Home राजनीति प्रधानमंत्री मोदी की डेनमार्क यात्रा का महत्त्व | प्रारब्ध

प्रधानमंत्री मोदी की डेनमार्क यात्रा का महत्त्व | प्रारब्ध

लेखक - अमित सिंघल

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प्रधानमंत्री मोदी की डेनमार्क यात्रा का महत्त्व द्विपक्षीय संबंधो को प्रगाढ़ करने से कहीं अधिक वृहद है।
कारण यह है कि डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, फ़िनलैंड, एवं आइसलैंड – यह पांच स्कैंडिनेविया एवं नार्डिक समूह के राष्ट्र है।
यह सभी राष्ट्र मानवाधिकारों, हैप्पीनेस या प्रसन्नता, आर्थिक समानता, लोकतंत्र, मीडिया फ्रीडम, भ्रष्टाचार की अनुभूति, आर्थिक समानता, प्रति व्यक्ति आय, महिला-पुरुष समानता, पर्यवरण संरक्षण, शिक्षा जैसे सूचकांकों या मापदंडो में टॉप पर पाए जाते है।
अतः इन राष्ट्रों में अन्य विकासशील देशो को लेक्चर पिलाने की प्रवृत्ति होती है। साथ ही, यह पांच देश अंतर्राष्ट्रीय संगठनों एवं मंचो पर भी अन्य देशो की अनावश्यक या बेसिरपैर की आलोचना करने से नहीं चूकते।
अनावश्यक इसलिए लिखा क्योकि केवल स्वीडन की जनसँख्या एक करोड़ है; डेनमार्क, नॉर्वे, एवं फ़िनलैंड 55-60 लाख में सिमट जाते है। आइसलैंड की जनसँख्या केवल साढ़े तीन लाख है। सभी देशो में एक ही प्रमुख धर्म, त्वचा का रंग, जलवायु (सफ़ेद ठंड या हरी ठंड), भोजन एवं भाषा है। कभी भी विधर्मी देशो से आक्रमण नहीं झेला। कोई विविधता नहीं है।
हाल के वर्षो में कुछ सांप्रदायिक दंगे या आतंकी हमले झेले है, वह भी कुछ विश्लेषकों के अनुसार (यह मेरी राय नहीं है) पिछले दो दशक में आये किसी अन्य धर्म के अनुनाइयो के द्वारा एकतरफा किये गए है।
अतः डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेत्ते फ्रेदरिकसन के द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को एयरपोर्ट पर रिसीव करना; प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में डेनमार्क की महारानी द्वारा राजकीय भोज का आयोजन (सामान्यतः संसदीय सरकार में ऐसा भोज एक प्रधानमंत्री दूसरे प्रधानमंत्री को देते है; जबकि राष्ट्रपति प्रणाली में जहाँ कोई प्रधानमंत्री नहीं होता, वहां राष्ट्रपति ऐसे भोज का आयोजन कर सकते है) अत्यधिक महत्वपूर्ण घटना है।
तद्पश्चात, प्रधानमंत्री मोदी ने सभी पांच नार्डिक देशो के प्रधानमंत्रियों से बहुपक्षीय एवं द्विपक्षीय मीटिंग की जिसमे सुरक्षा, व्यापार, निवेश, पर्यावरण, विकास, डिजिटल इकॉनमी, रिसर्च, सांस्कृतिक विषयो इत्यादि पर विचार-विमर्श हुआ।
अब आते है डेनमार्क यात्रा के वास्तविक महत्त्व पर।
कुछ वर्षो से नक्सल एवं टुकड़े-टुकड़े गैंग भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर अलग-थलग तथा अपमानित करने का प्रयास कर रहा था। NGO तथा धर्मपरिवर्तन समर्थको द्वारा बनाये जाने वाले सूचकांकों पर भारत की रैंक को जानबूझकर गिराया जा रहा था।
यह हालत कर दी कि भुखमरी सूचकांक के अनुसार भारत में नेपाल, श्री लंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, एवं म्यांमार की तुलना में अधिक भुखमरी है। लोकतंत्र सूचकांक में भारत को ऐसे देशो से भी नीचे रखा गया है जहाँ संयुक्त राष्ट्र के शांति या राजनैतिक मिशन है। भारत में भीषण निर्धनता समाप्त होने के बाद अब वे तीन-चार वर्ष पुराने आंकड़ों से रिपोर्ट बना रहे है जिससे रैंक कम की जा सके। वैज्ञानिक पद्धति की जगह गिनती के गुमनाम एवं अनजान विशेषज्ञों के सर्वे के आधार पर रिपोर्ट बनाते है।
देशतोड़क शक्तियों का आईडिया था कि इतनी नेगेटिव कवरेज करवाओ कि प्रधानमंत्री मोदी इन शक्तियों से समझौता कर ले या फिर उनकी विश्वसनीयता विश्व, विशेषकर भारत, में समाप्त हो जाए।
लेकिन विश्व नेतृत्व को पता है कि प्रधानमंत्री मोदी क्या कर रहे है और भारत में क्या हो रहा है। कारण यह है कि उनके दूतावास एवं ख़ुफ़िया तंत्र अपनी राजधानी को विस्तार से वस्तुस्थिति से अवगत कराते रहते है।
तभी विश्व के नेतागण प्रधानमंत्री मोदी का दोनों हाथों से स्वागत कर रहे है और विश्व के उद्यमी भारत में निवेश कर रहे है।
तभी डेनमार्क के एक प्रमुख समाचारपत्र ने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के समय हेडलाइन छापी कि सभी राष्ट्र भारत से मित्रता चाहते है।
इस यात्रा से सिद्ध हो गया कि नक्सल एवं टुकड़े-टुकड़े गैंग द्वारा भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर अलग-थलग तथा अपमानित करने का प्रयास विफल हो गया।

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