Home लेखकBhagwan Singh पुराणों का सच भाग – 4

पुराणों का सच भाग – 4

Bhagwan Singh

by Bhagwan Singh
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पार्जिटर भारतीय पौराणिक इतिहास सही क्रम में इसलिए नहीं रख सके उन्हें अपने पाठ को उन मान्यताओं से समायोजित करना पड़ रहा था, जिनको बिना परखे सर्वानुमति सी मिल गई थी और वे दूसरे प्रमाणों का निकष बन गई थीं । पुराणों में मनु को अनेक रूपों में दर्शाया गया है। पुराण राज्य सत्ता स्थापित होने के हजारों साल बाद लिखे जा रहे थे, इसलिए इनमें पृथु और उनके पिता वेन को, और असुर बलि को राजा के रूप में दिखाया गया है और मनु को भी प्रथम राजा के रूप में चित्रित किया गया है। परंतु इन सभी के साथ कुछ अन्य विशेषताएं भी जुड़ी हुई हैं, जिनसे इनकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका का पता चलता है। पुराणों में ब्राह्मणों ने अपनी महिमा दिखाने के लिए अनेक चरित्रों का सत्यानाश कर दिया है। इनमें वेन भी आते हैं। ऋग्वेद में उनकी भूमिका कुछ अधिक सुलझे रूप में आई है। ‘अथर्वा ने सबसे पहले यज्ञ से मार्ग प्रशस्त किया और उसी का अनुगमन व्रतनिष्ठ वेन ने किया, जिससे एक नया आलोक पैदा हुआ। उशना काव्य ने अपने जनों के साथ अन्यत्र प्रस्थान किया। हम यम से उत्पन्न अमरता की साधना (यजन) करते हैं।’
यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि ।
आ गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे ।। 1.83.5
हमने इस ऋचा को जिस रूप में प्रस्तुत किया है वह किंचित अटपटा है। कारण, इसमें कई अवस्थाओं का एक साथ संयोजन कर दिया गया है। यज्ञ का मार्ग पहली बार तैयार करना कृषि का आरंभ है। कृषि के आरंभ को सूर्योदय या नए युग का आरंभ बताया गया है। अन्यत्र भी इसे इसी रूप में प्रस्तुत किया गया है
भाषा, पशुपालन, कृषि, वानिकी, उर्वरा भूमि, खनन और जलप्रबंधन के गुर सिखाते हुए सूर्योदय करते हुए समूचे जगत में आर्यव्रत का प्रसार किया ( ब्रह्म गां अश्वं जनयन्त ओषधीः वनस्पतीन् पृथिवीं पर्वतान् अपः । सूर्यं दिवि रोहयन्तं सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि। ऋ. 10.6.11)
उशना या शुक्राचार्य जो असुरों के गुरु हैं और जिन्हें राजा बलि का गुरु बताया जाता है. उनका प्रस्थान, बलि के पाताल जाने के विवरण से मिलाकर देखा जा सकता है। कृषि का आरंभ दुर्दिनों में हुआ था। प्राकृतिक साधनों के क्षीण हो जाने के कारण दुर्भिक्ष की स्थिति आ गई थी। कृषि को अमरता प्रदान करने वाले प्रयास के रूप में चित्रित किया गया है (यह है यम से अमरता की उत्पत्ति)। शतपथ ब्राह्मण में यह कुछ अधिक स्पष्ट रूप में वर्णित है – वरुणप्रघासैः वै प्रजापतिः प्रजा प्रामुंचत् ता अस्य अनमीवा अकिल्विषाः प्रजाः प्राजायन्त, शत.ब्रा. 5.2.4.2. यहां वरुणप्रघास का अर्थ है धान और जव अर्थात् कृषि से उत्पादित अन्न । अर्थात् उत्पादित अनाज से प्रजापति ने प्रजा को अभावों से मुक्ति दिलाई। अब वह नीरोग (अनमीव) और निष्पाप (अकिल्विष) पैदा होने लगी। हम जल को अमृत कहते हैं, कारण जल के अभाव में मृत्यु निश्चित है। अन्न को अमृत कहा गया, कारण स्पष्ट हो गया होगा। श्वसन को प्राण कहते हैं और श्वास के व्यायाम को प्राणायाम कहते हैं। हमारी सांस्कृतिक शब्दरचना को बहुत सावधानी से परखा और पढ़ा जाना चाहिए।
