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राम रूप मानस

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श्री शिव स्तुति

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ॐ पार्वती पतये नमः

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चेतन ,अचेतन, अवचेतन में वास करने वाले गिरिजापति को नमस्कार है ..
हे सृष्टि के प्रथम आचार्य उमापति शिव आप को कोटि कोटि नमस्कार है..
सृष्टि के आदि और अंत मे भी जो विद्यमान रहता है , जो सनातन है , जो विधि विधा का जन्मदाता है , जो ज्ञात,अज्ञात से परे है उन त्रिपुरारी को बारंबार नमस्कार है ।
हे मृत्युंजय , हे पशुपति नाथ ,हे कैलाशपति, हे विरुपाक्ष,
हे कण कण में वास करने वाले शंकर आपको कोटिशः प्रणाम है।
हे नील लोहित, हे कपर्दी, हे वामदेव, हे विष्णु वल्लभ, हे खटवांगी, हे शूलपाणी , हे शर्व, हे शितिकंठ, हे भस्मोद, हे धूलि विग्रह ,हे सोमसूर्याग्निलोचन आपके चरणों में मेरा बारंबार नमस्कार है।
हे उमापति जिस प्रकार से आपने माता गौरी को रामकथा का अमृत पान कराया उसी तरह से हे गंगाधर हे महाज्योति निरंजन मुझ अज्ञानी को भी रामकथा मेरे अंतर्मन मस्तिष्क में सुनाने की कृपा करें ।
हे कृत्तिवासा, हे महासेनजनक आप मुझे इतना समर्थं बनाएं कि मैं आपके द्वारा कही गयी राम कथा को सभी राम भक्तों को जो कि राम के चातक हैं उन्हें अपनी भाषा दिव्यता से साक्षात श्रीराम के दर्शन करवा सकूं ।
हे व्योमकेश, हे पुषदंता, हे भस्मोद्धूलितविग्रह ,हे सामप्रिय ,हे स्वरमयी, हे हवि आपको नमस्कार है
हे नील कंठ मैं आपको अपने हृदय की भित्तियों से कोटि कोटि दंडवत प्रणाम करती हूँ ।
हे स्कंध के जनक रामकथा लिखने में मेरी सहायता करें प्रभु..
ॐ नमो शचिश्वर: नमः
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मुनिवेश में श्याम देह को धारण किये हुए वृक्ष की डालियों को पकड़कर जो खड़े हैं जिन्होंने अपने कंधे पर धर्म की रक्षा के लिए धनुष धारण किया हुआ है जो तिरछे नयनो से जनक दुलारी श्री सीता जी को देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहें हैं उन अखिलेश्वर श्रीराम को मेरा बारम्बार प्रणाम है।
ऋषि मुनियों और धर्म की रक्षा के लिए क्षीर सागर में निवास करने वाले कमलनयन लक्ष्मीपति मानवरूप धारण करके वनों में विचरण कर रहें हैं जिन्हें देखकर पापी शक्तियां ऐसे उस स्थान को छोड़कर भाग रही हैं जैसे प्रकाश के आने पर अंधकार उस स्थान को छोड़ देता है ।
हे सूर्यवंश के सूर्य रघुवंशी श्रीराम आपको बारम्बार प्रणाम है ।
जिनके नाम का जाप करने मात्र से जीव अधर्म की दिशा को छोड़कर धर्म की दिशा में चलने लगता है उन सियावर श्रीरामचंद्र जी को नमस्कार है ।
हे सिया के हृदय में वास करने वाले राजीवलोचन आपसे ही ॐ की उत्पत्ति होती है ,
हे राम आप ही सृष्टि की रचना करते समय ब्रम्हा, पालन के समय विष्णु, संहार करते समय रुद्र का रूप धारण करते हैं ।
हे अखिल ब्रम्हांड का रक्षक , हे महातपस्वी ,हे महाबाहो
हे चित्त को आनंद देने वाले सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर संसार मे उपस्थित हर क्रिया के कारण आप हैं।
उपादान अपादान निदान उपक्रम सभी के कारण आप हैं।
हे प्रभो सृष्टि के कल्याण के लिए कभी आप मत्स्य , वराह रूप, नरसिंह , परशुराम , दत्तात्रेय, कृष्ण आदि के रूप में धरती पर अवतार लेते रहते हैं ।
हे प्रभु जिसप्रकार से आप अनन्त है उसी प्रकार आपकी कथा भी अनंत है ।
हे भगवान अनन्त की शैय्या पर विश्राम करने वाले आनंदकंद आपको कोटि कोटि प्रणाम है।
जिन परमब्रम्ह का रहस्य बताने में वेद भी असमर्थ हों उन त्रिलोकी नाथ को बारम्बार नमस्कार है ।
रामरूप मानस
मधुलिका यादव शची कृत
29 मई 2021

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