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योगी एवं अखिलेश में अंतर

by रंजना सिंह
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लोग लिखते है कि योगी जी कार्यकर्ताओं के “काम” नहीं करते; यह भी लिखते है कि योगी जी अपने विधायकों एवं भाजपा नेताओ की भी नहीं सुनते। अतः उनका निष्कर्ष है कि योगी जी वापस नहीं आ रहे है। मैंने कई बार पूछा कि ऐसा कौन सा कार्य है जो योगी जी नहीं करते। उस पर चुप्पी साध जाते है। जब पुनः पूछता हूँ कि क्या आपको अनुचित रूप से ठेका चाहिए, तो एक ने बेशर्मी से लिखा कि “काम” से उनका तात्पर्य “ठेका” मिलना ही है।
दूसरे शब्दों में, अनुचित तरीके से ठेका दे दीजिये, प्लाट दे दीजिये, सरकारी अनुदान दे दीजिये; नौकरी दे दीजिये; ट्रांसफर-पोस्टिंग कर दीजिये! भले ही इस “अनुकम्पा” या “कार्यकर्ताओ के कार्य” के लिए बदले में कुछ घूस ले लीजिये। मेरा प्रश्न है कि फिर योगी जी एवं अखिलेश में क्या अंतर हुआ?
आप सरकार से अपेक्षा करते है कि भ्रष्टाचार कम हो, मेरिट के आधार पर कार्य हो; दैनिक आर्थिक गतिविधियों में सरकार का हस्तक्षेप कम से कम हो।
लेकिन आप स्वयं के लाभ के लिए चाहते है कि सरकार भ्रष्टाचार करे। आप आरक्षण के विरोध में खड़े हो जाते है; व्यवस्था में मेरिट चाहते है। लेकिन ठेका का एक टेंडर इंटरनेट पे ठीक से नहीं भर सकते। आप उस ठेके के लिए न्यूनतम कीमत की निविदा प्रस्तुत नहीं कर सकते।
आप ट्रैफिक कानून तोड़ने पर घूस देने के विरोध में सरकार को दोष देते है; लेकिन स्वयं टेंडर लेने के लिए चाहते है कि सरकार घूस ले ले। आप अभी भी “कोंग्रेसी” व्यवस्था के अनुसार कार्य करना चाहते है। उधर मोदी सरकार ने व्यवस्था ही बदल दी। पहले सरकार द्वारा लाभार्थियों को भेजे जाने वाले एक रुपये में से 85 पैसे “व्यवस्था” खा जाती थी। उस 85 पैसे में से कुछ सिक्के लाभार्थियों के नाम पर भिखारियों की तरह आप भी लपक लेते थे।

आज उस एक रुपये में से 100 का 100 पैसा दिल्ली में सीधा लाभार्थियों के बैंक अकाउंट में भेजा जा रहा है। अतः आप को निराशा ही मिलनी है; क्योकि आपका एक पशु के रूप में दलाली का अवसर बंद हो गया।
अधिकतर अप्रूवल आटोमेटिक हो गयी है। आयकर, GST, पेंशन, का रिटर्न एवं भुगतान; कई प्रकार के उद्यम के लिए लाइसेंस, पासपोर्ट, ट्रेन टिकट, सेल फोन कनेक्शन, सरकारी खरीद का भुगतान, मनरेगा का पेमेंट इत्यादि ऑनलाइन हो गए है। ग्रुप ग एवं घ की भर्ती से इंटरव्यू हटा दिया गया है। डॉक्यूमेंट सत्यापित नहीं करवाना है। जीवन के कई पहलुओ से सरकार बाहर निकल चुकी है। उसी प्रकार से, अधिकतर टेंडर ऑनलाइन हो गए है। क्या आप तकनीकी रूप से उत्तम न्यूनतम कीमत की निविदा प्रस्तुत नहीं कर सकते? इसके लिए भी आप को “कार्यकर्त्ता” के नाम पर फेवर चाहिए?
क्या आप ने पता लगाने का प्रयास किया कि वह टेंडर किसको मिल गया? उसकी निविदा की तकनीकी गुणवत्ता क्या थी; किस रेट पे कार्य करने को तैयार था? या फिर आपको अखिलेश वाली अराजकता चाहिए जिसमे केवल एक जाति एवं एक समुदाय को टेंडर मिल रहा था? अगर आप वही युग चाहते है तो आज़म, मुख़्तार इत्यादि से शिकायत क्यों है? आखिरकार वे भी पार्टी कार्यकर्ताओ का ही कार्य कर रहे थे। फिर, आप कार्यकर्त्ता बने ही क्यों? आपने सरकार क्यों बदली? इसलिए कि अब आपको भ्रष्टाचार का अवसर मिल जाए?
या फिर, स्वच्छ प्रशासन मिले, कानून-व्यवस्था का शासन हो; भ्रष्टाचार से मुक्ति मिले; नियुक्तियां निष्पक्ष ढंग से हो; रामराज्य की स्थापना हो; आप को अपनी संस्कृति को संरक्षित एवं प्रमोट करने का अवसर मिले; आपके बच्चों को आर्थिक प्रगति के लिए एकसमान अवसर मिले। एकसमान अवसर जिसमे एक निर्धन परिवार का मोदी प्रधानमंत्री एवं योगी मुख्यमंत्री बन सके। ना कि नेहरू-इंदिरा-राजीव-सोनिया के वंशज; मुलायम-लालू के वंशज सत्ता के शिखर पे केवल अपने जन्म के आधार पे पहुँच जाए; रातो-रात अरबपति हो जाए। आखिरकार आप कैसा राष्ट्र, कैसा प्रदेश चाहते है? आप सरकार से क्या चाहते है? आप कैसी सरकार चाहते है?

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