Home हमारे लेखकआशीष कुमार अंशु घातक है आंदोलनों में निवेशकों की बढ़ती भूमिका और कम होती पारदर्शिता

घातक है आंदोलनों में निवेशकों की बढ़ती भूमिका और कम होती पारदर्शिता

by Ashish Kumar Anshu
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जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे सिंधु बॉर्डर से किसानो का टेंट उखड चुका होगा किसान जा चुके होंगे लेकिन उनके पीछे यह सवाल रहे जायेगा की जिस मुकेश को उनके बीच जिन्दा जला दिया गया दलित दलवीर सिंह जिसको टुकड़ो में काट कर हत्या की गयी वह बेटी जो पश्चिम बंगाल से आंदोलन में शामिल होने आयी थी और उसका किसानो के टेंट में बलात्कार हुआ उसके परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी क्या अब आंदोलन के नेता लेंगे  आंदोलन से जुड़े योगेंद्र यादव के बयान से यह बात भी सामने आयी की बंगाल की बेटी के साथ हो रहे अत्याचार की जानकारी किसान नेताओ को थी 

 

अधिकांश देशवाशियो का मानना है की सिंधु बॉर्डर पर किसानो के टेंट में सिर्फ पश्चिम बंगाल की निर्भया के साथ ही नहीं बल्कि लाखो किसानो के विश्वास के साथ बलात्कार हुआ | धीरे धीरे इन डिज़ाइन आंदोलन जीवियो से असली किसान दूर हो रहे थे और किसान बिल के विरोधियो के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे दिल्ली की सीमा पर विरोधियो का रास्ता रोक कर मुट्ठी भर किसानो ने ज़िद कर के जिस तरह लाखो लोगो की जिंदगी अस्त व्यस्त कर रखी थी यह किसी आंदोलन के नहीं बल्कि आंदोलन के नाम पर पक रहे किसी षडयंत्र के लक्षण थे | खालिस्तान समर्थक मो धालीवाल आईएसआई के लिए काम करने करने वाला पीटर फेड्रिक , मोनिका गिल , प्रीति कौर गिल , आसीस कौर, क्लायडिया वेबवे जैसे भारतीय विरोधियो के बीच भारत में किसान आंदोलन का चेहरा बने राकेश टिकैत को देखना क्या किसी भारतीय को पसंद आ सकता है 

 

जब प्रधानमंत्री द्वारा तीन कृषि क़ानून निरस्त होने की घोषणा हुई उसके बाद २२ नवम्बर २०२१ को कौर किसान नाम के संगठन की ओर से एक अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया गया इसमें भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता टिकैत के अलावा ये सभी खालिस्तान और आई एस आई समर्थक भी शामिल हुए 

 

गुपचुप तरीके से हुए वेबिनार की यह खबर कभी सामने नहीं आ पाती | यह जानकारी वेयर इज़ प्रूफ नाम के एक ट्विटर हैंडल और आप इंडिया नाम की खोजी वेबसाइट की वजह से सार्वजनिक हो पायी इस वेबनार में हुए सवांद के सम्बध में जिस तरह की जानकारी सामने आ रही है उससे यही लगता है की राकेश टिकैत कथित आंदोलन के पुर्जा मात्र है इस आंदोलन को चलाने के लिए खर्चा किसी और का है और राकेश टिकैत जिस बयान को मीडिया के सामने पढ़ रहे है वह परचा भी किसी और का है

 

