Home अमित सिंघल घरेलु कार्य में हाथ बटाना ही नारी का असली सशक्तिकरण है।

घरेलु कार्य में हाथ बटाना ही नारी का असली सशक्तिकरण है।

Amit Singhal

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एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि जापान में कामकाजी महिला एक सप्ताह में औसतन 25 घंटे घर में कार्य करती है, जबकि उसका पति घरेलु कार्य में पांच घंटे से कम योगदान देता है।
जापान हो या भारत, एक महिला को छोटे बच्चे संभालना, उन्हें नहलाना, सुलाना, बच्चो का लंच बॉक्स पैक करना, उन्हें खिलाना और स्कूल छोड़ना, उनका होमवर्क करवाना, उनके झगड़े सुलझाना, घर साफ करना, कपड़े धोना, बिस्तर बिछाना, खाना बनाना, बाजार से दैनिक जीवन में खाने और प्रयोग होने वाला सामान लाना पड़ता है। इसमें मैंने बर्तन धोने या कपड़े प्रेस करने के बारे में लिखा ही नहीं है।
तभी अधिकतर महिलाओ को फेसबुक पे हम पुरुषो की तरह लम्बी-लम्बी पोस्ट लिखने का समय नहीं मिलता।
अधिकतर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों को घरेलु कार्य के लिए आंशिक मदद मिल जाती है, जैसे कि कोई सेवक (मुझे नौकर शब्द का प्रयोग मानवीय गरिमा के सन्दर्भ में उचित नहीं लगता) घर की सफाई और बर्तन साफ़ कर देता है। धोबी कपड़े प्रेस कर देगा. बागवानी के लिए माली और टॉयलेट की सफाई के लिए भी मदद मिल जाती है। सब्जी भी ठेलेवाला घर के द्वार पे दे जाता है।
लेकिन अमेरिका में, वह भी न्यू यॉर्क में, ऐसी सुविधाओं के लिए कम से कम प्रति घंटे 20-25 डॉलर या लगभग 2000-3000 डॉलर महीने का पारिश्रमिक प्रति दिन कुछ घंटे के काम का देना पड़ेगा। अतः सारा कार्य स्वयं करना पड़ता है।
कुछ वर्षो से पत्नी कार्यालय के कार्य में अत्यधिक व्यस्त है और सफलता की सीढिया चढ़ती जा रहीं है। कभी ग्रांट या निजी/सरकारी अनुदान का प्रस्ताव लिख रही होती है जो अगर स्वीकृत हो गया तो अमेरिकी सरकार से करोड़ो रुपये का अनुदान रिसर्च के लिए मिलेगा, जिससे वह अपने कार्य के लिए डॉक्टरों और लैब असिस्टेंट को नौकरी दे सकती है, इक्विपमेंट खरीद सकती है तथा रिसर्च सम्बन्धी ट्रवेल कर सकती है।
फिर पिछले दो वर्षो से एक पुस्तक को मुख्य लेखक के रूप में एडिट कर रहीं थी। साथ ही, एक वरिष्ठ लेखक के रूप में दर्ज़न से अधिक लेख जो एकेडेमिक जर्नल में प्रकाशित हो चुके है।
परिणामस्वरूप, पिछले तीन वर्षो से लगभग 12-14 घंटे प्रतिदिन का परिश्रम। शनिवार-रविवार को भी यही स्थिति थी।
अतः घर संभालने की जिम्मेवारी पूर्णतया मेरे पास आ गयी।
रोज रात को और शनिवार-रविवार को खाना बनाना, वह भी दाल, चावल या रोटी, सब्जी, पास्ता, पिज़्ज़ा, थाई करी, चाइनीज़ भोजन, पूड़ी-तरकारी जैसे पकवान, बर्तन डिशवाशर में (बर्तन धोने की मशीन; लेकिन इसमें कड़ाही, कुकर, तवा और भगौने साफ़ नहीं होंगे), शर्ट की कालर और बांहे घिसना, कपड़े धोने और सुखाने के लिए मशीन में लगाना, बाथरूम और टॉयलेट की सफाई, ग्रोसरी (परचून) स्टोर और बाजार से शॉपिंग, सब मैं कर रहा हूँ। पत्नी शनिवार-रविवार को कुछ देर के लिए हाथ बटा देती है।
मेरा अनुमान है कि सप्ताह में औसतन 25 घंटे घर में कार्य कर रहा हूँ, जबकि पत्नी का घरेलु कार्य में पांच घंटे से कम योगदान है।
नारी का यही असली सशक्तिकरण है।
जब पत्नी की पुस्तक विश्व के टॉप पब्लिशर Springer से प्रकाशित होकर मई में आयी, तो देखा कि पत्नी ने acknowledgement में प्रतिदिन स्वादिष्ट भोजन पकाने के लिए मेरा आभार व्यक्त किया है।

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