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संस्कृति संस्कार बनाम स्त्री

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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पुरुष ने अपनी स्त्री को जिस रूप में देखना चाहा; ईश्वर, ईश्वर-लोक व ईश्वर-लोक की स्त्री को उसी के अनुरूप ही गढ़ा। ताकि पुरुष अपनी स्त्री को सहजता से अपना बेहतर अनुगामी, आज्ञापालक-सेवक व भोग्या-दास बना सके और ऐसा होने में स्त्री का विरोध न हो, उल्टे विचार व सोच का ऐसा अनुकूलन बन जाए कि ऐसा होने में स्त्री को अपनी स्वीकृति व गौरवशीलता प्रतीत हो। इस तरह के अनेकानेक प्रयोजनो के कारण ही स्त्री ईश्वरीय व्यवस्था व दैवीय प्रयोजन के मकड़जाल में ऐसी अनुकूलित व कुंठित हुई कि वह कभी अपने स्वतंत्र अस्तित्व, स्वतंत्र सोच व मानसिकता, स्वतंत्र रचनाशीलता आदि के बारे में कल्पना करने का अधर भी नहीं प्राप्त कर सकी।
पुरुष के द्वारा बनाई गईं स्त्री से संबंधित अवधारणाओं व प्रयोजनो का निहित उद्देश्य स्त्री को पुरुष की भोग्या, संपत्ति, अनुगामी व आज्ञापालक-सेवक आदि के रूप में ही सिद्ध किया जाना रहा। स्त्री की स्वतंत्रता व विरोध की संभावना का भ्रूण भी संभव नहीं हो पाया क्योंकि स्त्री का पुरुष की संपत्ति, अनुगामी, आज्ञापालक-सेवक व भोग्या आदि होना ईश्वरीय-व्यवस्था व दैवीय-प्रयोजन बता दिया गया।
**सौंदर्य**
सुंदर व सुसंस्कृत होने आदि की परिभाषाएं ऐसे तरीके से स्थापित व प्रायोजित की गईं। जिससे कि स्त्री स्वतः ही स्वयं का अस्तित्व पुरुष की भोग्या व व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में ही स्वीकारे, महसूसे और गौरवांवित अनुभव करे। इसके लिए ईश्वर-लोक, ईश्वरीय-व्यवस्थाओं व दैवीय-प्रायोजनो को बहुत खूबसूरती, विस्तार व सूक्ष्मता से गढ़ा गया। चिंतन, मनन व साहित्य-रचनाशीलता आदि की अधिकतर ऊर्जा परंपरा में इन्हीं सबको गढ़ने में निरंतर व्यय की जाती रही।
**विद्वता**
स्त्री की विद्वत्ता को स्थान नहीं दिया गया, अपवाद स्वरूप जिन स्त्रियों को विदुषी माना गया उनमें से अपवाद को छोड़कर अधिकतर पुरुषों द्वारा खूब भोगीं गईं। समाज के सहज स्तर में स्त्री की विद्वत्ता को स्थान नहीं प्राप्त हुआ। स्त्री का जन्मजात दायित्व पुरुष का अनुगामी व आज्ञापालक-सेवक रहना ही निर्धारित कर दिया गया। स्वयं स्त्री से संबंधित सारे अधिकार पुरुष को दे दिए गए।
स्त्री की विद्वत्ता को स्त्री सौंदर्य के रूप में मान्यता नहीं दी गई। स्त्री का सौंदर्य केवल और केवल पुरुष के लिए ही है, ऐसा निर्धारित कर दिया गया। स्त्री के सौदर्य का अंतिम लक्ष्य पुरुष के भोग लगाने तक सीमित कर दिया गया। स्त्री की प्रकृति व विद्वत्ता को स्त्री सौंदर्य के रूप में प्रतिष्ठित नहीं किया गया। स्त्री को पुरुष की इच्छानुसार सुंदर लगने जैसी वस्तु के रूप में रहने को सौंदर्य व स्त्री के सुसंस्कृत होने के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। स्त्री का अस्तित्व पुरुष के लिए ही है, ऐसा निर्धारित कर दिया गया।
स्त्री को पुरुष की भोग्या, व्यक्तिगत संपत्ति व आज्ञापालक-सेवक आदि के रूप में स्थापित करने के लिए अनुकूलन बनाने के लिए प्रायोजित की गईं प्रतिष्ठापनाएं ही कन्या-दान, सती-प्रथा, जौहर-प्रथा, बाल-विधवा, विधवा-विवाह न होना, विधवा को घोर अपशगुन मानना आदि जैसी वीभत्स परंपराओं की मूलभूत कारक, प्रेरक व उत्प्रेरक रहीं। यहाँ तक कि घरेलू अघोषित-बलात्कार, दहेज-प्रथा, स्त्री के सहज प्रेम व प्रेम विवाह का स्त्री के लिए उसके ही माता-पिता द्वारा मृत्युदंड देने के स्तर की दुर्दांत हिंसा आदि जैसी कुरीतियों के मूलभूत कारण भी स्त्री सौंदर्य व सुसंस्कृत होने आदि की प्रतिष्ठापनाओं में ही निहित है।
*——विवेक उमराव——*
की लगभग 7 वर्ष पहले प्रकाशित पुस्तक
*”मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”* से

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