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परजीवी लोग

तत्वज्ञ देवस्य

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वे हमारे बीच चलते हैं..
वे हमारे अपने होने का ढोंग करते हैं..
वे हमारा उपयोग,
अपने नकरात्मक उद्देश्यों के लिए करते हैं..

पहले चित्र में एक परजीवी द्वारा अपहृत कीट दिखाया गया है जो परजीवी की गिरफ्त में है और वो वो परजीवी ही उस कीट(यहां चींटी) की हर चाल को,
नियंत्रित करते हैं।
Ophiocordyceps unilateralis नाम की इस फंगस का सिर्फ एक लक्ष्य है: स्व-प्रसार और फैलाव।
शोधकर्ताओं ने कई दशकों पहले ही पता लगाया था कि उष्णकटिबंधीय जंगलों में पाया जाने वाला ये फंगस, बीजाणुओं के माध्यम से एक फोर्जिंग चींटी को संक्रमित करता है,चींटे के एक्सोस्केलेटन से स्वयं को जोड़ता है और उसमें प्रवेश करता है और धीरे-धीरे उसके मस्तिष्क और व्यवहार को संभाल लेता है।
जैसे-जैसे इस परजीवी फंगस संक्रमण आगे बढ़ता है,मंत्रमुग्ध चींटी अधिक नम माइक्रो क्लाइमेट में जाने की इच्छा लिए अपने घोंसले को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाती है,जो कि उसके परजीवी फंगस के विकास के अनुकूल होता है।
चींटी जमीन से कई इंच और कई बार कई फीट ऊपर एक सहूलियत के बिंदु पर चढ़ने के लिए मजबूर होती है,अपने जबड़ों को उस पेड़ या पौधे के उत्तर की ओर पत्ती की नस में डुबोती है,
और मृत्यु की प्रतीक्षा करती है।
उसकी मृत्यु के पश्चात वो परजीवी फंगस पेड़ या पौधे की उस ऊंचाई से चींटी के शरीर से जुड़े अपने भाग से अपने बीज स्पोर रूप में वातावरण में छोड़ती है,ताकि उसके जैसे और बनें,इस तरह फंगी अपना विस्तार करती है,ये प्रकृति की लीला है और ये लीला हम मनुष्यों में भी दिखाई देती है,पर हम इतने व्यस्त हैं, कि हम उन परजीवियों के ऊपर ध्यान ही नहीं देते और उन्हें हमारे शरीर,हमारी आत्मशक्ति,हमारी ऊर्जा का उनके हित के लिए स्वेच्छा से उपयोग होने देते रहते हैं,जब तक हमारे भीतर कुछ बचा नहीं रहता,या जब तक हम अपने उद्देश्य से भटक पतन की ओर नहीं चले जाते।
जीवन में आपको आपसे प्रेम करने वालों से अलग करने का प्रयास करने वाले भी कुछ “अपने” ही होते हैं..
वो कितने अपने हैं,कितने नकरात्मक ऊर्जा द्वारा पोषित परजीवी,ये आपको तब पता चलता है,
जब आप उन अपनों से सदा सदा के लिए बिछड़ जाते हैं,जिनके लिए आप सर्वस्व थे..
बहुत सौभाग्यवान ही होते हैं,जो इन मीठे षड्यंत्रों से अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों को,
बचा पाते हैं..
बहुत सौभाग्यवान होते हैं,जिनके कुछ शुभचिंतक होते हैं,जो उन्हें अलग होने से रोकने का प्रयास करते हैं..
उन्हें समझने और समझाने का प्रयास करते हैं..
पर नकरात्मक शक्तियां उन शुभचिंतकों को भी एक एक करके अलग करने लग जाती हैं,वो उन शुभचिंतकों को इस रूप में प्रदर्शित करने लग जाती हैं,
कि “वो ही उनके शत्रु हैं..”
नकरात्मक शक्तियां परजीवी होती हैं,वो नहीं चाहती आप उन लोगों के साथ रहें,जिनके साथ रहने से आप जीवन में उन्नति कर रहे हैं,जीवन के उद्देश्य को समझ रहे हैं,क्योंकि अगर आप समझ गए सब कुछ,और प्रभु का दिया काज करने लगे,तो ये उनकी पराजय होगी..
और उन्हें पराजय स्वीकार्य नहीं..
इसलिए वो आपके सबसे सगे होने का ढोंग कर,
आपको उन लोगों से एक एक कर दूर करते जाते हैं,
जिनके साथ आप वो बनने वाले थे,जिस उद्देश्य से आपने इस शरीर में जन्म लिया है।
आपको अकेला कर,वो आपके मन के भीतर कन्फ्यूजन क्रिएट करते हैं,आपके स्वयं के प्रति,वो आपको वो क्षणिक आनंद देते हैं,जिसकी आपको लत लग जाती है,और उस मायावी आनंद से दूर करने वाले हर व्यक्ति को शत्रु
और षड्यंत्रकारी समझने लगते हो..
और ऐसे ही वो नकरात्मकशक्ति विजय प्राप्त करती हैं..
