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साइकिल बम की सिसकी और न रहे सांप

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साइकिल बम की सिसकी और न रहे सांप , न बजे बांसुरी की धुन में दंगेश की त्रासदी लिए बौखलेश

 

साइकिल बम की सिसकी अखिलेश यादव के चेहरे पर साफ़ पढ़ी जा सकती है। इतना कि गोरी चली नइहरवा बलम सिसकी दे-दे रोवें , भोजपुरी गीत याद आ जा रहा है। अभी तक आज़मगढ़ के एक आतंकी मोहम्मद सैफ के पिता शादाब अहमद के साथ जिस फ़ोटो को अखिलेश यादव भाजपा का झूठ कह रहे थे , अब वह पलटी मार कर कहने लगे , फ़ोटो किसी के साथ किसी की हो सकती है। ठीक बात है। पर क्या अखिलेश यादव ने मोहम्मद सैफ के पिता शादाब को समाजवादी पार्टी से निकाल दिया ? पूछा जाना चाहिए अखिलेश यादव से।
गौरतलब है कि अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट में अदालत द्वारा फांसी पाए 38 लोगों में से एक मोहम्मद सैफ का भी नाम है। ज़िक्र ज़रुरी है कि अखिलेश यादव ने 2012 में बतौर मुख्य मंत्री जब आतंकियों को छोड़ने की प्रक्रिया शुरु की तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अखिलेश सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था , ‘ आज आप आतंकियों को रिहा कर रहे हैं, कल आप उन्हें पद्म भूषण भी दे सकते हैं।’ अखिलेश यादव का तर्क था कि सांप्रदायिक सद्भाव बनाने के लिए आतंकियों को छोड़ा जा रहा है। अजब था अखिलेश यादव का यह सांप्रदायिक सद्भाव भी। इसी तरह 2013 में मुज़फ़्फ़र नगर दंगों में सिर्फ मुस्लिम परिवारों को ही सरकारी मदद देने पर सुप्रीम कोर्ट ने भी अखिलेश यादव सरकार को फटकार लगाई थी। तब दंगों में पीड़ित हिंदू परिवारों को भी सरकारी मदद देने के लिए अखिलेश यादव सरकार को विवश होना पड़ा।
2013 में प्रतापगढ़ के कुंडा में डिप्टी एस पी जिया उल हक की हत्या पर भी अखिलेश यादव सरकार ने ग़ज़ब किया। जिया उल हक की पत्नी को भी नौकरी दी और जिया उल हक के भाई को भी। जब कि किसी एक को ही नौकरी दी जानी चाहिए थी। इतना ही नहीं , जिया उल हक की पत्नी को भी पचास लाख रुपए दिए गए और जिया उल हक के पिता को भी पचास लाख रुपए दिए गए। गाज़ियाबाद में गो मांस रखने के लिए अख़लाक़ की हत्या पर भी अखिलेश ने इसी तरह पूरे परिवार पर सरकारी पैसा बहाया था। नौकरी दी थी। कैराना पलायन के अपराधियों और मुज़फ़्फ़र नगर के दंगाइयों पर उन के उपकार आज भी जारी हैं। योगी ने अखिलेश यादव की इसी फितरत को देखते हुए अखिलेश को दंगेश नाम दे दिया है। दंगा , गुंडई , आतंकवाद , भ्रष्टाचार और यादववाद अखिलेश यादव के गले में लिपटा वह सांप है जिसे वह लाख बीन बजा कर भी छुट्टी नहीं पा सकते। कोई जवाब नहीं दे पा रहे , इस बाबत। इसी लिए अखिलेश , बौखलेश बन कर न रहे बांस , न बजे , बांसुरी का मुहावरा भूल कर न रहे सांप , न बजे बांसुरी बोल रहे हैं। योगी का नाम बाबा से बुलडोजर बाबा बता कर , योगी का ही प्रचार करने लगे हैं। कन्नौज का इत्र कुछ ज़्यादा ही इतराने लगा है। अखिलेश यादव का सैफ़ई महोत्सव , अयोध्या और काशी के दीपोत्सव में सुन्न पड़ गया है। लेकिन मुख्य मंत्री निवास से योगी के चिलम के धुआं देखने की बात करने लगे हैं। देवानंद अभिनीत हम दोनों फ़िल्म के लिए साहिर लुधियानवी की लिखी ग़ज़ल याद आती है जिसे मोहम्मद रफ़ी ने जयदेव के संगीत में गाया है :
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
अखिलेश यादव अब क्या इसी मक़ाम पे नहीं आ गए हैं ? समझना कुछ बहुत कठिन नहीं है।

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