Home लेखक और लेखअजीत सिंह कहानी है 1975 की ।

कहानी है 1975 की ।

by Ajit Singh
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एकदम सत्य घटना है ।
यानी तब मैं दस साल का था ।
हम चंडीगढ़ के पास चंडीमंदिर Cantt में रहा करते थे ।
पिता जी की नियुक्ति उन दिनों जिस बटालियन में थी वहां एक आम का बगीचा था जिसमे सैकड़ों पेड़ थे आम के ।
ये भारतीय सेना कि एक Animal Transport कंपनी थी जिसमे सुदूर दुर्गम China Border पे तैनात हमारी सेना को रसद और जरूरी साजो सामान पहुंचाने के लिये फौज अपने खच्चर घोड़े पालती थी ।
इस कंपनी को AT कंपनी कहा जाता था ।
अग्रिम चौकियां शिमला से आगे कारछम में थीं ।
कारछम के आगे फिर सड़क नही थी सो रसद घोड़े खच्चर ले जाते थे । पिता जी उंस इलाके की दुर्गम सड़क के बड़े भयावह किस्से सुनाया करते थे ।
उसी दुर्गम इलाके से एक बार फौजी भाइयों को एक अनाथ रीछ का बच्चा मिल गया था ।
वो उसे उठा लाये यहां नीचे , चंडीगढ़ base camp में ।
अब छोटा सा भालू का बच्चा …… भूख लगती तो एकदम बच्चों की तरह चीख चीख के रोता था ।
अब बेचारे फौजी परेशान ।
कहीं से खोज के एक Feeding Bottle लाये ।
वो पूरी रेजिमेंट का लाडला
सबकी गोदी में चढ़ जाता ।
कभी किसी की रजाई में घुस जाता तो कभी कूद के CO साहब की जीप में चढ़ जाता ……
चुपके से CO साहब के office में घुस के उनके टेबल के नीचे दुबक जाता , और जब वो आते तो पैरों में लिपट जाता ।
बहुत जल्दी वो इतना बड़ा हो गया कि उसका लाड़ दुलार अब भारी पड़ने लगा । वज़न बढ़ के एक क्विंटल हो गया ।
इतना बड़ा भालू आपसे लिपट के दुलार करे तो आपको भारी पड़ ही जायेगा ।
फिर उसे एक पेड़ से बांधने का system बनाया ।
बाद में बात ब्रिगेडियर साहब तक पहुंची ।
एक दिन वो Inspection पे आये तो इनसे भी मिले ।
ये सिरिमान जी उनके पैरों से लिपट गए ।
छोड़े ही न ।
फिर ब्रिगेडियर साहब के आदेश पे उसे Zoo में छुड़वाया गया ।
सो उसी Unit का ये भी किस्सा है ।
आम के बगीचे में पेड़ों की कोटर में हज़ारों तोते रहते थे ।
ऐसी ही एक कोटर से एक तोते का बच्चा गिर पड़ा ।
कव्वे उसे खाने झपटे तो एक फौजी भाई ने भाग के उठा लिया ।
अब क्या करें ?
पिता जी उसे घर ले आये ।
हमको तो खिलौना मिल गया ।
हम सब भाई बहन उसी में मगन ।
अभी इतना छोटा था कि शरीर पे एक भी रोआं न था ।
चने की दाल भिगा के कुतर के उसके मुह में डालते ।
और उससे ढेर सारी बातें करते ।
नाम रखा — गंगा राम
धीरे धीरे बढ़ने लगा ।
पिंजरा कोई था नही सो खुले में ही रहता ।
इतना बड़ा हो गया कि अब हमारी थाली से ही अपने आप खाने लगता ।
धीरे धीरे पंख भी आने लगे ।
अब हम उसे कपड़े सुखाने वाली तार पे या अपनी उंगली पे बैठाते तो पंख फड़फड़ाता । तार पे भी Balance बनाने की कोशिश करता ।
धीरे धीरे पंख में इतनी ताकत आ गयी कि हवा में उड़ा देते तो पंख फड़फड़ाता जमीन पे उतर आता ।
अब हम उसे बाहर खुले मैदान में ले जा के उड़ाते ।
वो उड़ता और हमारे कंधे पे बैठ जाता ।
घर पे तिमंजले से छोड़ते तो 100 – 200 मीटर की flight ले के लौटता । बहुत जल्दी उड़ना सीख गया ।
अब तो लंबी लंबी उड़ान पे जाने लगा ।
फिर एक दिन ….. मौसम खराब था …… बारिश हो रही थी ….. गंगाराम सुबह करीब 8 बजे उड़े …… दोपहर दो बजे तक नही लौटे । बाहर बारिश हो रही । हम सब परेशान । 4 बज गए तो उसी बारिश में भीगते खोजने निकले ।
इलाके में हर पेड़ पे खोजते , नाम ले के बुलाते ।
कोई एक घंटे बाद , एक पेड़ से हमारी पुकार पे जवाब दिया ….. देखा तो एक डाल पे बैठे , भीगे हुए ठिठुर रहे ।
पेड़ पे चढ़ के उतारा , घर लाये ।
घंटे भर में बाल पंख सूखे तो Normal हुए ।
फिर जब तक मौसम खराब रहा , उसे बंद ही रखा ।
अब उड़ जाते और घंटा दो घंटा तफरीह करके लौटते ।
एक दिन सुबह के गए शाम को लौटे ।
वो भी अकेले नही …… पूरे गिरोह के साथ आ के सामने तार पे बैठे थे । तब तक हम भी expert हो गए थे ।
सैकड़ों के झुंड में भी उसे पहचान लेते ।
बुलाया तो उड़ के कंधे पे आ बैठे ।
हम उन्हें घर ले आये ।
बाकी झुंड उड़ गया ।
अगले दिन उड़े तो शाम तक नही आये ।
हमने बहुत खोजा पर कहीं नही मिले ।
फिर तीसरे दिन न जाने कहाँ से उड़ते आये और कंधे पे बैठ गए ।
हम फिर घर ले आये ।
अगले दिन उड़े तो फिर कभी नही लौटे ।
करीब दो हफ्ते बाद एक झुंड में दिखे ।
सामने तार पे बैठे थे ।
हमने पहचान लिया ।
बहुत बुलाया ….. पर नही आये ।
उड़ गए ।
यही नियति है।
यही संसार का नियम है ।

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