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भारतीय ज्ञान परंपरा का विरोध

by Pranjay Kumar
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यह मूलतः एक शोधपरक लेख है, जो लगभग 4-5 पृष्ठों में लिखा गया है। यह प्रमाणित होता आया है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए बल्कि भारत के मूल निवासी थे। हर नवीनतम शोध व अनुसंधान भी यही निष्कर्ष देता है, फिर भी वामपंथियों एवं उपनिवेशवादियों के हाथों अपनी बौद्धिकता को गिरवी रख देने वाले कथित बुद्धिजीवी अपना दुराग्रह छोड़ने को तैयार नहीं! और बात केवल उनके दुराग्रह को छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके ‘गुर्गे व लठैत’ अकादमिक संस्थानों-विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में होने वाले हर नवीन शोध, अनुसंधान व बहुपक्षीय विमर्श के प्रति यही दृष्टिकोण रखते हैं। विडंबना यह है कि लगातार ऐसी दादागिरी करने के बाद भी वे स्वयं को ‘लिबरल-सेकुलर-इंटलैक्चुअल’ समझने और दूसरों के ”तथ्यात्मक, लोकसम्मत, प्रामाणिक, सत्याधारित मत-विचार” को भी ”प्रतिगामी-पुरातनपंथी-फासीवादी” कहते व दुहराते रहने को अपना विशेषाधिकार मानते हैं। अकादमिक जगत में उन्होंने एक ऐसा ‘बौद्धिक-शैक्षिक’ वातावरण रचा है कि ठसक से सत्य को सत्य कहने और झूठ को झूठ कहने में भी लोग गुरेज़ करते हैं। उनकी सल्तनत जाती रही, पर ‘ख़लीफाई’ और ‘सुल्तानियत’ आज भी बची है।
यदि सचमुच आप उन्हें चुनौती देना चाहते हैं तो युवा पीढ़ी तक ऐसे लेखों को पहुँचाएँ। इसे #अधिकाधिक #साझा करें। इसे मैं सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का हिस्सा मानता हूँ। जितना महत्त्वपूर्ण इसे लिखा जाना है, उससे कम महत्त्वपूर्ण साझा करना नहीं। आज #दैनिक_जागरण और #नई_दुनिया में….. कृपया पढ़ें
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