ज़ूम मीटिंग से जिस संगठन की ओर से ये मीटिंग आयोजित की गयी थी उस कौर फर्म की मेजबान राज कौर ने टिकैत की खूब तारीफ की खालिस्तान ओर आई एस आई के हक़ में यदि राकेश काम करेंगे तो उनके बीच प्रशंशा ही पाएंगे | २६ जनवरी २०२१ को लाल किले के प्राचीर पर राकेश टिकैत समर्थको का चढ़ जाना ओर दिल्ली में जगह जगह हिंसा ओर अराजकता फ़ैलाने की खबर आना , कौन भूल सकता है ? उसके बाद ये आंदोलन ख़तम मान लिया गया था लोकतान्त्रिक मूल्यों का हवाला देकर प्रारम्भ हुए आंदोलन के पास इतनी हिंसा फ़ैलाने के बाद आंदोलन के जारी रखने का कोई नैतिक आधार नहीं बचता था | लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद यह आंदोलन जारी रहा 

 

नाटकीयता के होने से पहले एक बात हुई थी जिसकी चर्चा दिल्ली में मीडिया वालो के बीच हुयी लेकिन यह खबर रिपोर्ट नहीं हुयी | यदि वेबिनार का ऑडियो ओर स्क्रीन शॉट आप इंडिया के पास नहीं होता तो यह महत्वपूर्ण खबर भी रिपोर्ट नहीं हो पाती जनवरी महीने की अंतिम तारीख को यह बात सामने आयी की राकेश टिकैत आंदोलन को  ख़त्म करने के पक्ष में थे लेकिन देश की सरकार को अस्थिर करने का यह आंदोलन जिनका यह टूलकिट है ऐसे लोग राकेश के टेंट में आये थे उनके जाने के बाद ही राकेश टिकैत मीडिया के सामने आकर रोये ओर लेफ्ट लिबरल मीडिया अचानक सक्रिय हो गयी ऐसा लगा की जिस आंदोलन ने नैतिक समर्थन खो दिया था , उसे खालिस्तान ने एक बार फिर खड़ा कर दिया | यदि राकेश टिकैत के टेंट में सी सी टी वी कैमरा होता तो यह खबर भी सिर्फ चर्चा में नहीं रहती संभव है की इसे प्रमादिक आधार  मिल जाता 

 

जब तीन कृषि क़ानून निरस्त हो गए तब भी राकेश टिकैत आंदोलन ख़त्म न करने के लिए मजबूर थे ऐसा उनके बयानों से लग रहा था मानो उन्होंने वर्ष २०२२ ओर वर्ष २०२४ तक किसानो के नाम पर प्रदर्शन के लिए किसी संगठन से एडवांस ले रखा हो  तीन क़ानून निरस्त होने के बाद भी राकेश टिकैत ने ख़ुशी नहीं जताई वे अधिक दुखी दिखे | अब उनके अजेंडे से तीन कृषि क़ानून का मुद्दा हट गया | अब वे ऍम एस पी प्रदर्शन करियो की मौत जैसे विषयो के साथ मैदान में आ डटे थे सरकार इन मुद्दों को सुलझाने की पहल कर रही है , दूसरी तरफ राकेश जिन  लोगो के साथ ज़ूम मीटिंग कर रहे है वो लोग उस मुद्दों को उलझने की उन्हें नयी नयी तरकीब बता रहे है 

 

दिल्ली के किसानो की वापसी हो रही है लेकिन राकेश टिकैत जैसे इनके  नेता अपनी प्रासागकिता  बनाये रख्नने के लिए फिर से सक्रिय होंगे | जब आंदोलन किसी परिवर्तन की जगह फंडिंग एजेंसी का टूल बन जाये तो वह देश ओर समाज दोनों के लिए घातक बन जाता है आज के समय में आंदोलन समाज के दम पर नहीं बल्कि ऍनजीओं ओर फंडिंग ऐजेन्सी के भरोसे टिके है ऐसे में जो निवेश करेगा वह आंदोलन में अपनी चलाएगा  आंदोलन में प्रारम्भ हुई यह परंपरा बहुत खतरनाक है यदि आंदोलनों के लेन देन की पारदर्शिता नहीं रहेगी फिर आंदोलनकर्मी साफ़ सुथरी राजनीति की मांग किस मुँह से कर सकते है 

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