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भारत में सेक्यूलरिज्म का पाखंड

Dayanand Pandey

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जिस दिन लोग देश को अपना घर समझ लेंगे , अपनी संपत्ति समझ लेंगे , अपनी धरोहर समझ लेंगे , उलटी , पुलटी बातें करना बंद कर देंगे । सेक्य्यूलरिज्म के ठेकेदारों से अगर आज कह दिया जाए कि दो-दो घुसपैठियों को अपने घर में रहने और भोजन की नि:शुल्क सुविधा दे दीजिए । हो सके तो अपनी जायदाद में बराबरी का हिस्सा भी । देखिएगा यह कहते ही सारा सेक्यूलरिज्म , फेक्यूलरिज्म बन जाएगा । आसाम के लोगों के साथ यही हो गया है । इसी लिए वह घुसपैठियों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ कर इस मोड़ , इस मुकाम तक पहुंचे हैं । पश्चिम बंगाल के लोग भी एक न एक दिन यह लड़ाई लड़ने ही वाले हैं । हर कहीं , हर किसी को यह लड़ाई लड़नी पड़ेगी । हक़ की बात पर तो भाई-भाई आपस में लड़ जाते हैं । बाप , बेटे लड़ जाते हैं । फिर यह तो घुसपैठिए ठहरे ।

हालत यह है कि लोग अपने पुरखों को , अपनी संतान को खोजने और पाने के लिए जान लड़ा देते हैं । लेकिन जब लाखों लोगों के बीच अपने संसाधन बांटने की बात आती है तो बड़े-बड़े लोग हाथ खड़े कर देते हैं । जैसे कि आज बांग्लादेश सरकार ने अपने नागरिकों को वापस लेने से साफ़ इंकार कर दिया है । म्यामार भी अपने भगाए हुए रोहिंगिया नागरिकों को वापस लेने से मुंह मोड़ रहा है । बस भारत में सेक्यूलरिज्म की दुकान चलाने वाले लोग , वोट बैंक की लार टपकाते हुए लोग सरकारी खजाने के दम पर इन के लिए लफ्फाजी करते हुए जान लड़ा रहे हैं ।

लेकिन अगर अभी सेक्यूलरिज्म के इन्हीं दुकानदारों की निजी संपत्ति से इन बिचारे घुसपैठियों को हिस्सेदारी देने की बात तय हो जाए तो यही लोग गिरगिट की तरह बदल जाएंगे । यह गद्दार यह नहीं सोच पाते कि देश की संपत्ति और संसाधन भी इन के ही हैं , सब की साझी है , विभिन्न टैक्स यही देते हैं । सो यह घुसपैठिए हम सभी पर साझा बोझ ही नहीं , सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा हैं । यह बात अच्छी तरह से जान लेने की ज़रुरत है ।

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