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कुछ कट्टरपंथी, कुछ सिरफिरे

Ranjana Singh

by रंजना सिंह
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कुछ कट्टरपंथी, कुछ सिरफिरे,,,,ऐसा जबतक हम मानते रहेंगे गरदनें रेती जाती रहेंगी।इलाज करने को बीमारी समझनी होगी।सत्य स्वीकारना होगा कि उस किताब पर आस्था रखने वाले,उसकी जद में रहने वाले हरेक के लिए यह उनका प्राथमिक,सबसे पहला फर्ज़ है।
जिसमें हिम्मत नहीं,जिसे अवसर नहीं मिलता,वही इस फर्ज से चूक रहा है,अन्यथा अपने पै गम बर का प्रिय बनने को हरेक म जज़्बी फर्ज के इस कर्ज़ को अदा करेगा।
इनके निकट उठता बैठता प्रत्येक हिनू जान ले कि वह धारदार चाकू की नोक पर बैठा है जो कभी भी उसकी गरदन पर बस पहुँचा ही पहुँचा।
और हाँ, आप कुछ भी कर दें उनकी सुख सुविधा के लिए,उन्हें कोई भी स्वर्ग पकड़ा दें,उनकी पिपासा रक्त से ही बुझेगी। अपना धार्मिक फर्ज़ निभाकर ही वे सन्तुष्ट और सुखी होंगे।
एक वाक्य में- मानवता का युद्ध पिशाचत्व से है।मानवी तरीकों से न जीते जा सकेंगे।स्मरण रहे,करुणामयी सृष्टि की जननी को भी रक्तदन्तिका बनने को विवश होना पड़ा था।

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