Home आर ऐ -ऍम यादव ( राज्याध्यक्ष) भाऊ, शिवसेना और मोदी – भाजपा से नाराज मठाधीश

भाऊ, शिवसेना और मोदी – भाजपा से नाराज मठाधीश

आर ए एम देव

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असल में इस आलेख का संबंध भाऊ तोरसेकर जी और शिवसेना से नहीं है, उनका उल्लेख केवल इसके लिए किया है क्योंकि भाऊ ने अपने एक मराठी विडिओ में एक मुद्दा बेहतरीन तरीके से उदाहरण दे कर समझाया था जिसका केन्द्रबिन्दु शिवसेना थी। वही मुद्दा लिखने का प्रयास कर रहा हूँ इसलिए भाऊ और शिवसेना का उल्लेख अपरिहार्य है। बाकी भाऊ को प्रशंसा की जरूरत नहीं और इस लेख में शिवसेना की भी प्रशंसा नहीं।

 

अस्तु,मुद्दे पर आते हैं।
अपने विडिओ में भाऊ ने बताया था कि महाराष्ट्र में जो दीर्घकाल काँग्रेस की मोनोपॉली रही १९९५ तक उसका कारण इतना ही था कि विपक्ष काँग्रेस की आलोचना तो बहुत करता था, लोग आलोचना सुनते भी थे । बड़े बड़े दिग्गज वक्ता थे विपक्ष के नेता जिनको सुनने के लिए जनता भी आती थी। बड़ी बड़ी जन सभाएँ होती थी जिनका दूसरे दिन अखबारों में बड़ा बड़ा कवरेज भी आता था।
लेकिन सत्ता में तो काँग्रेस ही आती थी। फिर १९९५ में बालासाहब ने जनतासे कहा कि हमें सत्ता सौंपिए, हम सरकार चलाएंगे। और शिवसेना चुनकर आ गयी, सत्ता में भी आ गयी।
बकौल भाऊ – और मैं सहमत हूँ – जनता तो कई सालों से भरी बैठी थी। शिवसेना ने मत मांगे और कहा कि हम सरकार बनाएंगे। जनता ने मौका दे दिया। बाकी विपक्ष बस आलोचना करता रहा लेकिन एक हो कर जनता से यह कभी नहीं कहा कि लो जी ये हम सभी एक हुए हैं, हमें मौका दीजिए, हम सरकार चलाएंगे। वे केवल अपनी अपनी ढपली लेकर अपने अपने राग में आलोचना करते रहे।
जनता के लिए यह केवल एंटेरटेनमेंट और अधिक हुआ तो इरिटेशन था। काँग्रेस को तो जनता समझ रही ही थी लेकिन ये विपक्षी एक हो कर सत्ता नहीं मांग रहे थे, जिम्मेदारी स्वीकारने की बात नहीं कर रहे थे बल्कि केवल काँग्रेस की बखियाँ उधेड़ रहे थे । शिवसेना ने केवल आलोचना ही नहीं की, चुनौती स्वीकार की और जनता से कहा हम सरकार चलाएंगे, एक मौका तो दो !
कैसी सरकार चलाई आदि यहाँ विषय नहीं है। बात जिम्मेदारी स्वीकारने की है। जनता ने मौका दिया। तब। आज मोदी भाजपा से नाराज दक्षिणपंथी मठाधीशों को यही बात सोचनी चाहिए। वैसे आप का अपील और आप की आपसी एकता देख ली दिल्ली के उस सभा में जहां कई बड़े नाम बिना सहमति लिए गए और बाद में लीपापोती के विडिओ बनते रहे। बहुत कम लिखा, अधिक समझ जाएँ।
बस इतनी सी एक बात सोचिए, आप तो चुनाव के समय दुबारा भाजपा को ही वोट देंगे, लेकिन आप के जिन फॉलोवर्स को आप ने भाजपा से विमुख कर दिया हो और जो वोट देने ही न जाएँ, तो क्या होगा ? विपक्षियों के बंधे वोट तो उनको मिलेंगे, क्या आप इन विमुख किये फॉलोवर्स को वापस भाजपा को वोट करने कन्विन्स कर पाएंगे ? और अगर दुर्भाग्य से आप के कारण काँग्रेस या वामपंथी सत्ता पर आए तो क्या वे आप को बख्शेंगे ? मोदी भक्त होना जरूरी नहीं, कॉमन सेंस से ही काम लीजिए, बहुत होगा। वसुंधरा की जितनी आलोचना राजस्थान के लोग करते थे, गहलोत की नहीं करते। और कमलनाथ के आते तो जो डर फैला था और भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुई थी क्या भूल जाते हैं हम लोग ? माफ कीजिएगा मित्रों, लेकिन कृपया समय निकालकर आर्ट ऑफ वॉर, मकियावेली, चाणक्य, और पंचतंत्र भी, अवश्य पढ़ लीजिए। अपनी अगली पीढ़ी को भी जोड़ लीजिए। हम आज इस स्थिति में इसीलिए आए हैं क्योंकि हमारे शत्रुओं ने हम से बिनवजह शत्रुत्व करने की सीख अपनी हर पीढ़ी को दी हुई है। हजार साल से अधिक, सैंकड़ों पीढ़ियों को। और हमारे ही बीच से ऐसे लोगों को चुना जिन्होंने हमें भूलना सिखाया।
मिटना नहीं है तो हमें भी अपनी अगली पीढ़ियों को साथ जोड़ना होगा। सभी दक्षिणपंथी, हिन्दुत्ववादी, राष्ट्रवादी सोशल इंफ्लुएंसर्स से हाथ जोड़कर इतनी ही बिनती है।

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