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किसी भी प्रोटेस्ट को अब इवेंट बनाने की सलाहियत आ गयी

by Swami Vyalok
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एक काम तो किया है, मोदीजीवा ने। किसी भी प्रोटेस्ट को अब इवेंट बनाने की सलाहियत आ गयी है। वैसे भी, तौहीन बाग के खाट-कार प्रोटेस्ट, तथाकथित किसानों के टेंट-बिरयानी प्रोटेस्ट के बाद माहौल बहुत हल्का चल रहा था। तो, अब अनुशासनहीन निकम्मी और निकम्मा पहलवानों का दल आ गया। सेट भी जंतर-मंतर का है, तो मजा और भी बढेगा।
‘दादी जैसी नाक’ भी समर्थन देने आ गयी है। अपने उसी पर्सनल असिस्टैंट संदीप सिंह के साथ जो जेएनयू का पूर्व छात्र और लिंगलहरी का चेला है। जो पत्रकारों को गरियाता है, महिलाओं से छेड़छाड़ का आरोपित है। उसके साथ पहुंचकर प्रियंका वाड्रा बेटियों की बात करती हैं, विडंबना भी कहीं मुंह छिपाए होगी।
खाप पंचायतों और हुड्डा फैमिली के पहुंचने के बाद यह तो क्लेयर ही है कि जीजा-साली एंड कंपनी का यह प्रोटेस्ट अभी चलेगा। मेरी बस एक चिंता है कि तौहीन बाग और कथित किसानों वाला मजा ये लोग दे पाएंगे या नहीं?
बाकी, जिन भी लोगों का इन पहलवानों के लिए दूध और आंसू उतर रहा है, वे जान लें कि विनेश फोगाट अव्वल दर्जे की धूर्त, निरंकुश और अहंकारी महिला है। वह फेडरेशन के नियमों के खिलाफ अपना कोच, ट्रेनर और सबकुछ रखती है, और हां एक भी ओलंपिक मेडल नहीं जीती है। दूसरे, ये कथित बड़े पहलवान सीधा ओलंपिक में प्रवेश चाहते हैं, बिना राष्ट्रीय खेले हुए। जैसे, क्रिकेट में रणजी के बिना सीधा नेशनल टीम में खिला दिया जाए।
बाकी, इस पर बहुत कुछ कई लोगों ने लिखा है। बृजभूषम सिंह माफिया है, गुंडा है, हो सकता है, तो उस पर बात हो। 38 मुकदमों के बावजूद उसे भाजपा ने मंत्री बनाया, इसकी भर्त्सना हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ये पहलवान जो बकैती कर रहे हैं, वो ठीक है।
वैसे, बकैती का समय ही है। बिहार में तुगलक कुमार ने आनंद मोहन जैसे अपराधी के साथ और 25 अपराधियों को छोड़ दिया, लेकिन चर्चा केवल आनंद मोहन की हो रही है। उसके नाम पर मैंने अपने पाले के बड़े-बड़े धुरंधरों को फिसलते देखा, क्योंकि वे अब केवल ‘राजपूत’ रह गए हैं और आनंद मोहन ‘राजपूतों’ का ‘रॉबिनहुड’, ठीक वैसे ही जैसे मुसलमानों का शहाबुद्दीन या अतीक अहमद था, भूमिहारों का अनंत सिंह था, यादवों का, कुर्मियों का, चर्मकारों का, दुसाधों का, पासवानों का…..होता है। अभी किसी ब्राह्मण माफिया का नाम याद नहीं आया, तो नहीं लिखा।
ये सब लोग भूल जाते हैं कि ये लोग केवल अपराधी हैं, गुनहगार हैं, गुंडे हैं। इसमें कोई अगर-मगर नहीं चलेगा, लेकिन चलता है और तभी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद जैसे लोग पनपते हैं। पहलवानों के साथ भी यही हो रहा है। अभी पता चला है कि वे ओबीसी हैं (सभी या उनमें से कुछ)…मैं मूढ़ उनको केवल पहलवान ही मान रहा था.।
ऐसे ही माहौल में मुझे एक अमेरिकी दोस्त की बात याद आती है, जो उसने 1999 में मुझसे कही थी- ब्रो, तुम्हारा देश अभी तक चल कैसे रहा है, यह आश्चर्य की बात है, वरना देखा जाए तो चर्चिल ने ठीक ही कहा था। तुम लोग तो स्वतंत्रता डिजर्व ही नहीं करते हो…..।

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