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IIMC भर्ती पर उठे सवाल

by Ashish Kumar Anshu
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अजीतजी समेत आधा दर्जन मित्रों ने आईआईएमसी में हुई नियुक्तियों पर सवाल उठाने वाला एक लेख वाट्सएप किया था। इन सारी नियुक्तियों के बाद से ही इस प्र​काशित लेख की प्रतीक्षा थी मुझे। चूंकि कुछ वेबसाइट का जन्म ही इन्हीं कामों के लिए 2014 के आस—पास हुआ है। मुझे आश्चर्य भी हो रहा था कि इतने दिन निकल गए, अभी तक कोई खबर नहीं आई। क्या आनंद प्रधान सर का नेटवर्क अब इतना कमजोर हो गया?
चूंकि आईआईएमसी से कोई भी खबर बाहर आती है, तो ना जाने क्यों सबसे पहले सबकी नजर आनंदजी पर ही जाती है! जबकि मोदी सरकार में आनंदजी की जितनी मदद हुई है, वह पिछली किसी सरकार में नहीं हुई है। यह जानकारी लीक होने के बाद नियुक्तियों पर सवाल उठाने वाली वेबसाइट कहीं आनंदजी की प्रतिबद्धता पर सवाल ना उठा दे!
यह सच है कि 2014 के बाद मोदी का चमत्कार पूरे देश पर चला। मोदी के जफर सरेशवाला जैसे विरोधी भी उनके प्रशंसक हो गए। 2014 से पहले राकेश उपाध्याय हों या फिर विनीत उत्पल। आप उनकी तमाम रिपोर्ट देखिए। उनकी रिपोर्ट्स वेबसाइट विशेष पर 3000 शब्दों में लिखे लेख पर अट्टाहस कर रही होगी।
अब कुछ नया लिखने का कोई इरादा नहीं है। पिछली नियुक्तियों पर उठे सवाल पर मेरी टिप्पणी पढ़िए। इसे ही नई नियुक्तियों पर उठाए जा रहे सवालों पर मेरा लिखा माना जाए।
”आईआईएमसी में नियुक्तियों से ठीक पहले दो नामों को लेकर दिल्ली से लेकर भोपाल तक चर्चा थी। एक दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका हैं और दूसरे आईआईएमसी के वर्तमान डीजी के करीबी मित्र बताए जाते हैं। संयोगवश इन दोनों का चयन इस बार आईआईएमसी में नहीं हो पाया। इससे इतना तो स्पष्ट है कि संस्थान ने चयन की प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती है। जिस तरह पांच लोगों का पैनल बनाया गया। उसमें यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार एक अनुसूचित जाति से आने वाले शिक्षक शामिल थे। अब नियुक्तियों पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं, उन्हें मेरिट पर सवाल उठाना चाहिए। चयनित लोगों के मेरिट पर बोलने के लिए उनके पास कुछ नहीं है तो वे विचारधारा पर सवाल उठा रहे हैं।
कब तक विचारधारा के नाम पर मीडिया विशेष से ताल्लूक रखने वाले कांग्रेसी इको सिस्टम के वामपंथी पत्रकार अकादेमिक क्षेत्र पर वामपंथियों का कब्जा सुनिश्चित कराते रहेंगे। लंबे समय तक जेएनयू से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय तक में खुलेआम यह खेल चला कि वमापंथी होना चयन की पहली शर्त होती थी। कोई संस्थान पारदर्शी तरीके से चयन प्रक्रिया को पूरा कर रहा है और झूठ फैलाने वाले गिरोह को कुछ नहीं मिल रहा तो व्यक्तिगत लाक्षण पर उतर आए हैं। यह सारे काम सोशल मीडिया पर हुआ करते थे, अब मुख्य धारा की मीडिया कहलाने वाले अखबार भी इसमें शामिल हैं। यहां तो दिल्ली विश्वविद्यालय में राजद की राजनीति करते—करते लोग राज्यसभा जा रहे हैं। अम्बेडकर की राजनीति करने वाले कैम्पस में जमीन कब्जा कर रहे हैं।
इससे किसी वायर—टायर एक्सप्रेस को परेशानी नहीं है। लेकिन एक व्यक्ति तमाम संघर्ष के बाद अपने लिए लुटियन दिल्ली के एक प्रतिष्ठित संस्थान में जगह बनाता है तो उनको परेशानी हो जाती है।आईआईएमसी सूचना प्रसारण मंत्रालय के अन्तर्गत आता है। कांग्रेस सरकार ने अपने इको सिस्टम वाले सारे वामपंथी शिक्षक संस्थान में भर दिए। आज तक किसी को फिक्र नहीं हुई कि विचारधारा विशेष के लोग यहां ऊपर से नीचे तक भरे रहेंगे तो वह पत्रकार बन कर निकलेंगे या वामपंथ के कैडर? इस बार एक चयनित पत्रकार ऐसे भी हैं, जिनके फेसबुक दीवार पर सरकार की आलोचना में पोस्ट दर पोस्ट मिल जाएगा। लेकिन मुझे पता है कि ऐसे चयनित शिक्षक का जिक्र प्रोपगेन्डा पत्रकार नहीं करेंगे क्योंकि इससे उनका नैरेटिव जो बिगड़ जाएगा।आईआईएमसी में थोड़ा संतुलन बन रहा है, इसका स्वागत कीजिए।
कांग्रेस के वामपंथी इको सिस्टम की गंदगी धीरे—धीरे यहां साफ हो रही है। यहां वामपंथ के कैडर की जगह पत्रकार बनाने की जमीन तैयार हो रही है। स्वागत कीजिए। आर्गनाइजर में काम करना अपराध नहीं है। जिन प्राध्यापक पर यह सवाल उठाया गया है। उनके संबंध में यह तक पता नहीं किया गया कि वे हिमाचल प्रदेश केन्द्रिय विश्वविद्यालय की अपनी नौकरी छोड़कर आईआईएमसी में आ रहे हैं। जिस पिछड़े समाज का हिमायती बनने का दावा लेफ्ट लिबरल मीडिया करता है, वे उसी समाज से आते हैं। चयन की पूरी प्रक्रिया को संस्थान ने पारदर्शी रखा है। यदि पारदर्शी ना होता तो चयन समिति से लेकर आईआईएमसी डीजी के कई करीबी लोग चयन प्रक्रिया में बैरंग ना लौट गए होते।”

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