Home महिला लेखकAkansha Ojha पत्थर जहां का पारस है वो शहर बनारस है।

पत्थर जहां का पारस है वो शहर बनारस है।

Akansha Ojha

by Akansha Ojha
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काशी यूं तो महादेव और भगवती का आनन्द कानन वन है। लेकिन इसी काशी में काशी विश्वनाथ की अनुकम्पा से अनेकों प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर विद्यमान हैं।
हर देवस्थान से लेकर कुंड, तालाब या पोखरे की भी अपनी कथा है। अपना इतिहास है।
ऐसा ही एक रहस्यमयी देवस्थल नागकूप है काशी के कैंट रेलवे स्टेशन से करीब 8 किमी दूर एक मोहल्ला जैतपुरा में। मैदागिन से जाएंगे तो दारानगर होकर और अगर लोहटिया से जाएंगे तो औसानगंज होकर यहां तक पहुंचा जा सकता है। यहां जैतपुरा थाने के बिल्कुल करीब से होकर गुजरती है एक गली। उसी गली में है एक अनूठा देवालय और कूप।
इस रहस्यमयी स्थान को करकोटक नाग तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है और इसी जगह पर शेषावतार (नागवंश) के महर्षि पतंजलि ने व्याकरणाचार्य पाणिनी के भाष्य की रचना की थी। ये नागकूप तीन हजार साल से भी ज्यादे पुराना हैं जिसकी गड़ना बैज्ञानिक शोधों के आधार पर भी की गयी है। इस नाग कूप के अंदर सात कूप हैं जिसकी पुष्टि नासा के बैज्ञानिको ने अपने वैज्ञानिक शोधो के आधार पर की है | नाग पंचमी से पूर्व नागकूप कुंड का सम्पूर्ण जल निकाल कर सफाई की जाती है जिस कारण नागकूप मे स्थित नागेश्वर महादेव शिव लिंग के दर्शन का अवसर सिर्फ एक बार वर्ष भर में मिलता है क्युंकी इस एक दिन के बाद यह कूप भूमिगत सोते के जल से पुनः भर जाता है और उसके बाद साल भर तक ये भूमिगत जल के भीतर डुबा रहता है| इस नागकुआं मे भूमिगत स्रोतों से जल कहा से आता है इसका रहस्य आज तक ज्ञात नहीं हो पाया और ये अभी भी अज्ञात है । नाग पंचमी के दिन अनेको नाग यहाँ पर विचरण करते है जिनके दर्शन के लिये देश देशांतर से लाखो श्रद्धालुओ का समूह यहाँ पर उपस्थित होता है |
वैसे तो यह कुंआ हमेशा लबालब रहता है लेकिन नागपंचमी पर इसकी सफाई की जाती है। कुछ घंटों के लिए इस कूप का सारा जल बाहर निकाल दिया जाता हैै। करीब एक सौ फीट गहरे इस कूप को खाली करने में दो पम्प लगाये जाते हैं तब कहीं जा कर एक हफ्ते में यह कुंआ खाली हो पाता है। इस कूप की तलहटी में बसते हैं नागेश्वर महादेव। कहते हैं कि इस नागेश्वर महादेव का दर्शन करने मात्र से कुंडली में निहित कालसर्प दोष दूर हो जाता है। नागेश्वर महादेव का दर्शन महज चंद घंटों के लिए ही होता है, क्योंकि नागपंचमी पर पानी निकाले जाने और पूजा पाठ के तुरंत बाद इस कुंए के जलस्रोत से अनवरत रूप से जल निकलने लगता है और करीब एक सौ फीट गहरा और कई सौ फीट व्यास वाला यह कुंआ आपके देखते देखते लबालब भर जाएगा। इतनी तीव्र गति से पानी आता कहां से है और एक निश्चित ऊंचाई के बाद जल का प्रवाह रूक क्यों जाता है, इस रहस्य को आजतक कोई समझ नहीं सका है। कहते हैं नागकूप की अतल गहराइयों में नागेश्वर महादेव