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अमिताभ बच्चन नायक का सहायक

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अमिताभ बच्चन जब मुंबई आए तो शुरुआत में उन्होंने कई फिल्मों में काम तो किया,लेकिन आशातीत सफलता नहीं मिल रही थी।
फ़िल्म बॉम्बे टू गोवा में अमिताभ का काम देखने के बाद सलीम जावेद की जोड़ी ने फ़िल्म ‘ज़ंजीर’ के लिए अमिताभ का नाम प्रकाश मेहरा के सामने रखा और अमिताभ इस फ़िल्म के लिए चुन लिए गए।
1972 में बनी इस फ़िल्म का एक दृश्य आज भी लोगों के दिलो दिमाग में गहरे तक बैठा हुआ है जब अमिताभ प्राण (शेर खान) के कुर्सी पर बैठने से पहले कुर्सी को लात मारते हुए कहते हैं “ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं, जब तक बैठने के लिए कहा न जाए तब तक खड़े रहो”
इस डायलॉग के साथ ही फ़िल्म इंडस्ट्री के अब तक के सबसे बड़े महानायक का जन्म हो चुका था। इसी फिल्म ने अमिताभ को ‘एंग्री यंग मैन’ का खिताब दे दिया और इसके बाद फिर अमिताभ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
शेर खान जो कि असल में खलनायक था लेकिन फ़िल्म के मध्य तक ही उसे ‘नायक का सहायक’ बना दिया गया, बोले तो वो जिसे ‘ज़ुबान’ दे दे उससे वो पीछे नहीं हटता क्योंकि उसका “ईमान मुसम्मल” है और वो मुसुरमान है।
इस फ़िल्म ने सफलता के तमाम रेकॉर्ड तोड़ डाले, इसके बाद सलीम जावेद ने 1975 में ‘दीवार’ की पटकथा लिखी। जब सलीम जावेद इस फ़िल्म पर काम कर रहे थे तो उन्हें एक बिल्ला अमिताभ के हाथ में पहनाना था लेकिन दोनों इस बात पर असमंजस में थे कि बिल्ले को नम्बर क्या दिया जाए, कई सारे नम्बरों पर विचार करने के बाद भी बात नहीं बनी।
अचानक एक रात सलीम खान को सपने में ‘आसमान से एक नम्बर भेजा गया’ और उन्हें बिल्ले का नम्बर 786 नम्बर रखने का हुक्म ‘नाज़िल’ हुआ। सलीम इसे लेकर इतने उत्साहित थे कि वो सुबह होने के इंतज़ार में तड़पने लगे कि, कब सुबह हो और कब मैं जावेद को ये हुक्म सुनाऊँ।
ख़ैर सुबह हुई और रात भर से बेहद रोमांचित, उत्साहित सलीम ने जावेद के घर फोन किया और संदेसा दिया कि जैसे ही साहब सोकर उठें मुझे फोन करने को कहें।
जावेद उठे और सलीम का नम्बर मिलाया, सलीम ने जावेद को पूरा ‘सपना’ सुनाया और बिल्ले का नम्बर 786 रख दिया गया। साथ ही फ़िल्म में बिल्ले का रोल भी बढ़ा दिया गया, बिल्ला कई बारी अमिताभ के प्राणों की रक्षा करने में कामयाब हुआ यहाँ तक कि गोलियों से भी बिल्ला कभी छलनी नहीं हुआ। फ़िल्म के अंत में जब अमिताभ के हाथ से बिल्ला छूट जाता है तब उस समय सिनेमाघर में बैठा हर दर्शक अमिताभ से पहले खुद की साँसें रोक लेता है, लेकिन बिल्ला साथ न होने के कारण अमिताभ के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।
लेकिन इसी फिल्म के एक और दृश्य में अमिताभ बच्चन महादेव के मंदिर में जाकर उनसे वार्तालाप करते हैं, उन पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए अपनी माँ के ठीक होने के लिए गिड़गड़ाते हैं “आज खुश तो बहुत होंगे तुम, वो आदमी जो कभी मंदिर की सीढियाँ नहीं चढ़ा, कभी तुम्हारी चौखट पर नहीं आया वो आज तुम्हारे सामने खड़ा है”
फिल्मों में ही ब्राह्मण को हँसी का पात्र बताया गया, उसे एक कॉमेडियन की तरह रखा गया। उसकी चोटी, भाव भंगिमाओं, ज्योतिष ज्ञान का मज़ाक उड़ाया गया। पैसे देकर मनचाहा मुहूर्त, भविष्य बताने वाला लालची बताया गया।
इस तरह की तमाम कोशिशें उस धर्म को महान बताने के लिए की गईं जिसने मानव जाति का सबसे ज़्यादा रक्तपात किया और जिस सनातन ने सदैव विश्व को शांति का पाठ पढ़ाया, हर धर्म, जाति को स्वीकार किया उसे दोयम दर्जे का बताया गया।
जबकि अमनपसंद मज़हब (?) ने बचपन से साथ खेले, बड़े हुए, खाए पिए अपने ही दूसरे धर्मों के भाई बहनों का गला काटने, गोलियों से उनका सीना छलनी करने और उनकी अस्मत लूटने में कभी कोताही नहीं बरती, कश्मीर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
परंतु इतिहास से कोई सबक ना सीखते हुए आज भी बहुत से हिन्दू अपने मोबाइल नम्बर में 786 रखने, बटुए में इसी नम्बर का नोट रखने को ‘बरक़त’ समझते हैं। इन्हें सनातन के 33 कोटि देवी देवता कम पड़ते हैं जो ये उस धर्म में बरक़त ढूंढते हैं जो मौका मिलते ही अपने लोगों से भी छल कपट करने से पीछे नहीं हटते हैं।
हिन्दू दरगाहों पर माथे रगड़ते हैं, वहाँ चढ़ावे देकर आते हैं, लेकिन विवाह मंडप में वैदिक मंत्रोच्चार कर रहे, सात फेरों का अर्थ बता रहे ब्राह्मण का मज़ाक भी वर्षों से उड़ा रहे हैं। विवाह समारोह में लाखों करोड़ों खर्च कर देंगे परंतु ब्राह्मण को दक्षिणा देना अधिकतर लोगों को ‘लूट’ दिखाई देती है। विवाह रस्मों का सबसे महत्वपूर्ण अंग ब्राह्मण को सबसे महत्वहीन बना दिया गया।
अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपने पर्वों, आस्थाओं का मज़ाक उड़ाते रहने, उन पर चुटकुले बनाने और धर्म, मंदिर को बकवास समझने का ही कारण है कि अधिकांश हिन्दू अपनी जड़ों से कटते गए और इसी कारण सिमटते चले गए।
ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रूरत काम आवै !!

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