Home लेखक और लेखअवनीश पी ऍन शर्मा जब तक देश के ‘पटल’ पर रहे, ‘अटल’ रहे :

जब तक देश के ‘पटल’ पर रहे, ‘अटल’ रहे :

Awanish P. N Sharma

by Awanish P. N. Sharma
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अटलजी ने अपने जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की थी। ‘वीर अर्जुन’ के संवाददाता रहे। बाद में ‘राष्ट्रधर्म’ लखनऊ में भी रहे। अटलजी ‘वीर अर्जुन’ के आरंभिक संवाददाता थे। ‘वीर अर्जुन’ में सरदार भगत सिंह ने भी काम किया था। कम लोगों को ये जानकारी है कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ जब अटलजी पहली बार कश्मीर दौरे पर गए तो उस दौर में जो कुछ हुआ, कैसे श्यामाप्रसादजी को रोका गया, उन्होंने उसे अपनी आंखों से देखा। अटलजी ने कहा कि अपने ही राष्ट्र में जाने से अपने एक राजनेता को कैसे रोका जा सकता है! इसे लेकर वे विचलित हो उठे थे। श्यामाप्रसादजी नेहरूजी के मंत्रिमंडल में भी रहे थे। अटलजी पर इस बात का गहरा प्रभाव पड़ा।

संसद में एक बार अटलजी ने लिए किसी ने कहा कि वे आदमी तो अच्‍छे हैं, लेकिन पार्टी ठीक नहीं है। इस पर अटलजी ने अपने भाषण में कहा भी था कि मुझसे कहा जाता है कि मैं आदमी तो अच्‍छा हूं, लेकिन पार्टी ठीक नहीं है। मैं कहता हूं कि मैं भी कांग्रेस में होता अगर कांग्रेस विभाजन की जिम्मेदार नहीं होती। यूं तो वे भी पुराने कांग्रेसी थे। पहले सभी कांग्रेसी थे। आरंभिक दिनों में विजयाराजे सिंधिया भी कांग्रेस में थी, जिवाजीराव सिंधिया भी कांग्रेस में थे। कांग्रेसी इस आरोप का उत्तर नहीं दे पाएंगे, क्योंकि कांग्रेस ही शायद कांग्रेस का इतिहास नहीं जानती।

अटलजी भारतीय राजनीति में एक अनूठे नक्षत्र हैं। यहां तक कि जब अटलजी पहली बार संसद में पहुंचे तो उनका भाषण सुनकर नेहरूजी ने कहा था- यह नौजवान नहीं, मैं भारत के ‘भावी प्रधानमंत्री’ का भाषण सुन रहा हूं। ये बात उनके बायोडाटा में लिखी हुई है। ये बात कहना कोई साधारण बात हनीं है। यह एक दृष्टा की दृष्टि है। हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है। बात ये है कि प्रतिभा की परख प्रतिभा ही कर सकती है। नेहरूजी ने पहले ही दिन देख लिया कि भारत का भावी प्रधानमंत्री बोल रहा है। अटलजी प्रधानमंत्री बने, एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने जवाहरलालजी और इं‍दिराजी के रिकॉर्ड को भी तोड़ा। भारत में ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ, शायद कोई हो, जो तीन-तीन बार प्रधानमंत्री बने।

अटलजी का राजनीति में कभी कोई ग्रुप था ही नहीं। अटलजी को भगवान राम की तरह हैं जिनके पास हनुमान भी अपना नहीं किसी और का है। हनुमान सुग्रीव के थे। मसलन- प्रमोद महाजन थे, जो लालकृष्ण आडवाणी के आदमी माने जाते थे, मगर भगत रहे अटलजी के।अटलजी के जो सबसे बड़े सलाहकार थे वे कांग्रेस के दिग्गज नेता द्वारकाप्रसाद मिश्र के बेटे थे। अटलजी के सबसे अच्‍छे मित्र थे शहाबुद्दीन, जिन्हें अटलजी राजनीति में लाए, वे आईएफएस और मुसलमान हैं। विश्व में किसी राजनेता का ऐसा नै‍तिक साहस है कि, बिल क्लिंटन का भी नहीं, कि किसी से उनके क्या संबंध हैं, आध्यात्मिक संबंध, प्रेम संबंध या भावनात्मक संबंध, वे सब जगजाहिर हैं।