की स्थापना शेषनाग के अवतार महर्षि पतंजलि ने की थी। कूप निर्माण की भी एक अलग कथा है। गरूड़ पुराण, शिव पुराण, स्कंद पुराण और काशी खंड के अनुसार महर्षि पतंजलि ने अपने तप के लिए इस कूप का निर्माण कराया था। कहते हैं कि इस कूप का जीर्णोद्धार संवत एक में किसी राजा ने कराया था। यानि नागकूप के वर्तमान स्वरूप का इतिहास दो हजार छिहत्तर साल पुराना है। यहां महर्षि पतंजलि ने जमीन की सतह से सौ फीट नीचे एक शिवलिंग की स्थापना कर उसका नाम नागेश्वर महादेव रखा। साल में मात्र एक बार ही इस नागेश्वर महादेव की पूजा या दर्शन किया जा सकता है। यह सब भी महज चंद घंटों के लिए होता है। इसके बाद यह शिवलिंग साल भर पानी में डूबा ही रहता है। यह वो स्थान है जहां महर्षि पतंजलि ने अपने गुरू व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के साथ कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी। इसमें महाभाष्य, चरक संहिता और पतंजलि योग दर्शन मुख्य हैं। सर्वविदित है कि महर्षि पतंजलि शेषावतार थे।
यही वजह थी कि वे पर्दे की आड़ से अपने शिष्यों को विद्याभ्यास कराते थे। इस पर्दे के अंदर आने की किसी को भी अनुमति नहीं थी।
बहरहाल, काशी के इस नागकूप का सबसे अहम रहस्य यहां का जलस्रोत है। यह बात आज तक कोई समझ नहीं सका कि कूप में इतना सारा पानी एक दिन में आता कहां से है। कुंए के अंदर उसकी दीवारों से भी पानी रिसता रहता है। कुंए में अंदर की तरफ चारों ओर सीढ़ियां बनी हुई हैं। नीचे कुंए के चबूतरे तक पहुंचने के लिए दक्षिण की ओर चालीस, पश्चिम में सैंतीस, उत्तर और पूरब की ओर दीवार से लगी साठ साठ सीढ़ियां हैं। इसके आलावा कुंए में शिवलिंग तक उतरने लिए पन्द्रह सीढ़ियां अलग से हैं। कुंए में दक्षिण दिशा थोड़ी ऊंची है। यही वजह है कि इस तरफ चालीस सीढ़ियां हैं। यह इस बात को भी प्रमाणित करती है कि महर्षि पंतजली ने वास्तु को दृष्टिगत रखते हुए इस कूप का निर्माण कराया था।
गरूड़ पुराण, शिव पुराण, स्कंद पुराण और काशी खंड के अनुसार महर्षि पतंजलि ने अपने तप के लिए इस कूप का निर्माण कराया था। कहते हैं कि इस कूप का जीर्णोद्धार संवत एक में किसी राजा ने कराया था। यानि नागकूप के वर्तमान स्वरूप का इतिहास दो हजार छिहत्तर साल पुराना है। यहां महर्षि पतंजलि ने जमीन की सतह से सौ फीट नीचे एक शिवलिंग की स्थापना कर उसका नाम नागेश्वर महादेव रखा।
बीएचयू विश्व पंचांग के संपादक डॉ. रामचंद्र पाठक के अनुसार मारीच पराशर ग्रंथ में इस नागकूप मे नागेश्वर महादेव का उल्लेख मिलता है।।
पतञ्जलि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में विद्यमान थे। इनका जन्म गोनारद्य (गोनिया) में हुआ था पर ये
काशी में ‘नागकूप पर बस गये थे। ये व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्य थे। काशीनाथ आज भी श्रावण
कृष्ण ५, नागपंचमी को “छोटे गुरु का, बड़े गुरु का नाग लो भाई नाग लो कहकर नाग के चित्र बाँटते हैं
क्योंकि पतञ्जलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है। पतञ्जलि महान् चकित्सक थे और इन्हें ही
