Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय मृत्यु जैसे मित्र हो गई है आती है , छू कर निकल जाती है

मृत्यु जैसे मित्र हो गई है आती है , छू कर निकल जाती है

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मैं कम से कम 7 बार साक्षात मृत्यु से जैसे लड़ कर लौटा हूं। दो बार नदी में डूब कर , दो बार जहाज में और तीन बार सड़क दुर्घटना में। एक बार बीच नदी में नाव डूब गई। टीन एज था। पर तब तैरने भी नहीं आता था। मल्लाह बहुत होशियार थे। आसपास के गांव के लोग भी दोनों तरफ से कूद आए नदी में। जान पर खेल कर किसी तरह बचा लिया। फिर मैं ने तैरना सीख लिया। इतना कि तैर कर गोरखपुर में नदी पार कर लेना आम बात हो गई।
एक बार बीच नदी में कूद गया। तो लगा अब जीवित बच पाना मुश्किल है। अकसर नाव से बीच नदी में कूद जाता था। पानी की तलहटी में जा कर फिर ऊपर आने का रोमांच ही और था। गहरे जल की वह जादुई अनुभूति आज भी नहीं भूलती। पर उस बार कूदते समय नाव की एक कील दाएं हाथ के बीच की अंगुली में धंस गई। नदी की तलहटी में जा कर लगा कि जैसे सांप ने काट लिया हो। दाएं हाथ से खून ही खून। दाएं हाथ को तैरने के लिए फेकना भी मुश्किल हो गया। बाएं हाथ से पानी मारते-मारते किसी तरह ऊपर आया। एक बार लगा कि अब बायां हाथ भी काम नहीं करेगा। पर नाविक पास ही था। मेरा तैरना देख कर उसे कुछ अनिष्ट लगा। नाव पास ले कर आया। मुझसे लगातार हाथ मारते रहने को कहता रहा। फिर अपना हाथ बढ़ा कर दो नाविकों ने मुझे वापस नाव में खींच लिया। एक कपड़ा फाड़ कर हाथ में पट्टी बांधी। सांप की आशंका भी जल्दी ही खत्म हो गई। नाविक को वह कील और कील में लगा ख़ून दिख गया था। शाम का समय था। फिर मरहम पट्टी , सूई भी लगवाई। मुहल्ले के जिस कंपाउंडर ने पट्टी की उस ने पिता जी से शिकायत की कि लड़का बिगड़ गया है। छुरेबाजी कर के आया था , पट्टी बंधवाने। घर में पिता ने खूब पिटाई की। कोई सफाई सुनने को तैयार ही नहीं हुए।
हरिद्वार में हरकी पैड़ी पर जहां से धारा नीचे गिरती है , वहां से भी धारा के साथ कूदने का रोमांच कई बार जिया है। दो बार वहां भी लगा कि अब गया कि तब गया। पर आगे बंधी जंजीरों को थाम कर हर बार बच गया। बनारस में भी एक बार गंगा पार करने में बीच नदी में फंस गया। घाट पर कुछ अनजान लड़कों के साथ तय हुआ कि नदी पार की जाए। तैरते-तैरते मैं बहुत आगे बढ़ गया। बाकी लड़के लौट गए थे। बीच नदी में मुड़ कर देखा कोई नहीं। घबरा गया। बहने लगा। लेकिन फिर एक नाविक ने देख लिया। चिल्लाया हाथ-पांव मारते रहो। पास आ कर हाथ पकड़ कर नाव में खींच लिया। अब जब घाट पर आया तो याद ही नहीं आ रहा था कि किस घाट पर कपड़े उतार कर तैरने गया था। दोपहर हो गई थी खोजते-खोजते।
चार्टर्ड प्लेन में एक बार कंट्रोल रुम से पंद्रह मिनट तक संपर्क कटा रहा। तत्कालीन मुख्य मंत्री के साथ था। रात का समय था पर जल्दी ही संपर्क जुड़ गया। संपर्क मिलने तक पायलट वहीं आसपास गोल-गोल चक्कर लगाता रहा। लेकिन दूसरी बार भी चार्टर्ड प्लेन विश्व युद्ध के समय की बनी प्रतापगढ़ में पृथ्वीगंज हवाई पट्टी पर उतरा तो वहां एक जीप समानांतर रेस में लग गई। हवाई पट्टी पर उपले थे। पायलट ने किसी तरह ट्रिक से बचाया। इस बार भी मुख्य मंत्री की कवरेज में था। प्लेन में साथ बैठे एक कामरेड तो तब मारे डर के ज़ोर-ज़ोर से हनुमान चालीसा पढ़ने लगे थे।
लेकिन लखनऊ से संभल जाते समय सीतापुर रोड पर एक बार ट्रक और अंबेसडर की आमने-सामने की टक्कर में तो मेरे बग़ल में बैठे मेरे एक साथी जय प्रकाश शाही और ड्राइवर एट स्पॉट विदा हो गए थे। छ महीने तक मैं भी मृत्यु से लड़ता रहा। हिलना-डुलना मुश्किल था। बड़ी मुश्किल से जीवन ले कर लौटा। चेहरा , जबड़ा , हाथ , पसलियां सभी टूट गए थे। मेरे चेहरे पर आज भी नौ प्लेट और बीस स्क्रू लगे हुए हैं। 18 फ़रवरी , 1998 की बात है। तब के रक्षा मंत्री के कवरेज में जा रहा था। एक बार 10 बरस बाद फिर इसी तारीख पर मेरी स्टीम कार को एक डंपर ने लखनऊ में बुरी तरह रौंद दिया। कार मैं ही चला रहा था। ऑफिस जा रहा था। कार की ऐसी-तैसी हो गयी पर मुझे माथे पर फ्रंट मिरर का शीशा टूट कर लग जाने से चोट आई। बाक़ी सब सही सलामत रहा। कार ख़ुद चकनाचूर हो गई पर मुझे बचा ले गई। सिर्फ प्राथमिक चिकित्सा से काम चल गया। फुटकर घटनाएं , दुर्घटनाएं तो कभी-कभार अब भी होती रहती हैं। मृत्यु जैसे मित्र हो गई है। आती है , छू कर निकल जाती है। जैसे कि इसी कोरोना के पहले दौर में कोरोना ने धावा बोल दिया। लगा कि अब गया कि तब गया। लेकिन फिर रह गया। एक डाक्टर मित्र ने कहा कि पकड़े तो कस कर था पर कोरोना आप से डर कर भाग गया।

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