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जोकर को हीथ लेजर ने अमरत्व दे दिया

by ओम लवानिया
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जोकर को हीथ लेजर ने अमरत्व दे दिया और स्वयं दुनिया को अलविदा कह गए। तो वही, जोएक्विन फ़ीनिक्स ने अपने लेवल में बेहतर स्वरूप में जोकर की कहानी को विस्तार दिया।
जोकर की कल्पना भारतीय स्तर पर करें और देखें, कि आखिर जोकर से बेहतरीन मुलाकात कौनसा अभिनेता कर सकता है या कहे जोकर को मिले, उसे सुने, समझें और दर्शकों को उसका पक्ष सुना सकें। अर्थात जोकर भारत आकर ये न कहे, कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में उसके साथ केमेट्री जमाने वाला, साथ बैठकर मुँह चीर ले और मेकअप करके रोड पर निकल आए। ऐसा कोई अभिनेता है जो जोकर को अपनी बॉडी किराए पर दे सके, बदले में जोकर जो देकर निकले, उसे संभाले की शक्ति रखता हो। क्योंकि जोकर की दुनिया में जाने वाला कलाकार रातें काली कर लेता है तब जोकर समझ में बैठता है।
यकीन न हो।
तो हीथ लेजर को जगाकर पूछ लें, जोकर को बॉडी स्पेस देकर खुद उठ न सकें। जोकर की मुलाकात का नशा इतना गहरा हो गया कि दुनिया को भुलाने पर मजबूर कर दिया। हीथ भी तो जोकर को कहाँ छोड़ना चाहते थे, उसके आवेश से बाहर न निकल सके।
जिन शर्तों के साथ जोकर निकलता है और कलाकार से बॉडी ट्रांसफॉर्म करता है न, भारत में सिर्फ़ एक ही अभिनेता है जो जोकर की सनक को बखूबी संभालकर दर्शकों के बीच रखे।
नाना पाटेकर! अरे यार इन्हें फिल्मों में तो देखा ही है यशवंत, शक्ति द पावर, अग्निसाक्षी, परिंदा, नटसम्राट आदि…लेकिन 1995 का फ़िल्म फेयर अवार्ड की क्लिप देखी थी जब नाना को क्रांतिवीर के लिए बेस्ट एक्टर अवार्ड मिला। उस स्पीच को देखकर दंग रह गया, नाना के अंदर यक़ीनन कोई किरदार बैठा हुआ था, जो साथ आकर क्रांतिवीर के लिए ट्रॉफी पकड़े था। पिछली फिल्म हो या करंट शूटिंग कर रहे हो, फ़िल्म फेयर के मंच पर कतई नाना न थे। होश नाना का था लेकिन उनकी बॉडी के भीतर कोई और बैठा था, डरे-सहमे और मासूम दिखलाई दे रहे थे। फिर उनके वर्तमान मीडिया इंटरव्यू पर गौर किया। ज़मीन आसमान का फ़र्क दिखाई दिया। बेबाक और आत्मविश्वास से भरे नजर आते है। ऐसा भी न था 1996 में नाना नए थे। 1978 में सिल्वर स्क्रीन पर पहला किरदार रख चुके थे। 18 वर्ष बड़ी बात है, यहाँ 5 वर्ष में तीन हिट में चौड़े होने लगते है।
कोई पश्चिमी लेखक नोलन सरीखा, बढ़िया फिलॉसफी के साथ ग्रे शेड किरदार से नाना को मिलवाने आए। अच्छी तरह किरदार और कहानी की ब्रीफिंग दे दी जाए और फिर निर्देशक उनसे किरदार को निकलवाए, माइंड ब्लोइंग, किरदार सामने होगा। नाना को कमाल के किरदार मिले है और वे उनसे अद्भुत परिवेश में मिलकर लौटे है लेकिन…लेकिन! इतने शानदार कलाकार का बेस्ट अबतक नहीं निकला है।
सबसे असल है किरदार की फिलोसॉफी, जोकर को नोलन ने जो फिलोसॉफी दी थी, हीथ ने उसके इर्दगिर्द जोकर को डार्क नाईट दी थी। तभी दर्शकों के दिमाग में जोकर के कथन व उसका स्टाइल चस्पा है। महज अच्छे डायलॉग से अधिक महत्वपूर्ण है कि आपके किरदार का बेस क्या है, आधार को व्यवस्थित लिख दिए तो डायलॉग स्वतः निकलते आएंगे।
किरदार को डिटेल में लिखकर, कहानी में अच्छे से इम्प्लीमेंट करना चाहिए, तभी किरदार व कलाकार परफेक्ट इन्वॉल्व होंगे। ऐसे कई लेखक है जो वक्त लेकर कहानी व किरदार को शेप देते है।
पिछले दो दशक में नाना को राजनीति में कुछ ढंग का किरदार मिला था लेकिन बहुत सांकेतिक भर रहा…लेखक मल्टीस्टारर में अधिक चेहरे की वजह से नाना के किरदार को मेंटेन न कर सके। ऐसा कर जाते तो राजनीति का बढ़िया प्रीक्वल निकलकर आता, अनीस बज़्मी ने उदय शेट्टी लिखा ठीक था परंतु फिलोसॉफी पर ज्यादा ध्यान देते तो उम्दा रिजल्ट निकलता…
राजू हिरानी की 3 इडियट्स में हर किरदार को डिटेल मिला है, कोई किरदार ऐसे ही कल्ट न हो जाता है, उसके पीछे लेखक की सिटींग होती है।
खामोशी में नाना को संजय लीला ने जोसेफ़ लिखा था, ऐसे राजू कोई किरदार नाना को देवें…

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