श्रीमती शीला कौल जो उनके साथ रहती थी। आप इसे मित्रता कहे, प्रेम संबंध कहें, मीरा का संबंध कहें, या फिर राधा का संबंध कहें, लिव-इन-रिलेशन कहें, लेकिन सभी को सहमत होना होगा कि वे जो करते थे, खुलकर करते थे। वही करते, जो उन्हें उचित लगता। कृष्ण की तरह करते, जैसे कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी के होते हुए राधा के संबंध को छुपाया नहीं। एकमात्र शीलाजी रही, जो सुख-दुख में उनके साथ खड़ी थी। लेकिन किसी ने इसे देखा नहीं। हिन्दुस्तान के किसी राजनीतिज्ञ ने, प्रेस ने इस विषय को उठाया भी नहीं, कि प्रधानमंत्री आवास में एक महिला भी रहती है। कांग्रेस क्या, कोई पार्टी क्या, कोई मीडिया क्या, ये मुद्दा कोई इसलिए नहीं उठा पाया, क्योंकि ये जो सज्जन थे जवाहरलाल नेहरू के साले, कमला नेहरूजी के भाई थे उन्हीं की पत्नी थीं श्रीमती कौल। कांग्रेस इस मुद्दे को उठा नहीं सकती थी, लेकिन प्रेस ने भी नहीं उठाया।

अटलजी का ‘चरित्र’ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनके चरित्र पर कोई धब्बा नहीं है। उसके बावजूद उन्होंने अशोक सिंहलजी के डांटने पर एक बार संसद में कहा था कि, ‘मैं कुंआरा तो हूं ब्रह्मचारी नहीं।’ इसे कहने के लिए बेहद नैतिक साहस चाहिए। प्रो. रज्जू भैया ने भी कहा था कि ये कहने के लिए बहुत नैतिक साहस चाहिए। लेकिन अशोक सिंहलजी को ये बात बुरी लगी थी। उन्होंने कहा- ये क्या कोई कहने वाली बात है कि ‘मैं कुंआरा तो हूं ब्रह्मचारी नहीं यानी चरित्रहीन हूं।’

अटलजी के अनुभव या कहें कि एक्सपीरिएंस विद ट्रुथ पर आज तक कोई बात नहीं हुई। शायद ही कोई कर पाए। फिर भी उन्होंने देखा जाए तो ये सब कहा। ये हिम्मत की बात है। साहस का विषय है कि भारत की राजनीति में पहला पुरुष था जिसके घर में एक महिला मित्र थी। उस महिला से उनसे उनका क्या रिश्ता है ये पूछने का साहस किसी के पास नहीं था!

राजनीति में उनका कोई गुरु नहीं था जबकि लोग कहते हैं कि उनके गुरु ‘अमुक’ रहे हैं। कभी लोग बलराज मधोक को बता देते हैं। लोग कहते हैं कि मधोकजी ही उन्हें जनसंघ में ले आए जबकि पहले से ही बलराज मधोक उन पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे जनसंघ में ‘कांग्रेस के एजेंट’ थे। जनसंघ में वे ‘जवाहरलाल नेहरू के आदमी’ थे। जनसंघ के संस्थापक मधोकजी रहे और तीन बार प्रधानमंत्री बने अटलजी! तो इस आदमी में कोई न कोई खूबी तो ऐसी होगी। अटल विहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति एकमात्र व्यक्ति थे जिनके पास शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे लोग भी मौजूद थे तो जॉर्ज जैसे तुनकमिजाज भी उन्हें अपना गुरु मानते थे।

अटलजी कवि भी थे। ‘झींगा मछली’ भी खा लेते थे। मदिरापान भी कर लेते थे। भांग भी खा लेते थे और इसे स्वीकार भी करते थे। भांग खूब खाते थे। उज्जैन से उनके लिए भांग आती रही। मिठाई खाने के शौकीन थे। अस्वस्थ और घुटने के दर्द के बाद भी अपना दर्द जुबान पर नहीं आने देते तो शायद उनकी शक्ति ‘विजया’ रही होगी।

गोविंदाचार्य कहा कि अटलजी एक ‘मुखौटा’ हैं। बाहर कुछ और, और अंदर कुछ और। अंदर से कठोर ‘संघी’ हैं। मगर वे ऐसे होते तो राम जन्मभूमि पर ‘मंदिर’ ही बना देते। अगर उन्होंने मंदिर नहीं बनने दिया तो अशोक सिंहल का विरोध भी खूब सहा। उनकी लोकप्रियता अपार है। उसी से पार्टी जमी और टिकी रही, और ऊपर उठती गई। जनाधार का मतलब कि वो अकेले ऐसे नेता नहीं थे कि उनके नाम पर एक पार्टी, जैसे आप कह सकते हैं कि महात्मा गांधी के नाम पर कांग्रेस खड़ी कर सकते हैं। हालांकि जनसंघ या बीजेपी से अटलजी को माइनस कर दिया जाए, तो ये पार्टी उस दौर में भी मृतप्राय: हो जाती। ये पहला आदमी था जिसने अपने राजनीतिक विरोधियों को गले लगाया। दुनियाभर की विचारधारा वाले लोगों को अपने साथ जोड़ा। क्या पासवान, क्या शरद यादव, क्या ममता बनर्जी, क्या जयललिता, क्या जॉर्ज फर्नांडीस और क्या नितीश कुमार? अटल विहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व की ये जो विराट उदार-हृदयता थी, वहीं उन्हें अटल बनाती है। और जब तक देश के ‘पटल’ पर रहे, वे ‘अटल’ रहे।

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