आरोपी

आर ए एम देव

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दिल्ली दंगों में ही जो और एक आरोपी थे दिनेश यादव, उनको सजा सुनाई गई। प्रोसेस है, लंबा चलेगा। सुबह नूपुर जे. शर्मा की ट्वीट जो शेयर की थी उसमें दुख जताया गया था कि दिनेश शर्मा का वकील को कोर्ट द्वारा दिया हुआ वकील था जो कोई खास काबिल नहीं लगता।

 

श्रीमती नूपुर जे. शर्मा के इस ट्वीट को लेकर काफी भड़ास निकाली गई हिंदुओं में लेकिन आम तौर पर सभी को भाजपा और संघ को गालियां देने में ही रस था। सच्चाई तो यह है कि मोहम्मद ताहिर के लिए सलमान खुर्शीद खड़े हैं वे किस पक्ष का झण्डा लेकर खड़े हैं ? वे काँग्रेस के पदाधिकारी अवश्य हैं लेकिन कोर्ट में एक वकील के हैसियत से खड़े हैं, वहाँ काँग्रेस का कोई उल्लेख भी नहीं है। काँग्रेस ने भी यह नहीं कहा कि पक्ष ने उनको मोहम्मद ताहिर का केस लड़ने को कहा है। वे प्रोफेशनल वकील हैं और किसी की भी केस लड़ना उनका निजी प्रोफेशनल अधिकार है। नया ही किसी मुस्लिम पॉलिटिकल पार्टी ने उनको एंगेज किया है। उनका वकालतनामा मैंने देखा नहीं है तो उनको किसने एंगेज किया है या वे खुद ही प्रो बोनों लड़ रहे हैं यह मुझे ज्ञात नहीं।

 

 

इसी तरह, भाजपा और संघ दोनों भी आधिकारिक रूप से किसी वकील को दिनेश यादव की केस लड़ने को खड़े नहीं कर सकते। वैसे अन्य कोई हिन्दू संघटन के लिए या कार्यकर्ता के लिए यह मौका हो सकता था कि दिनेश यादव के बचाव में कोई बड़ा वकील खड़ा करें। या फिर अगर केस तगड़ी हो तो उसके परिवार की व्यवस्था करें। यहाँ मुझे यह पता नहीं है कि ऐसी व्यवस्था हुई है या नहीं, कई सारे काम शांति से हो जाते हैं। सभी हिन्दू चमको बुखार से ग्रसित नहीं होते। इसलिए ऐसे मुद्दे पर बिना जानकारी कुछ नहीं लिख सकता।

 

वैसे यह मुद्दा लिखने का कारण इतना ही है कि कई वर्षों से एक हिन्दू लीगल सेल की बात करते आ रहा हूँ, ADL की तर्ज पर। बात यूं तो है एक बृहत योजना की लेकिन अभी तक किसी ऐसे शख्स तक अपनी बात पहुंचा नहीं पाया हूँ जो जिम्मेदारी ले कर इसे कार्यान्वित कर सके। लेकिन यह काम समाज का है। हमारे शत्रुओं में हमारा विरोध, हम से बैर समाज के तौर पर होता है, पार्टियों को वे कभी तलवार तो कभी ढाल बनाते हैं , जो भी समय की मांग हो। लेकिन हम तो इसे सामाजिक कर्तव्य बताये जानेपर ही बिदक जाते हैं और किस नेता – पक्ष – संघटन – को क्या करना चाहिए इसपर भाषण भड़ास सब शुरू हो जाता है।

 

संकट तो है, लेकिन इसमें अवसर भी हैं। निभाने की क्षमता किसी में हो तो देश और हिन्दू समाज की आवश्यकता भी है। भाजपा अगर काँग्रेस बनी जा रही है तो दूसरी भाजपा भी आनी तो चाहिये ही न ? मेहनत और धैर्य के विकल्प नहीं होते, यह हम भूल गए हैं और इससे हमारा क्या नुकसान हुआ है यह समझ भी नहीं पा रहे। वरना साडेसात साल जो हमने गँवाए हैं वे न गँवाते।

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