Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय वामपंथी कैडर के किसी ग़लत फैसले….

वामपंथी कैडर के किसी ग़लत फैसले….

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मुझे नहीं याद आता कि वामपंथी कैडर के किसी ग़लत फैसले या बेजा कार्रवाई के खिलाफ किसी वामपंथी लेखक ने कोई लेख या टिप्पणी लिखने का कभी साहस किया हो । तो भी अगर कोई मित्र ऐसे किसी लेख या टिप्पणी से परिचित करवा सके तो खुशी होगी। भद्र लोक के टैगोर की मूर्तियां तोड़ना तो अभद्र था ही , इसे छोड़िए , ज्योति बसु को पोलित ब्यूरो ने अपनी सनक में प्रधान मंत्री न बनने दिया , इस पर किस वामपंथी लेखक ने कभी लिखा ? अगर कामरेड सोमनाथ चटर्जी कह रहे थे कि लोकसभा अध्यक्ष पद राजनीतिक पद नहीं है तो क्या गलत कह रहे थे । लेकिन उन को बेवजह पार्टी से हटा दिया गया , किस लेखक ने इस पर लिखा ?

 

 

अभी बीते साल ही डी राजा ने हिंदी दिवस के दिन ही हिंदी को हिंदुत्व की भाषा बता दिया। किसी वामपंथी लेखक ने प्रतिवाद की सांस तक नहीं ली। नक्सल हिंसा के खिलाफ कभी किसी वामपंथी लेखक ने लिखा ? हमेशा पक्ष में ही लिखा है । नक्सल हिंसा फासिस्ट मोदी का बोया बीज या उपज तो नहीं है न ? चीन में मुस्लिम समाज के लाखों लोगों के खिलाफ जो भी कुछ निरंतर हो रहा है , उस पर किस वामपंथी लेखक ने लिखा ? मुंह क्यों सिला हुआ है ? बातें बहुत सारी हैं ।

 

 

वामपंथी लेखकों के लिए पार्टी की सीमा रेखा बहुत गहरी है। सीमा रेखा लांघते ही राहुल सांकृत्यायन , रामविलास शर्मा जैसे कई सारे वामपंथी लेखकों के साथ वामपंथ ने क्या सुलूक किया है , हमारे सामने है । निर्मल वर्मा और अब नामवर सिंह के साथ भी क्या कुछ हुआ है , हम सब के सामने है । किस्से बहुतेरे हैं वामपंथ के कट्टरपन के । वामपंथी लेखकों ने खुद भी अपने को वामपंथ के कट्टरपन में कैसे तो ढाल लिया है , क्या इस के विवरण भी हम सब को नहीं मालूम ? ज़रा सा असहमत होते ही अगले को भाजपाई , भक्त और संघी घोषित कर देना भी वामपंथी कट्टरपन नहीं तो और क्या है ।

 

 

 

आप ही बता दें । आप या कोई और यह बात माने या न माने पर सच यह है कि चुनी हुई चुप्पियां और चुने हुए विरोध ने आज की तारीख़ में वामपंथी लेखकों को तेली का बैल बना दिया है । वामपंथी लेखक अब निश्चित परिधि में ही विचरण करते हैं । उसी निश्चित परिधि में बोलते , लिखते और पढ़ते हैं । नतीज़तन गिरोह बन कर रह गए हैं । इस निश्चित परिधि से बाहर सोचना , समझना वामपंथी लेखक भूल चुके हैं । ठहरा हुआ जल बन चुके हैं । ठहरे हुए जल की नियति जानते हैं न !

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