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अबे सुन बे जस्टिस !

दयानंद पांडेय

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ऐ जस्टिस , निराला की एक कविता अबे सुन बे गुलाब की तर्ज पर जो कहूं , अबे सुन बे जस्टिस , मी लार्ड सुनते-सुनते तेरा दिमाग बहुत ख़राब हो गया है। तू मानसिक रुप से बहुत बीमार हो गया है। तुझे कोई सज़ा भी नहीं दी जा सकती। क्यों कि मानसिक रुप से बीमार लोगों को सज़ा नहीं दिए जाने का वसूल तेरा ही बनाया हुआ है।
सो तुम्हें रिटायर होने तक दिल्ली के शाहीनबाग़ , तुर्कमान गेट , या ऐसे ही किसी मुस्लिम बहुल इलाक़े की किसी गंधाती गली के किसी जहन्नुम जैसे घर में सपरिवार रहने की हिदायत दी जाती है। अपनी बेग़म को हिजाब में रख। वहीं रह कर सुबह-शाम ले के रहेंगे आज़ादी ! जैसे नारे सुबह , शाम लगाओ।
या फिर भारत सरकार कश्मीर में किसी मुस्लिम बहुल इलाक़े में तुम्हारे लिए रिहाइश का इंतज़ाम करे। और रोज दिल्ली आने-जाने की हवाई व्यवस्था करवा दे। हफ्ते के दो दिन की छुट्टियों शनिवार और रविवार को कश्मीर में ही सपरिवार ले के रहेंगे आज़ादी ! नारा लगाओ। बहुत मन करे तो हैदराबाद में सपरिवार किसी मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहो।
या फिर दुनिया के किसी भी मुस्लिम बहुल इलाक़े में कुछ दिन सपरिवार गुज़ारो। पता लग जाएगा , आग कैसे और कौन लगाता है। तुझ जैसे कमज़र्फ़ की सारी मानसिक परेशानी न दूर हो जाए तो बताना। तुझ जैसे मतिमंदों का इलाज किसी मुस्लिम बहुल इलाक़े में ही रख कर बेहतर किया जा सकता है। यह गारंटी है।

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