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स्त्रियां ही प्रथम बोधिसत्व है ..!

मधुलिका शची

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स्त्री पैदा ही बोधिसत्व के साथ होती है ,जिसे पुरुष ने बोधिसत्व माना है वह मात्र एक बहस बन गयी है पर स्त्री का बोधिसत्व सिद्धार्थ को भी नही मिला , सिद्धार्थ ने तत्व को एकपक्षीय देखा पर स्त्री समग्र देखती है ।
हां स्त्री का बोधिसत्व कभी संस्था नही बना,कभी संघ का रूप नही ले पाया। स्त्री संसार से विरक्त होकर मोक्ष को नही देखती जब वह देखती है कि कोई अगस्त्य संसार से विरक्त हो रहा है तो वह लोपामुद्रा का रूप धरकर अपने पति से सांसारिक शास्त्रार्थ कर बैठती है और अपने पति अगस्त्य को विरक्ति से बाहर निकालकर संसार मे रहकर ही निष्काम कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।
स्त्री जानती है सिद्धार्थ का मोक्ष दीपक बुझने की बात करता है अर्थात indirectly सृष्टि के विनाश की, जब मोह खत्म माया खत्म तो बचा क्या ..? अगला पड़ाव तो पूर्व अवस्था ही है। इसका संबंध विकासवाद से कत्तई नहीं है क्योंकि ऐसी मुक्त अवस्था का निर्माण होना असंभव है….
पर स्त्री दीपक बुझाने को मोक्ष नही मानती बल्कि एक दीपक से दूसरे दीपक को जलाने को मोक्ष मानती है ।
संसार से विलग होकर मोक्ष देखना अराजगता है
मोक्ष नही ।सारे दीपक सूर्य चकमक बुझाकर प्रकाश की अपेक्षा कैसे कर सकते हो …?
हो सकता है आप अभी कहे कि दीपक बुझने का अर्थ कामनाओं से मुक्ति है या पुनर्जन्म न होना है…..!
अगर सबको मुक्ति मिल जाये तो सृष्टि में बचेगा क्या ..?
फिर यह सृष्टि किसलिए बनी है ….?
तो आप सीधा सीधा कहो न कि आप शांतिपूर्ण तरीक़े से सृष्टि का विनाश चाहते है । इसीलिये मोक्ष की धारणा सही नही है ।
बल्कि परम पद उचित है जहां ऊर्जा कुछ काल के लिए ठहरती है और बाद में वापस फिर किसी धरती पर आती है ।
यही ऊर्जा संरक्षण का नियम है
यही तार्किक है ……!!!
अवतारवाद भी इसका ही संवाहक है, पुनर्जन्म भी इसका संवाहक है , जबतक सृष्टि है ऊर्जा का आगमन प्रस्थान होता रहेगा ।
इसका सबसे बड़ा वाहक स्त्री तत्व है । स्त्री तत्व जो निर्माण हुआ है उसका दृश्य रूप है अर्थात आपका शरीर, यह संसार जिसे आप देख सकते हो सबका सब स्त्री तत्व द्वारा निर्मित है यदि स्त्री तत्व सहायक न हो तो मात्र ऊर्जा का एक निराकार रूप होगा ।
अक्सर लोग कहते हैं सारे दायित्वों कर्तव्यों से मुक्त होकर मैं भगवद भक्ति करना चाहता हूँ, क्या दायित्वों के त्याग से भक्ति संभव है ..? दायित्व तो लेने ही पड़ेंगे बस दायित्व का रूप बदल जायेगा।
दायित्वों और कर्तव्यों से मुक्त होना मुक्ति का मार्ग नही है।
वरना सोचो बुद्ध ने दुसरो को मोक्ष दिलाने का दायित्त्व क्यों लिया…..???
उन्हें तो मुक्त होना चाहिए था न दायित्वों से !!!
दायित्व को समझो..!
अगर त्याग ही बुद्ध होने का मापदंड है तब स्त्री से बड़ा त्याग कौन किया है आजतक …?
कितनी अजीब बात है..!
धरती से कहते है लोग तू त्याग नहीं सकती !
अगर धरती त्याग कर दे तो कोई सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए जन्म नही लेगा ..!
प्रकृति का त्याग पुरुष के त्याग से बिल्कुल अलग है,
प्रकृति का मोक्ष पुरुष के मोक्ष से बिल्कुल अलग है,
दोनो एक दूसरे के सहायक है परम पद की प्राप्ति के लिए बस ,
दोनो को मिला नही सकते आप ।
नोट : यह पोस्ट तब की है जब विमर्श चल रहा था कि स्त्रियाँ बोधिसत्व नहीं हो सकती।

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