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कंझावला केस में राजनीती और धर्म

राजीव मिश्रा

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दिल्ली की स्कूटी वाली घटना की पृष्ठभूमि कुछ भी हो सकती है. बिना फैक्ट्स जाने दूर बैठ कर कुछ भी कहा नहीं जा सकता है… पर फाइनल फैक्ट जो सामने है वह यह कि एक लड़की एक गाड़ी के नीचे फंस कर कई किलोमीटर घिसटती रही और मर गई.
यह एक सिंपल धक्का लगने का मामला नहीं था. कम से कम ड्रंक ड्राइविंग का केस है. ड्रंक ड्राइविंग में किसी का मर जाना यूं ही मैन-स्लॉटर का मामला बनता है. अगर सामने वाला नशे में हो तो भी, जिसकी गाड़ी से किसी की मृत्यु हुई है अगर वह नशे में है तो मैन स्लॉटर का मामला है. मरने वाले को मरने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
पर इसके लीगल एस्पेक्ट के ऊपर असंवेदनशीलता और असभ्यता की कई परतें हैं.
अगर आप नशे और तेज म्यूजिक की वजह से अपनी गाड़ी से किसी के मरने से बेखबर हो तो यह आपका दोष कम नहीं करता बल्कि बढ़ा देता है… यह कम से कम क्रिमिनल नेगलीजेंस है.
अगर कोई आपकी गाड़ी में फंसा है, आपको पता है और तब भी आप डर से या बचने के लिए गाड़ी भगा रहे हो तो यह और भी बड़ी असभ्यता और क्रूरता है.
इसका कानूनी पहलू कोर्ट में तय होगा. पर इसके सामाजिक पहलू पर बात की जा सकती है. यह गाड़ी चलाने वाले और उसमें बैठे लोगों की असंवेदनशीलता और असभ्यता से आगे उस समाज की अमनीवयता का मामला है जहां लोग उस लड़की के चरित्र पर जजमेंट देकर इस मामले को हल्का कर रहे हों… लड़की नशे में थी, लड़की का ब्वॉयफ्रेंड था, लड़की ओयो गई थी… इनमें से कोई भी बात उसकी इस दर्दनाक मौत की वजह नहीं हो सकती. ये बातें सही और प्रमाणिक हों तो भी नहीं. किसी के जीवन का अधिकार आपके दिए हुए कैरेक्टर सर्टिफिकेट पर निर्भर नहीं है.
आपका चरित्र बहुत उज्ज्वल है. आप सिर्फ गंगाजल पीते हैं. आप घर से निकलते हैं तो सिर्फ सोमवार को शंकर भगवान पर दूध चढ़ाने के लिए निकलते हैं… अच्छी बात है… आप अपने अच्छे चरित्र का प्रमाणपत्र सोने के फ्रेम में मढ़ा कर अपने ड्रॉइंग रूम में सजा लीजिए… लेकिन दूसरे की इस दर्दनाक मृत्यु पर ऐसी बेशर्म बातें आपको मनुष्यता की श्रेणी में भी नहीं रखतीं. जो मर्जी सोचिए, जो मर्जी बोलिए… बस, अपनी कुंठा को राष्ट्रवादी और हिंदूवादी का चोला पहन कर मत व्यक्त कीजिए क्योंकि ऐसा हर कॉमेंट आपकी बात पढ़ने वाले किसी भी युवा और युवती को राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व से दूर धकेल रहा है.

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