Home चलचित्र अरुण गोविल और प्रभाष में तुलना बेमानी

अरुण गोविल और प्रभाष में तुलना बेमानी

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समय जिसका चुनाव करें, उचित है।
अब इसके परिणाम में क्या निकलता है, उसे भी वक्त सामने रखता है और फिर उसका आंकलन किया जाता है।
रामानंद सागर का दौर अलग था और उन्होंने बेहद सीमित साधनों में अद्भुत राम कथा सुनाई व दिखलाई। वर्तमान परिस्थितियां भिन्न है आज अच्छे संसाधन है। निःसन्देह वर्तमान की आदिपुरुष से हनुमान का लुक, अतीत की रामायण से कमतर है।
लेकिन यहाँ लेखक-निर्देशक का नजरिया व ट्रीटमेंट देखना आवश्यक है। क्योंकि राम कथा युगों युगों से वैसी ही है उसी को रामानंद सागर ने सिनेमाई स्वरूप दिया और अब ओम राउत आ रहे है।
कथा में प्रजेंटेशन और ट्रीटमेंट का फ़र्क रहेगा…उसी हिसाब से कलाकारों का चुनाव किया गया है। फ़िल्म देखने के बाद रिव्यु कर सकते है कि इस राम कथा में क्या चूक हुई और क्या बढ़िया रहा।
हर रामायण में अरुण गोविल राम नहीं बन सकते है। अरुण को भी राम ने चुना था और प्रभाष भी उनके ही आशीर्वाद से 70एमएम पर राघव रूप में आए है।
बाक़ी, नितेश तिवारी और मधु मंटेना, 2019 से रामायण ट्राइलॉजी घोषित करके बैठे है। बोर्ड पर कोई प्रोग्रेस न है। राम कृपा न है, तभी तो राम को पा नहीं सके है। कई कलाकार पाइप लाइन में आए है लेकिन बात बन सकी।
कथा राम की है तो वे ही अपने सिनेमाई अवतार को चुनेंगे। ऐसा न होता तो नितेश तिवारी अभी शूटिंग करके पहली किस्त दर्शकों के बीच जमा करवा चुके होते।

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