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कल्पनातीत..

सतीश चंद्र मिश्रा

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वास्तविक महानायकों के संघर्ष त्याग बलिदान की ऐतिहासिक सफलताओं पर पर्दा डालने की 6-7 दशक लंबे सुनियोजित सुसंगठित कांग्रेसी षड्यंत्रों की धज्जियां आज उस प्रधानमंत्री ने एकबार फिर उड़ा दीं जिसका जन्म गुजरात के एक छोटे से गांव वडनगर के एक निर्धन विपन्न परिवार में हुआ और जिसकी शिक्षा दीक्षा साधारण सामान्य सरकारी स्कूल में हुई है। जबकि उपरोक्त षड्यंत्र 70 साल तक उन राजनेताओं, सत्ता के दलाल बुद्धिजीवियों, पत्रकारों द्वारा रचे जाते रहे जो दुनिया के नामी गिरामी ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के अहंकार के नशे में धुत्त रहते थे, आज भी रहते हैं।

आज देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान पर देश के निर्विवाद महानायक नेता जी सुभाषचन्द्र बोस की प्रतिमा को सम्मान पूर्वक स्थापित कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन सारे षड्यंत्रों को धूल धूसरित कर दिया है। आज जिस स्थान पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गयी है उस स्थान को ब्रिटिश साम्राज्य ने अपने राजा जॉर्ज पंचम की प्रतिमा के लिए भारत मे सर्वाधिक उपयुक्त स्थान के रूप में चयनित किया था। अनुमान लगाया जा सकता है कि उस प्रतिमास्थल का क्या महत्व है। आज नेताजी की प्रतिमा वहां स्थापित कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के निर्विवाद महानायक को उनकी 125वीं जयंती पर देश की तरफ से कैसा सम्मान और श्रद्धांजलि दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज पहली बार ऐसा नहीं किया है। आज से 3 वर्ष पूर्व 2018 में भी उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के क्रांतिकारी जीवन के उस स्वर्णिम ऐतिहासिक अध्याय को देश और दुनिया के समक्ष धूमधाम से उजागर किया था जिसे गुमनामी में रखने की कांग्रेसी कोशिशों को धूर्त राजनेताओं, सत्ता के दलाल बुद्धिजीवियों, पत्रकारों द्वारा 70 सालों तक जमकर समर्थन और सहयोग दिया गया था।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ जापानी सेना का सहयोग कर रही थी। भारत की आजादी की लड़ाई में जापान भी नेताजी का समर्थन कर रहा था। जापान की फौज के साथ मिलकर आज़ाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों से छीनकर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर कब्जा कर लिया था। 21 अक्टूबर, 1943 को नेताजी ने आजाद हिंद सरकार बना ली थी। 7 नवंबर, 1943 को जापान ने आधिकारिक रूप से अंडमान-निकोबार द्वीप नेताजी की सरकार को सौंप दिया था। सुभाष चंद्र बोस ने 30 दिसंबर, 1943 को पहली बार अंडमान-निकोबार की धरती पर अपना झंडा फहराया। भारत की भूमि पर स्वतन्त्र भारत का यह पहला ध्वजारोहण था। अतः 30 दिसम्बर 1943 का दिन हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। लेकिन यह स्वर्णिम अध्याय कभी हमारी पाठ्य पुस्तकों में स्थान नहीं पा सका। कितने मित्र इस अध्याय से परिचित हैं.? इसके बजाय आज़ाद भारत की कई पीढ़ियों को 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की कहानियों को इतने तामझाम के साथ पढ़ाया/मनाया जाता था मानो 1942 का वह आंदोलन नहीं हुआ होता तो देश आजाद ही नहीं होता।

आज़ाद हिन्द फौज के संघर्ष तथा कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन की सच्चाई ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट ऐटली ने इन शब्दों में बयान की थी…..
“1947 में जिस समय भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह मर चुका था और उसकी ऐसी कोई प्रासंगिकता या भूमिका नहीं रह गयी थी जिसने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया हो। इसके बजाय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की गतिविधियों/कार्रवाइयों, जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को बुरी तरह हिला दिया था तथा तत्कालीन भारतीय नौसेना के बगावती तेवरों ने ब्रिटिश शासकों को यह अहसास करा दिया था कि, अब उनके दिन पूरे हो चुके हैं।”

ध्यान रहे कि यह स्वीकारोक्ति किसी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे या किसी संघी इतिहासकार की नहीं है। बल्कि 1947 में ब्रिटेन की जिस सरकार ने ब्रिटिश संसद में भारत को आज़ादी देने का फैसला किया था उस ब्रिटिश सरकार के मुखिया, ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली की है। भारत में एटली की इस स्वीकारोक्ति के गवाह कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश और 1956 में बंगाल के गवर्नर रहे पीवी चक्रवर्ती थे। जस्टिस पीवी चक्रवर्ती के हवाले से प्रधानमंत्री एटली की यह स्वीकारोक्ति अखबारों की सुर्खियों में छा गई थी। तत्कालीन ब्रिटिश संसद में भारतीय स्वतंत्रता को लेकर हुई बहस में भी एटली ने इन्हीं कारणों का उल्लेख विस्तार से किया था।

 

लेकिन जिस अंडमान की भूमि पर नेताजी ने भारतीय स्वतंत्रता का शंखनाद करते हुए स्वतन्त्र भारत का पहला ध्वजारोहण किया था वहां 75 वर्षों तक भारत के किसी प्रधानमंत्री ने जाकर ध्वजारोहण करने की आवश्यकता ही नहीं समझी। 1968 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस ऐतिहासिक और स्वर्णिम अध्याय की रजत (25वीं) व 1993 में स्वर्ण (50वीं) जयंती के अवसर पर भी किसी प्रधानमंत्री ने वहां जाकर ध्वजारोहण करने की आवश्यकता नहीं समझी। लेकिन उसी अंडमान में भारतीय नौसेना के दो-दो युद्धपोतों पर अपने ससुराल वालों और फ़िल्म स्टार मित्र अमिताभ बच्चन के परिवार के साथ सपरिवार लम्बी छुट्टियां बिताने वाले भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी कभी यह फुर्सत नहीं मिल पाई की 30 दिसम्बर को वहां ध्वजारोहण करते।
पिछले वर्ष 2018 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस ऐतिहासिक और स्वर्णिम अध्याय की हीरक जयंती थी। सुखद संयोग है कि इस अवसर पर देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेन्द्र मोदी बैठे हुए थे। परिणामस्वरूप उस स्थान पर 150 फुट की ऊंचाई पर लहराते हुए भारतीय तिरंगे वाला भव्य स्मारक बना तथा 30 दिसम्बर 2018 को 75वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं ध्वजारोहण कर नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा 30 दिसम्बर 1943 को लिखे गए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक स्वर्णिम अध्याय के भव्य स्मारक को देश को समर्पित किया।

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