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समलैंगिक : वेब-सीरीज

by Swami Vyalok
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इस बीच कई वेब-सीरीज देखने के बाद एक चीज समझ में आयी है। इनके लिखने और बनानेवालों ने कुछ चीजें ठान ली हैं। ये एक ही बिरादरी और तबके के हैं।
ये किस दुनिया के हैं, पता नहीं लेकिन भारतीय (हिंदू) विवाह संस्था के खिलाफ पूरे दम से हैं, भयंकर गुस्से में हैं। हरेक सीरीज में अचानक ही समलैंगिकों को इस कदर न्यू-नॉर्मल कर दिया गया है कि उबकाई आने लगे। अपने 42 साल के तुच्छ जीवन में मुझे इतने समलैंगिक नहीं मिले होंगे, जितने इन सीरियल वालों ने दिखा दिए। आर्या हो या इनसाइड एज, फैमिली मैन हो या डीकप्लड..हरेक सीरियल मतलब इस तरह इनसे भरा है, जैसे भारत में अब इसके अलावा कोई समस्या ही नहीं।
किशोर बच्चे-बच्चियों का ड्रग्स या शराब को अब्यूज करना भी बेहद नॉर्मल बना दिया है। अगर पात्र अधेड़ है तो विवाहेतर संबंधों में है, किशोर है तो शादी के पहले सेक्स-संबंधों में मुब्तिला है, युवक-युवती हैं तो उनके मां-बाप बिना शादी के उनके एक कमरे में होने को लेकर इतने उत्साहित दिखाए जा रहे हैं, मानो बेटे-बेटी सीधे नासा के साइंटिस्ट बन गए हैं।
कथित आधुनिकता और शिक्षा ने हमारी वैवाहिक संस्था को वैसे ही खत्म कर दिया है, लेकिन ये वेब-सीरीज की जो बाढ़ आई है, यह अनजाने है या जान-बूझकर ये गंद फैलायी जा रही है। यह समझ में नहीं आया।
इसको बनाने-लिखने वाले मेरी तरह एक आम मिडिल क्लास के तो नहीं हैं, वरना मुझे भी अपने आसपास वो सब दिखता जो इनमें दिखा रहे हैं। अब या तो मेरे पास दृष्टि नहीं या मैं उतना समझदार ही नहीं। मुझे न तो समलैंगिक दिख रहे हैं, न ड्रग्स करता किशोर और न ही इसके-उसके-किसके-जिसके साथ सोते अधेड़.

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