Home हमारे लेखकप्रांजय कुमार महात्मा गाँधी पर लगातार चोट : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

महात्मा गाँधी पर लगातार चोट : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

by Pranjay Kumar
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यह विमर्श देश को मथ रहा है। मैं किसी भी अतिवादी टिप्पणी से बचता हूँ। समाज का सौहार्द्र बना रहे, यह प्रयास हर सजग और संवेदनशील व्यक्ति के सदृश मेरा भी रहता है। पर सामाजिक सौहार्द्रता किस कीमत पर, प्राणों के मूल्य पर, विभाजन-रेखा को और पुष्ट एवं गहरा कर, तुष्टिकरण की विभाजनकारी नींव पर………???
एक #वामपंथी स्थापित कवि ने कल मुझसे यह प्रश्न पूछा:-
”राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग उन महात्मा गाँधी पर लगातार चोट कर रहे हैं जिन्हें संघ ने प्रात:स्मरणीय विभूति माना है! क्या आपको इसमें कोई विसंगति नहीं दिखती?”
1. गाँधी जी महापुरुष थे, जिन्होंने पराधीन भारत में अपने चिंतन और परिश्रम से स्वतंत्रता की लौ जलाकर अभूतपूर्व कार्य किया और इस संदर्भ में कई निर्णय भी लिए।
2. महापुरुष होते हुए भी आखिरकार मानव थे और इसलिए एक सामान्य मनुष्य की भाँति उनसे भी कुछ ऐसी गलतियाँ हुई थीं, जिसका दंश देश आज भी भुगत रहा है। ‘खिलाफत’ जो वास्तव में ‘ख़लीफ़त’ आंदोलन था, जिसका उद्देश्य तुर्की में वहाँ की जनता और क्रांतिकारी नेता मुस्तफ़ा कमाल पाशा के नेतृत्व में चले नव-निर्माण के विरुद्ध पोप की तरह सभी मुस्लिम देशों व तुर्की में खलीफा के शासन को पुनः स्थापित करना था, वास्तव में भारत में तुष्टिकरण की भयानक शुरुआत थी। गाँधी जी द्वारा ऐसे आंदोलन का नेतृत्व करना- ऐसी ही एक भूल थी, जिसने कालांतर में पाकिस्तान के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह स्थिति तब थी, जब गाँधी जी स्वयं देश के विभाजन के खिलाफ थे।
3. गाँधी जी का आदर करते हुए यह आवश्यक नहीं कि उनके प्रत्येक निर्णयों और कामों की प्रशंसा की जाए। हमारी संस्कृति में ईश्वर के अवतारों को भी नहीं बख्शा जाता। श्रीराम द्वारा सीता-निर्वासन के निर्णय की आज भी आलोचना होती है। इसलिए गाँधी जी के कार्यकलापों, नीतियों और फैसलों पर भी एक से अधिक राय हो सकती है। ऐसे में गाँधी जी के जीवन और कार्यों की विवेचना और ईमानदार आलोचना का स्वागत होना चाहिए।
4. नाथूराम गोडसे ने गाँधी जी की गोली मारकर नृशंस हत्या करने का अक्षम्य अपराध किया था। किसी भी विचार को हिंसा से कुचला या दबाया नहीं जा सकता- चाहे वह विचार गाँधी जी के हों या फिर गोडसे के। कुछ लोग गोडसे के विचारों से सहमत या उसके प्रशंसक भी हो सकते हैं- विशेषकर जिस निडरता और साहस से उसने गाँधी जी की हत्या के लिए क्षमा माँगने से इनकार कर दिया और अदालत द्वारा अपने अपराध के लिए सुनाई गई सजा को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार किया। सुनवाई के दौरान न्यायालय में गोडसे का वक्तव्य- वाकई पढ़ने योग्य है। गोडसे के विचारों से सहमत या असहमत होने की सभी को स्वतंत्रता है। परंतु गोडसे द्वारा गाँधी जी की हत्या निश्चय ही निंदनीय है। इस हत्या ने गाँधी जी के निर्णयों की तार्किक-ऐतिहासिक विवेचना पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया। इससे गाँधी तर्कसंगत आलोचनाओं से परे एक ‘महामानव’ के रूप में बिना किसी विश्लेषण-आकलन के स्थापित कर दिए गए।
5. गाँधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि देने का शासनादेश, 2 सितंबर 1938 को मध्य-प्रांत और बरार की तत्कालीन कांग्रेसी सरकार द्वारा जारी किया गया था। इसमें अंग्रेजों की भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका से इनकार करना अंधी श्रद्धा कहलाएगी। अब कल्पना कीजिए यदि ऐसा ही कोई आदेश वर्तमान केंद्र सरकार- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक श्रद्धेय डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार, गुरुजी या फिर अटलजी के संबंध में जारी कर दें, तो उसकी क्या-क्या और कैसी-कैसी प्रतिक्रिया होगी?- इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। जननायकों का सम्मान लोगों के हृदय से होना चाहिए, ना कि किसी शासनादेश द्वारा। आशा है आप और सभी गाँधी-भक्त इससे सहमत होंगे।
6. सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रीय नायकों को लांछित और गाली देने की परंपरा वामपंथियों ने आरंभ की थी। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में ब्रितानियों के लिए मुखबिरी करते हुए गाँधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस आदि राष्ट्रवादी देशभक्तों को अपशब्द कहना- इसका प्रमाण है। वर्षों तक वामपंथी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘सीआईए के दलाल’ के रूप में परिभाषित करते रहे हैं। वास्तव में, वामपंथियों को दूसरों को गाली देने और उन्हें लांछित करने का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव और प्रशिक्षण- दोनों प्राप्त है। यह व्यवहार भारतीय परंपरा के विरुद्ध है। वाल्मीकि रामायण में प्रभु श्रीराम ने विभीषण से स्पष्ट रूप से कहा था- “बैर जीवन काल तक ही रहता है। मृत्यु के बाद उस बैर का अंत हो जाता है।” तब काफी हद तक इस बात का अनुसरण किया गया था। इस पृष्ठभूमि में वामपंथी और उनसे प्रभावित व्यक्तियों के समूह- वीर सावरकर सहित भारत के अन्य मानबिंदुओं आदि पर बार-बार आघात करते रहते हैं। अब इसकी प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक है। किंतु वह प्रतिक्रिया कैसी होगी? सभ्य, मर्यादित मापदंडों की परिधि के भीतर या बाजारू भाषा में- यह काफी कुछ प्रभावित व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करता है।
7. ‘देश के प्रति गाँधी जी के अपराध’ यह पुस्तक, अस्थादीप प्रकाशन, आगरा से प्रकाशित है। इसके लेखक विजय कुमार सिंहल हैं। इस पुस्तक को पढ़कर आप इसमें उठाए गए मुद्दों-तथ्यों का खंडन कर सकते हैं। इससे पूरी तरह असहमत हो सकते हैं। पर इस पुस्तक में जो सवाल खड़े किए गए हैं, देश की वर्तमान दुरावस्था से चिंतित हर व्यक्ति के मन में लगभग वैसे ही सवाल हैं। और ऐसे सवालों का जवाब/समाधान आज नहीं तो कल देश को देना ही होगा। मुस्लिम कट्टरपंथियों की आक्रामकता, अनुदारता और असहिष्णुता जिस प्रकार दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, ओवैसी समेत देश के तमाम मुफ़्ती-मौलवी आए दिन जिस प्रकार की धमकी भारी भाषा बोलते रहते हैं, और उस पर क्षद्म पंथनिरपेक्षतावादी जैसी भयावह चुप्पी और नपुंसक तटस्थता ओढ़े रहते हैं, आने वाले दिनों में ऐसे सवाल और खड़े होंगें, चारों ओर से खड़े होंगें, आने वाले दिनों में गाँधी-नेहरू और तत्कालीन काँग्रेस नेतृत्व जनता की अदालत और विमर्श के घेरे में निश्चित खड़े किए जाएँगें, लगातार, बारंबार खड़े किए जाएँगें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संत कालीचरण या ऐसे विरोधी स्वर वाले दो-चार लोगों को जेल में डालकर चुप नहीं कराया जा सकता, कदापि नहीं कराया जा सकता।
इतिहास के निर्णयों का आकलन-विश्लेषण वर्तमान की आवश्यकताओं-समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में सदैव से होता आया है। मध्ययुगीन बलबाई और आक्रांता मानसिकता भारत के वर्तमान को लगातार लहूलुहान कर रहा है और बावजूद इसके ‘उत्पीड़क’ को ‘पीड़ित’ दिखाने का दोहरा चरित्र बहुसंख्यक हिंदुओं में खीझ और प्रतिक्रिया पैदा करता है, पर यह भारत का मूल चरित्र नहीं है। हमें इन प्रश्नों से पलायन नहीं कर, उनके समाधान ढूंढ़ना होगा। पलायन की ऐसी ही मानसिकता 1947 में देश का त्रासद विभाजन करवा गई और उनसे बचने की कायर या शुतुरमुर्गी मानसिकता देश को दुबारा विभाजन के कगार पर ले आई है या विभाजनकारी लकीर को और चौड़ा एवं गहरा कर रही है। इस कायर या शुतुरमुर्गी मानसिकता से देश को हर हाल में मुक्त होना होगा।
जहाँ तक मेरी या संघ की बात है हम गाँधी का सम्मान करते हैं, पर उनकी नीतियों, उनके निर्णयों, उनकी योजनाओं, उनके कार्यक्रमों को आलोचनाओं से परे नहीं मानते। हम मानते हैं कि स्वस्थ आलोचना समुद्र मथकर विष में से अमृत-कुंभ निकालना है।

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