आपने अपने आसपास ये अनुभव किया होगा,कुछ लोग होते हैं,जिनके भीतर कई संभावनाएं दिखती थीं पहले,वो एक समय के पश्चात भटकते या स्वयं को अलग थलग करते या उनका व्यवहार अचानक से बदलता दिखता है,और फिर वो आशा की किरण स्याह अंधेरे में समाप्त हो जाती है,ऐसा होने के कई कारण होते हैं,और कभी कभी(अधिकतर) वो कारण आपकी सोचने समझने की शक्ति के बाहर के होते हैं..
ये लोग जिनमें असीम संभावनाएं हैं,जिनके कारण विश्व में बड़े बदलाव आ सकते हैं,वो एक कॉस्मिक षड्यंत्र के चलते उन नकरात्मक शक्तियों से प्रभावित भ्रष्ट हो चुके लोगों को अपने चहुं ओर इकट्ठा करने लगते हैं,और उनसे दूर होने लगते हैं जो उनके उत्थान में सहायक होते,ये नकरात्मक शक्तियां किसी को भी अपना माध्यम बना कर इन्हें दिग्भ्रमित करती हैं,और ये लोग जिनकी समझ औरों से अधिक थी..ये अपनी बुद्धि और अपने इंस्टिंक्ट्स का उपयोग करना बंद कर देते हैं,या कहें इनके सारे द्वार बंद कर दिए जाते हैं..और फिर वो नकरात्मक शक्तियां अपने परजीवी प्यादों से उनसे वो काम करवाती हैं,जिनसे उनकी सकरात्मक शक्ति क्षीण होने लगती है और वो फिर वही करते हैं जो ये नकरात्मक शक्तियां चाहती हैं..
इन शक्तियों से वो ही स्वयं को बचा पाते हैं,जिनका आभामंडल सदृढ़ है,और वो अपने आभामंडल को सदृढ़ बनाए रखने हेतु नित्य प्रयास करते हैं,जिस प्रकार आपकी फिजिकल फिटनेस आवश्यक है और उसके लिए आपमें से कुछ लोग जिम जाते हैं,कुछ घर पर या पार्क/मैदान में व्यायाम या योग करते हैं।उसी प्रकार अपने स्पिरिचुअल और आत्मा की फिटनेस हेतु आपको ध्यान साधना करते रहना चाहिए, उन सकारात्मक शक्ति पूंजों (देवस्थलों) के पास बैठ ध्यान करना चाहिए और आत्मचिंतन कर पूछना चाहिए,कि जो आप कर रहे हैं,वो गलत तो नहीं,जो भी कुछ हो रहा है आपके साथ क्यों हो रहा है और उसका कारण क्या है,ये वहां बैठ स्वयं से पूछें,और आपको उसके उत्तर मिलेंगे,थोड़ा समय लगेगा पर मिलेंगे,आपको पता चलने लगेगा कि कौन किस उद्देश्य से आपके साथ है,और कौन किस उद्देश्य से आपको एक एक कर आपके शुभचिंतकों से अलग करता जा रहा है,बस तब आपको उन उत्तरों पर विश्वास कर,जैसे आप प्रभु पर विश्वास करते हैं,उसी समय उन नकरात्मक शक्तियों से प्रभावित लोगों से स्वयं को दूर कर लेना है,चाहे वो कोई भी हों,कितनी भी आत्मीयता दिखाते रहे हों आपसे,वो आपके लिए सही नहीं,क्योंकि वो आपको आपके उद्देश्य से भटका रहे हैं,वो आपको अपनी तरह बनाना चाहते हैं।
एक भ्रष्ट हो चुकी आत्मा चाहती है कि सब उसकी तरह ही भ्रष्ट हो जाएं,इसलिए वो पूरा प्रयास करती है,दूसरी निष्पाप आत्मा को भ्रष्ट करने का या उनकी छवि को धूमिल कर,उनके सहयोगियों से उन्हें अलग करने का..
ये चिर काल से चलता आ रहा है,ये चिर काल तक चलता रहेगा,ये सृष्टि का वो नियम है,जिसमें स्वयं प्रभु भी इन्वॉल्व नहीं होते,वो नकरात्मक शक्तियों को खुली छूट देते हैं, कि वो हमें भ्रष्ट करने का प्रयास करें, जगतपिता देखना चाहते हैं उनकी कौनसी संतान कितनी सदृढ़ है,और कौनसी कमज़ोर,वो संकेत दोनों को देते हैं,और जो सदृढ़ है,वो उन संकेतों को समझ जाता है,जो कमज़ोर है वो उन्हें देख कर भी इग्नोर करता है और एक और जन्म बर्बाद कर देता है,और इसी में नकरात्मक असुरीय शक्तियों की जीत होती है,ये आप पर निर्भर करता है कि प्रभु के दिए संकेतों को आप समझें या उन्हें इग्नोर कर पथभ्रष्ट हो उनके जैसे हो जाएं जो मात्र आपका अहित चाहते हैं..
ये ही तो वो परीक्षा है..
प्रभु आपके शिक्षक हैं,गुरु हैं..
वो कठोर तो हैं,पर वो आपको स्नेह भी करते हैं और वो किसी न किसी को निमित बना कर,आपको संकेत देते हैं,ताकि आपको कठिन प्रश्न का उत्तर स्मरण हो जाए और आप परीक्षा में वो सफलता पाएं,
जिसके आप अधिकारी हैं..
समय है,संकेत चहुं ओर हैं
ध्यान दीजिए..
और उन्हें समझ अपने जन्म को सफल बनाएं
या आसुरी शक्तियों द्वारा पोषित परजीवी के प्यादे बन,
अपना ये मौका भी गंवाएं…
आपको
मंथरा की सुन कैकेई बनना है,
या
श्री कृष्ण की सुन अर्जुन बनना है..
नीति आपकी
निर्णय आपका
नियति आपकी

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