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संगठन के भीतर असीम बिहारी

by Faiyaz Ahmad
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संगठन के भीतर असीम बिहारी हमेशा खुद को नेपथ्य में रखने को तरजीह देते रहे और दूसरों को बढ़ावा देने की कोशिश करते रहे। कभी संगठन के अध्यक्ष पद पर नहीं रहे, और केवल महासचिव पद तक ही सीमित रहे।

वे हमेशा चुनावी राजनीति को त्वरित सफलता के शॉर्टकट के रूप में देखते थे और सामाजिक जागरूकता के कार्यों को प्राथमिकता देना अधिक उचित समझते थे। फिर भी 1936-37 के चुनाव में पार्टी के कई कार्यकर्ता कई सीटों पर विजयी होकर उभरे।

 

चुनावी राजनीति में बिहारी ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों से समानता बनाए रखने की नीति अपनाई। एक भाषण में उन्होंने कहा था: ‘हमारी बीमारी का इलाज न तो लीग के हाथ में है और न ही कांग्रेस के पास… इस बात की सच्चाई यह है कि हमारी बीमारी का इलाज हमारे ही हाथ में है, यह इलाज हमारा ‘सम्मेलन’ है। ‘

 

आमतौर पर मौलाना असीम बिहारी के भाषण दो से तीन घंटे के बीच होते थे, लेकिन 13 सितंबर 1938 को कन्नौज में दिए गए पांच घंटे के भाषण और 25 अक्टूबर 1934 को कोलकाता में रात भर के भाषण का इतिहास में विशेष स्थान है। मौलाना असीम ने भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी।
1940 में उन्होंने विभाजन के खिलाफ दिल्ली में एक विशाल विरोध प्रदर्शन किया जिसमें लगभग 40,000 पसमांदों ने भाग लिया था। 1946 के चुनाव में भी जमीअतुल मोमिनन (मोमिन कांफ्रेंस) के उम्मीदवार मुस्लिम लीग को कई सीटों पर कड़ी टक्कर देने में सफल रहे थे।

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