‘चरक संहिता’ का प्रणेता माना जाता है। पतञ्जलि का महान अवदान है ‘योगसूत्र’।
पतञ्जलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे अभ्रक विंदास अनेक धातुयोग और लोहशास्र इनकी देन है। पतञ्जलि संभवतः पुष्यमित्र शुंग (१९५-१४२ ई.पू.) के शासनकाल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा है।
ई.पू. द्वितीय शताब्दी में ‘महाभाष्य’ के रचयिता पतञ्जलि काशी-मण्डल के ही निवासी थे। मुनियत्र की परंपरा में वे अंतिम मुनि थे। पाणिनी के पश्चात् पतञ्जलि सर्वश्रेष्ठ स्थान के अधिकारी पुरुष हैं। उन्होंने पाणिना व्याकरण के महाभाष्य की रचना कर स्थिरता प्रदान की। वे अलौकिक प्रतिभा के धनी थे।
व्याकरण के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों पर भी इनका समान रूप से अधिकार था। व्याकरण शास्त्र में उनकी बात
को अंतिम प्रमाण समझा जाता है। उन्होंने अपने समय के जनजीवन का पर्याप्त निरीक्षण किया था।
अत: महाभाष्य व्याकरण का ग्रंथ होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोश भी है। यह तो सभी जानते हैं कि पतञ्जलि शेषनाग के अवतार थे।
द्रविड़ देश के सुकवि रामचन्द्र दीक्षित ने अपने ‘पतञ्जलि चरित नामक काव्य ग्रंथ में उनके चरित्र के संबंध में कुछ नये तथ्यों की संभावनाओं को व्यक्त किया है। उनके
अनुसार शंकराचार्य के दादागुरु आचार्य गौड़पाद पतञ्जलि के शिष्य थे किंतु तथ्यों से यह बात पुष्ट नहीं होती है।
प्राचीन विद्यारण्य स्वामी ने अपने ग्रंथ ‘शंकर दिग्विजय में शंकराचार्य में गुरु गोविंद पादाचार्य का रुपांतर
माना है। इस प्रकार उनका संबंध अद्वैत वेदांत के साथ जुड़ गया। पतञ्जलि के समय निर्धारण के संबंध में
पुष्यमित्र कण्व वंश के संस्थापक ब्राह्मण राजा के अश्वमेध यज्ञों की घटना को लिया जा सकता है।
यह घटना ई.पू. द्वितीय शताब्दी की है। इसके अनसार महाभाष्य की रचना काल ई.पू. द्वितीय शताब्दी का मध्यकाल अथवा १५० ई. पूर्व माना जा सकता है। पतञ्जलि की एकमात्र रचना महाभाष्य है जो उनकी कीर्ति को अमर बनाने के लिये पर्याप्त है। दर्शन शास्त्र में शंकराचार्य को जो स्थान ‘शारीरिक भाष्य के कारण प्राप्त है, वही स्थान पतञ्जलि को महाभाष्य के कारण व्याकरण शास्त्र में प्राप्त है।
पतञ्जलि ने इस ग्रंथ की रचना कर पाणिनी के व्याकरण की प्रामाणिकता पर अंतिम मुहर लगा दी है।
स्कन्द पुराण के अनुसार वाराणसी के जैतपुरा के नवापुरा स्थित नागकूप महर्षि पतंजलि की सिद्ध तपोस्थली रही है। ‘योगसूत्र के रचनाकार महर्षि पतंजलि ने कभी इसी नागकूप मे बैठ कर श्रावण कृष्ण पंचमी के दिन अपने गुरु महर्षि पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी ग्रंथ पर महाभाष्य पूरा किया था। नागकूप वह स्थान है जहां महिर्ष पाणिनी और महर्षि पतंजलि ने नागों की साधना की थी जिस कारण पाणिनी को बड़े गुरु और पतंजलि को छोटे गुरु के रूप में मान्यता दी गई। कालांतर में लोक परंपरा में काशी में बड़े गुरु और छोटे गुरु के नाग के पूजन का विधान प्रचलित हुआ। शास्त्रों के अनुसार इस नागकूप के दर्शन मात्र से काल सर्प दोष एबं नाग दंश के भय से मुक्ति मिल जाती है|