पृथु या पृथ्वी का विस्तार करने वाले, जिनके साथ यह विश्वास भी जुड़ा हुआ है कि उन्होंने यह नियम बनाया कि जिस व्यक्ति ने जितनी धरती को, समतल, झाड़-झंखाड़ से मुक्त करके कृषि के योग्य बनाया है और आगे बनाएगा, उसका उस धरती पर सदा के लिए अधिकार हो जाएगा।
वन्य भूमि की आग की सहायता से सफाई करने वालों को ‘ब्राह्मण’ (भो. बरल-जलना, बारल-जलाना; बरियार – शक्तिशाली; बरम-अग्नि, ग्राम देवता, गृहदेवता -वास्तोष्पति); या देव (ती-आग, अग्नि के गुणों वाला, तिक्त, तीता, तिग्म, तीक्ष्ण, तिथि) जो घोषप्रेमी समुदाय में पहुंचने पर दी -आग; देवन -जलाना; दिवस – नया प्रकाश/ तिथि; देव- आगजनी के कारण इन्हें कहते थे। ये शब्द कर्म प्रधान थे पर बाद के ‘नकली’ ब्राह्मण (आज के सभी ) आर्यों के दावेदार बने, नारा लगाते रहे कि, समस्त पृथ्वी पर उनका अधिकार था और उन्होंने इसे क्षत्रियों को दे दिया।
परंतु न वेन राजा थे, न पृथु । इनके बीच पिता पुत्र का संबंध भी नहीं है। क्या संबंध है, यह हम बता चुके हैं। परंतु ऐसे मामलों में हम जो कुछ कहते हैं वह संभावना है तथ्य नहीं। हमने वेन को झूम खेती के चरण का प्रतीक बताया है और पृथु को स्थाई खेती का। मनु की ऐतिहासिकता कृषि से जुड़ी है। कृषि के आरंभ की पश्चिमी पुराण कथाओं का भारतीय पुराण कथाओं से तुलनात्मक अध्ययन हमने अन्यत्र कर रखा और दोनों में इस बात पर सहमति है कि ईदन का उद्यान (इंद्रोद्यान) पूरब में था, जहांं देवों को निवास था, जहां से आदम निकाले गए थे और धरती (पश्चिम एशिया) में पहुंचे थे। भारतीय पुराणकथा के अनुसार मनु के दश पुत्रों ने समूची धरती पर अधिकार कर लिया था, जिसे राजसत्ता स्थापित करने से जोड़ने के कारण पार्जिटर दुनिया को भारत तक सीमित कर देते हैं, जब कि वास्तविक संदर्भ कृषिविद्या के प्रसार का है। पर ऐसी दशा में मनु का संबंध झूम-खेती के चरण से होना चाहिए जिसमें असुरों-राक्षसों द्वारा उत्पीड़ित देव प्राण रक्षा के लिए चिंतित और कृषिकर्म के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो कर देश-देशांतर में भागते फिर रहे थे।
यदि पार्जिटर ने मनु को कृषि का आविष्कर्ता माना होता तो उनके सामने यह स्पष्ट होता कि वह राजा नहीं हो सकते थे। संभव है इतना स्पष्ट संकेत होते हुए भी उनके मन में यह झिझक रही हो कि कृषि का आविष्कार तो पश्चिम एशिया में हुआ था, फिर भारत में इसकी कल्पना की ही नहीं जा सकती। इसलिए, उनको मलु की राजा की छवि अधिक रास आई । राज-संस्था का उदय कृषि के आरंभ के हजारों साल बाद हुआ। इसलिए उन्हें पश्चिमोत्तर से न सही हिमालय के उत्तर से आर्यों का आक्रमण कराने की आवश्यकता पड़ी। इसका निहितार्थ सभ्यता के प्रसार की दृष्टि से भले यह हुआ कि एशिया और यूरोप में भाषा, धर्म और सभ्यता का प्रसार भारत से हुआ, जो सभी साक्ष्यों से सही सिद्ध होता है, यद्यपि इसे स्वीकृति नहीं मिल सकी है, परन्तु भारतीय संदर्भ में आर्यों के आक्रमण की सारी अनर्गलताएं कुछ विचित्र रूप में बनी रह जाती हैं।
यहां हम पार्जिटर को वही राग अलापते देखते हैं जो पश्चिमोत्तर से किए गए आक्रमणों में दोहराए जाते रहे हैं। अर्थात् भारत में उत्तर से दक्षिण तक द्रविड़ जाति के लोगों का अधिकार था। उन्होंने एक उन्नत सभ्यता का निर्माण कर रखा था। आर्यों ने उनके ऊपर आक्रमण किया। यद्यपि द्रविड़ों ने आर्यों का बड़ी दिलेरी से मुकाबला किया, सैकड़ों हजारों ने अपने प्राण देकर अपनी रक्षा करनी चाही, परंतु उत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों के दुर्दांत आक्रांताओं के सामने वे टिक न सके। उनका सारा प्रयास बेकार गया। खुशहाली में पली भारतीय संतानों के मामले में ऐसा ही सदा से होता आया है । आर्य आक्रमणकारियों ने उनकी बस्तियों में आग लगा दी और दुर्गों को ध्वस्त कर दिया और बहुतों को गुलाम बना दिया । उत्तर भारत से उन्हें भगा दिया। रोचक बात यह है कि अभी तक हड़प्पा सभ्यता का पता नहीं चला था। जिसके विध्वंस के विषय में मॉर्टिमर व्हीलर ने नरसंहार का ऐसा ही चित्र पेश किया था जो जांच के बाद काल्पनिक सिद्ध हुआ।
