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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानी हमारा BHU

Akansha Ojha

by Akansha Ojha
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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानी हमारा BHU,
स्वायत्तशासी विश्वविद्यालय हुआ करता था लेकिन आजकल महज सरकार का पैराकार बन कर रह गया है।
आश्चर्य होता है सरकार की ऐसी दुरावकारी तुष्टीकरण नीतियां अब बीएचयू में फलफूल रही हैं। क्या कोचिंग सैंटर पर सिर्फ एक विशेष वर्ग और जाति का अधिकार होना चाहिए।
क्या गरीब सवर्णों को अब अधिकार नही फ्री कोचिंग का।
जैसा कि मैने पहले एक पोस्ट में लिखा था BHU को JNU बनाने का प्रयत्न जैसी भूल बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
जब वहां की दीवारों को “ब्राह्मणों की कब्र खुदेगी, बीएचयू की धरती पर” लिखकर रंगा गया था।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय सरकारी अनुदान से बना विश्वविद्यालय नहीं है। यह विश्वविद्यालय गांव वालों के दान और महामना के त्याग और विराट परिकल्पना से निर्मित विश्वविद्यालय है। इसलिए व्यावसायिक केंद्र नहीं बन सकता। व्यावसायिक दृष्टि भौतिक लक्ष्य की ओर ले जाती है और आत्मिक दृष्टि सांस्कृतिक एकत्व की ओर। यह विश्वविद्यालय सांस्कृतिक एकत्व की परिभाषा गढ़ता है। इसीलिए अपने अंतर्विरोध और विसंगति के बावजूद यह ‘प्रिय’ है।
3000 वर्षों से सीखने और सभ्यता का केंद्र काशी के ही प्रतिबिम्ब को दर्शिता है बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
जिस तरह वाराणसी में वैष्णववाद और शैववाद का सामंजस्य है।
काशी की सांस्कृतिक परंपरा की तरह ही हिन्दू विश्वविद्यालय ‘वस्तुनिष्ठ विश्वविद्यालय’ है। वस्तुनिष्ठ होने का अर्थ समूह-सृजन की एका है। एक सामूहिक आकांक्षा की प्राप्ति, जहां वैयक्तिक अनुभूति-प्राप्य समूह की आकांक्षा के सापेक्ष निर्मित-विकसित होती है। समूह-सृजन की आकांक्षा हिन्दू विश्वविद्यालय को ‘क्लासिक विश्वविद्यालय’ बना देती है। इस ढंग से वैयक्तिक मनोवृत्तियों की आकांक्षा अन्य विश्वविद्यालय को स्वच्छंदतावादी बना देता है। तो समूह की आकांक्षा के तले वैयक्तिक एहसास यानी प्रेम एक अतृप्ति का आख्यान, मिथ रचता है।
एशिया का सबसे बड़ा आवासीय परिसर…। लगता है आधुनिक गुरुकुल हो…जहां गुरु-शिष्य की सामूहिक चेतना एक साथ उर्द्धवशील होती हो। जीवन की प्राप्ति केवल पुस्तक या विषय तक नहीं है, बल्कि जीवन के गूढ़ सत्य तक है; यह समझ , सीख काशी हिंदू विश्वविद्यालय हमें प्रदान करता है। हिन्दू विश्वविद्यालय सांगठनिक मनोरचना का राजनीतिक वितान नहीं रचता। यहां छात्र और अध्यापक या छात्र और संस्था के रिश्ते व्यावसायिक संबंध से ज़्यादा आत्मीय रूप में विकसित हुए हैं। इसीलिए यहां का छात्र संस्था छोड़ने के पश्चात …व्यावसायिक हितों से दूर जाने के पश्चात इस विश्वविद्यालय के प्रति ज़्यादा भावायुक्त होता है। बड़ा विचित्र और सुखद है कि व्यावसायिक हितों से दूर हटकर इस विश्वविद्यालय की समझ ज़्यादा पुख़्ता होती जाती है। बड़े शहर, आत्मीय रिश्ते, बड़ी संस्था से दूर होकर हम ज़्यादा साथक हो पाते हैं। स्वार्थ या व्यावसायिक रिश्ते एक समय के पश्चात समाप्त हो जाते हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय अध्यापक, पाठ्यक्रम, तकनीक तक सीमित संस्था नहीं है। यह छोटे-छोटे तथ्यों-परिवेश से बनकर एक बड़ा वितान रचता है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की अध्यापकीय संरचना पाठ-केंद्रित है, विमर्श केंद्रित नहीं। विमर्श तात्कालिक सत्यों पर प्रमुखतः टिकते हैं किंतु पाठ में काल का सातत्य होता है। एक ऐसे सत्य की परिकल्पना जो काल के व्यापक सत्यों तक संचरण शील होती हो। पाठ की मूल संरचना सांस्कृतिक बोध का अवगाहन करती है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मनोरचना में शाश्वत सत्य ही पाठ्यक्रम को पुस्तक से निकाल कर जीवनबोध में ढाल देता है।
अर्थ यह कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कोई एक बिम्ब हमारे मन-मस्तिष्क में नहीं अंट पाता। इसका एक बिम्ब हो भी नहीं हो सकता। बड़ी चीजों के एक बिम्ब होते भी नहीं। बड़े विचार, बड़ी संस्था के अपने-अपने बिम्ब हुआ करते हैं। जैसे हम सब के पास काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अपने-अपने बिम्ब हैं।
यही अनुभव का संधान हिन्दू विश्वविद्यालय को विराट बिम्ब में सिरज देता है।
पहले मैं आश्वस्त थी और मुझे पूर्ण विश्वास था बीएचयू से जुड़े और इस विश्वविद्यालय के लिए समर्पित विद्वतजन कभी इसे JNU जैसी विचारधारा में नही परिणत होने देंगे। लेकिन तुष्टीकरण की यह विध्वंसकारी नीतियाँ जब महामना के ज्ञान मंदिर की चौखट लांघ चुकी है तो इसके परिणाम भी सुखद नही होंगे।

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