नाग पंचमी के दिन नागेश्वर महादेव के दर्शन करने से काल सर्प दोष के कारण अकाल मृत्यु योग से मुक्ति मिलता है | इस कुआ का वर्णन तमाम धर्म शास्त्रों में वर्णित है जिनके अनुसार इस कूप के दर्शन मात्र से से नाग दंश भय के साथ ही साथ काल सर्प दोष से भी मुक्ति मिलती है | शास्त्रों में 12 प्रकार के कालसर्प दोष बताए गए हैं जो इस प्रकार है (1): अनंत कालसर्प दोष, (2): कुलिक कालसर्प दोष, (3): वासुकि कालसर्प दोष, (4): शंखपाल कालसर्प दोष,(5): पद्म कालसर्प दोष, (6): महापद्म कालसर्प दोष (7): तक्षक कालसर्प दोष,(8): कर्कोटक कालसर्प दोष,(9): शंखनाद कालसर्प दोष, (10): घातक कालसर्प दोष,(11): विषाक्त कालसर्प दोष,(12): शेषनाग कालसर्प दोष। इस कूप के दर्शन एबं पूजन से १२ प्रकार के सर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है इसलिए इस कुंड का नाम नागकूप या नाग कुंड है । इस कुंड मे आज भी नागों का निवास है जहाँ पर वे स्वछंद होकर विचरण करते रहते है ।
नागकुआं की मान्यता है की इस कूप का रास्ता सीधे नागलोक को जाता है और यहाँ पर नाग पंचमी के दिन स्नान करने एबं पूजा पाठ करने से ऐसे जातक जिनके जन्म कुंडली मे सारे ग्रह राहु एबं केतु के मध्य आ जाते है जिससे उसे नाग दोष या कालसर्प दोष लगा रहता है का निवारण हो जाता है इस लिए नाग पंचमी के दिन इस नाग कूप पर पूरे हिंदुस्तान से लाखो लोग यहाँ तक की विश्व भर के अनेक देशो से कालसर्प दोष के जातक यहाँ पर आते है और पूर्ण बिधि बिधान से यहाँ पर स्नान एबं पूजा पाठ कर काल सर्प दोष से मुक्त होते है | यहां के नाग कूप के जल को घरों में छिड़कने से सर्पभय नहीं रहता और पूजा से सर्पभय से मुक्ति मिलती है और साथ ही साथ अकाल मृत्यु का कारण खत्म हो जाता है।
नाग कूप (कुएं) की गहराई कितनी है, इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं है ।धर्मशास्त्रों के अनुसार इस कुएं का रास्ता गहन पाताल से होते हुए सीधे नागलोक को जाता है। श्रद्धालुओ को इस नाग कुंआ तक जाने का मौका साल भर मे केवल एक बार नाग पंचमी के दिन मिलता है।नाग पंचमी के दिन श्रद्धालु लोग इस कूप मे तुलसी , फूल माला , दूध , धान का लावा नागदेवता को चढ़ाते है |
नागपंचमी पर इस नागकूप पर श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। तमाम लोग दूध, लावा और तुलसी की माला से यहां कूप का और वक्ती तौर पर दर्शन देने वाले नागेश्वर महादेव की पूजा करते हैं। तुलसी की माला इसलिए क्योंकि शेषनाग को तुलसी बहुत प्रिय है। कहते हैं कि नागकूप में स्थित नागेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से कालसर्प दोष दूर हो जाता है। कालसर्प दोष को अकाल मृत्यु का कारण माना जाता है। इतना ही नहीं राहु और केतु से पीड़ित व्यक्ति भी अगर यहां पूजा करें तो उन्हें भी काफी लाभ होगा।