लेकिन हम उनके मूल के बारे में जो कुछ भी सोच सकते हैं, उसे यह निश्चित लगता है कि इस देश की आर्य विजय से पहले उत्तरी और दक्षिणी भारत दोनों में द्रविड़ों का वर्चस्व था…। द्रविड़ों को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा, और ऋग्वेद में ऐसे कई मार्ग हैं जो संघर्ष की गंभीरता को दर्शाते हैं। लेकिन सब व्यर्थ। इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि भारत के थल पुत्र, अपनी सामान्य मिट्टी में पैदा हुए और पले-बढ़े, उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों के नए हार्डी पर्वतारोहियों के लिए कोई मुकाबला नहीं है, जो अनियमित अंतराल पर देश में आए थे। द्रविड़ इस नियम के अपवाद नहीं थे। उन्होंने विभिन्न युद्धक्षेत्रों में सैकड़ों और हजारों की संख्या में अपने प्राणों की आहुति दी और अंततः आक्रमणकारियों के हमले के आगे घुटने टेक दिए। उन्होंने वास्तव में एक बहादुर लड़ाई लड़ी, लेकिन आर्यों ने उनके महलों को नष्ट कर दिया, उनके घरों को जला दिया, और बड़ी संख्या में उन्हें गुलाम बना दिया। पी .21
परंतु पार्जिटर जो विलक्षण काम करते हैं वह है पुराणों में दिखाए गए मनु और उनके पुत्रों में से एक ऐल को मनु पर आक्रमण करने वाला आर्य सिद्ध करना। उन्हें ऐसा लगता है कि शायद मनु, पुरूरवस, और सुद्युम्न के तीन प्रभावशाली वंशों (रेसेज) की एकमूलीयता सिद्ध करने के लिए उनको एक में पिरो दिया गया है, जब कि वे प्रकट रूप से तीन भिन्न वंशों प्रतीत होते हैं
ऐसा लगता है कि मनुज, पुरुरवा और सुद्युम्न से व्युत्पन्न तीन अलग-अलग प्रमुख जातियों की उत्पत्ति को एकजुट करने के प्रयास में तीन अलग-अलग मिथकों को एक साथ मिश्रित किया गया है, और जाहिर तौर पर तीन अलग-अलग स्टॉक का गठन किया गया है। 288
इनमें से पहला वंश विख्यात ऐल या ऐड वंश है जिसे प्रायः चंद्रवंशी कहा जाता है, क्योंकि इसके विषय में यह कथा प्रचलित है कि सोम, अर्थात् चंद्रमा से उत्पन्न है। दूसरे वंश को सौद्युम्न्य वंश के रूप में पहचाना जा सकता है, और जैसा कि हमने पृष्ठ 255 पर दिखाया है, इसकी इतिहास में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही। तीसरे का कोई आम नाम नहीं है, फिर भी इसकी व्युत्पत्ति विवस्वान् के पुत्र, मनु, से दिखाई गई है इसलिए उसे सूर्यवंश कहा जा सकता है।
उपरोक्त तीन राज्यों सहित शेष भारत पर कब्जा करने वाले मानव स्टॉक, स्वाभाविक रूप से खुद को द्रविड़ घोषित करने के लिए लगता है। 295
द्रविड़ों के मध्येशिया से आने और उत्तरी भारत में बसने और दक्षिण तक फैल जाने की बाकी कहानी वही है, पर इनमें से कोई पौराणिक साक्ष्यों पर आधारित नहीं है। अपने अध्यवसाय के बाद भी पार्जिटर अपनी जमीन पर टिके न रह सके और इतने मौलिक सुझावों के बाद भी अंतर्वस्तु का सही विवेचन न कर सके। हम उनके पाठ का विवेचन अगली पोस्ट में करेंगे

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