Home राजनीति रग्नार लोदब्रोक बनाम नरेंद्र मोदी और तृप्ति के करण

रग्नार लोदब्रोक बनाम नरेंद्र मोदी और तृप्ति के करण

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तृप्ति के करण से याद आया है। मोई जी जिस अंदाज से निकल रहे है या कहे भविष्य की ओर कदम बढ़ा रहे है। उन्हें देखकर कैटिकट के महान वाइकिंग्स रेगनॉर लोथब्रोक की भांति प्रतीत हो रहे है।
मोई जी ने रेगनॉर की तरह लुक भी लिया था।
नॉर्वे में लोथब्रोक को महान योद्धा माना जाता है जिसने दुनिया भर में परचम लहराया। नए देश खोजे और अपने लोगों की भलाई के लिए इंग्लैंड के साथ संधि की। हालांकि इंग्लैंड ने धोखा दिया और वाइकिंग्स को मार डाला।
तृप्ति के बाद स्नेह भी उसी दिशा में उठता कदम है।
वर्तमान में इंग्लैंड यानी जनपथ को तो निपटा दिया है थोड़ा बचा है। अब इन दो का रहस्य शेष है कि आखिर इससे क्या निकलेगा। यूँ तो मोई जी राजनीतिक बिसात पर तगड़े खिलाड़ी है इतना आसान नहीं है उन्हें समझ पाना….विपक्ष ने कैम्ब्रिज व अन्य एजेंसियों की मदद से कोशिश की थी। लेकिन करोड़ों खर्च डाले है कुछ हाथ न लगा।
सबसे दिलचस्प है कि मोई जी से उनके लोग आस लगाए बैठे है। अधिकतर नाराज़ है तो बाक़ी बनराकस बन चुके है। स्वाभाविक है राजनेता राजनीति नहीं करेगा, तो कौन करेगा। भक्तों की एकाद विंग ने जोर पकड़ा हुआ है। कि मोई जी झोला उठाकर, रेगनॉर की तरह गायब हो जाए।
बाबा उत्तराधिकारी बनकर कुर्सी संभाले। यक़ीनन, बाबा कुर्सी संभाल लेंगे। लेकिन… लेकिन! कार्यकाल को पूर्ण न करने देंगे भाजपाई, कोई न कोई एकनाथ निकलकर सामने खड़ा हो जाना है। अभी बाबा को उत्तर प्रदेश में डटकर केंद्र के लिए अपनी टीम निर्मित करनी है जो संगठन पर पकड़ बनाए रखें। तभी कार्यकाल को स्थिर रख पाएंगे।
वक्त से पहले कोई कार्य फ्लोर पर आता नहीं है। जब उसका समय आता है तब अपने आप माहौल बनना शुरू हो जाता है। सारे समीकरण अपनी जगह पर सेट होते चले जाते है।
क्योंकि राजनीति महत्वाकांक्षाओं का खेला है। अटल-आडवाणी जी के युग में संगठन आडवाणी जी ने संभाल रखा था और अटल जी ने सरकार, अभी मोई-शाह की जोड़ी है। आडवाणी जी को दमदार साथी न मिला, न सलाहकार, इसलिए वे पीएम इन वेटिंग रहे। जबकि उन्होंने त्याग करके अटल जी बनाए रखा था।
भाजपा में कई ऐसे बैठे है जो मौका पर चौका लगाने में देर नहीं करते है। आडवाणी जी के खेमे शत्रु और यशवंत सरीख़े लालची राजनेता बैठे थे। अभी इनका स्टेटस क्या है इतिहास गवाह है। भाजपा से हर युग में नया नेतृत्व निकलता आया है। उनका अपना राजनीति करने का तरीका रहा है। पहले वाली जोड़ी कभी पूर्ण बहुमत के लिए मैदान में नहीं उतरी। जबकि वर्तमान जोड़ी ने गठबंधन सरकार के युग में पूर्ण बहुमत का नारा दिया और दो बार हासिल भी किया।
मोई जी का युग भी समाप्त होगा, नया नेतृत्व आएगा। उसके अपने दांव-पेच होंगे। शायद वे भी हमें पसंद न आए। फिर नए नेतृत्व की राहें देखेंगे।
और हाँ! रेगनॉर जब लड़ाका था, तब ख़ूब तबियत से लड़ा। लेकिन जब कैटिकट को संभाला, तो धीरे धीरे उसका फोकस शिफ्ट होता चला गया। उसके बाद उसके बेटे लड़ाके बने। ऐसे ही स्टेटस लेवल और केंद्र में खेलने या कहे लड़ने का तरीका भिन्न रहता है।
बाक़ी तृप्ति और स्नेह जाने….

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