नागकूप की सीढ़ियां सीधे नागलोक को जाती हैं। इसकी वजह इस कूप की सफाई के वक्त हजारों की तादाद में मिलने वाले नाना प्रकार के विषधर सर्प हैं। ये सर्प आते कहां से हैं ? हजारों साल से यह एक अबूझ पहेली है। कूप की सफाई में लगे लोग इन सर्पों को पकड़ कर दूर जंगलों में छोड़ आते हैं लेकिन हर बार पिछली बार से ज्यादा संख्या में सर्पों का मिलना इस बात की तस्दीक करता है कि कूप का संबंध कहीं न कहीं नागलोक से है। इसमें हैरत करने वाली बात ये है कि लगातार फुफकारते रहने वाले इन सर्पों ने आज तक किसी को काटा नहीं। नागपंचमी पर नागकूप के जल से स्नान करने का विधान भी है। इससे जन्म जन्मांतर के पापों के नाश हो जाने की बात कही जाती है। आश्चर्य की इन श्रध्दालु स्नानार्थियों को भी किसी सर्प के डंसे जाने की कोई घटना आज तक नहीं हुई। कालसर्प दोष को दूर करने के निमित्त दुनिया में जिन जगहों पर पूजा की जाती उनमें काशी के नागकूप को सर्वप्रधान माना जाता है।
भगवान शिव की पूजा यहां नागेश के रूप में होती है। यही कारण है कि इस नागकूप पर स्थित शिव मंदिर को करकोटक नागेश्वर के नाम से भी बुलाया जाता है | पूरी दुनिया में कालसर्प दोष की पूजा सिर्फ तीन जगह पर ही होती हैं और उसमें वाराणसी का यह तीर्थ प्रथम है |
नागकूप के रहस्य को जानने के साथ हमें सनातन धर्म में सर्प पूजन को अहमियत दिये जाने की वजहों को भी समझना चाहिए। एक जन्तु के पूजन के पीछे छिपे वैज्ञानिक तर्क को भी बूझना चाहिए। दरअसल, भारत एक कृषि प्रधान देश है। सबको पता है कि सर्प खेतों की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि सर्प को क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। चूहे के अलावा भी तमाम जीव जंतु और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों का नाश करके सर्प हमारे खेतों की रक्षा करते हैं। सच कहा जाए तो सर्पों के सकारात्मक गुणों को देखने की दृष्टि हमारे पास नहीं होती। सामान्यतया सांप अकारण किसी को काटता नहीं। उसे परेशान करने वाले या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है। देखा जाए तो सर्प भी ईश्वर की एक कृति है। यदि वह नुकसान किये बिना सरलता से जा रहा हो तो उसे मारने का हमें कोई हक नहीं है। जब हम उसे मार डालने की कोशिश करते हैं तभी वह अपनी जान बचाने के लिए हमें डंसता है। ऐसे में हम सर्प को मनुष्यहंता कैसे कह सकते हैं? क्या हम इन्सान भी अपनी जान पर बन आने पर सामने वाले की जान लेने का प्रयत्न नहीं करते ? जन्तु वैज्ञानिकों का कहना है कि सर्प कभी भी अकारण किसी को काटना नहीं चाहते। वो वर्षों के परिश्रम से संचित अपनी शक्ति यानि जहर को यूं ही किसी को काट कर व्यर्थ में खोना नहीं चाहते। अगर देखा जाए तो यह मनुष्य जाति के लिए एक संदेश है। यदि हम भी जीवन में कुछ तप करें तो उससे हमें भी शक्ति या ऊर्जा हासिल होगी। उस शक्ति या ऊर्जा को किसी पर गुस्सा करने, कमजोर और मासूमों को परेशान करने या दुख देने में जाया न कर हमें उसे स्वयं के मानसिक विकास में लगाना चाहिए। तमाम असमर्थ लोगों को समर्थ बनाने और निर्बलों को सबल बनाने में खर्च करना चाहिए। कुछ दैवी सर्पों के मस्तक पर मणि होती है। वह मणि अमूल्य होती है। हमें भी जीवन में अमूल्य बातों को हमेशा जेहन में रखना चाहिए। समाज के मुकुटमणि महापुरूषों के विचारों को जीवन में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए। अध्यात्म रूपी मणि विद्या को अपने मस्तक पर धारण करने की कोशिश करनी चाहिए। जिस तरह से सर्प बिल में रह कर एकांतवास करता है ठीक उसी तरह आध्यात्मी व्यक्ति को भी लोगों की भीड़ से बचना चाहिए। देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन में वासुकी नाग ने रस्सी का साधन बन कर दुर्जनों के लिए भी ईश्वरीय कार्य में निमित्त बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। आज के वक्त में यदि स्वभाव और कर्म से दुर्जन व्यक्ति भी यदि सज्जनता के रास्ते पर चल पड़े तो वह समाज और देश हित के कार्य में बहुत बड़ा योगदान दे सकता है। ऐसे लोगों के भगवत कार्य को ईश्वर भी स्वीकार कर लेता है। अघोरेश्वर भगवान शिव ने सर्प को अपने गले में डाल कर और सुदर्शन चक्रधारी भगवान विष्णु ने शेषनाग पर शयन कर इस बात को प्रमाणित भी किया है। अब आप देखिए कि बारिश के दिनों में अपने बिलों से निर्वासित होकर जब यही सर्प हमारे घरों में अतिथि बन कर आते हैं तो हम कृतज्ञ भाव से उसकी पूजा अर्चना करते हैं। नागपंचमी पर्व के श्रावण मास में पड़ने की वजह भी यही है। हमारे ऋषियों ने औचित्य जान कर ही इस पर्व का वर्षा काल में प्रावधान रखा। यही वजह भी है कि नागपंचमी को त्यौहारों का द्वार भी कहा जाता है।
नाग पंचमी पर हर साल महर्षि पतंजलि की जयंती श्रद्धाभाव से मनाई जाती है। इस दौरान नागकुआ पर शास्त्रार्थ का आयोजन होता है जो विश्व प्रसिद्ध है। स्कंद पुराण के अनुसार यह वह स्थल है जहा से पाताल लोक जाने का रास्ता है। माना जाता है इस कूप के अंदर सात कूप हैं। इसे नासा ने भी स्वीकार किया है। शास्त्रों के अनुसार नाग पंचमी के दिन स्वयं पतंजलि भगवान सर्प रूप में आते हैं और बगल में नागकूपेश्वर भगवान की परिक्रमा करते हैं। मान्यता यह भी है कि शास्त्रार्थ में बैठते हैं और शास्त्रार्थ में शामिल विद्यार्थियों पर कृपा भी बरसाते हैं। नागकूप कालसर्प शाति का भी एकमात्र स्थान है। यहा नागेकूपेश्वर शिवलिंग का पाणिनविरचित अष्टाध्यायी के साढ़े चार हजार सूत्रों से अभिषेक और बिल्वार्चन किया जाता है। इस अनादि परंपरा को जीवंत रखने के उद्देश्य से काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. रामयत्न शुक्ल ने 1995 में उत्तर प्रदेश नागकूप शास्त्रार्थ समिति की स्थापना की जो पूरे देश के प्रतिष्ठित वेदांत और न्याय दर्शन के विद्वानों का सम्मान कर नागकूप व काशी की शास्त्रार्थ परंपरा को जीवंत रखे हुये है और इसमें देशभर के एक हजार मूर्धन्य प्रकांड संस्कृतविद् जुड़े हुये हैं।

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