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कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास भाग – 2

Mann Ji

by Mann Jee
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अभी तक आपने कृष्ण जन्मभूमि का इतिहास भाग -1 में कृष्ण की जन्मभूमि पर कुछ लोगो ने विवाद उत्पन्न किया था जिनमे से कुछ के नाम आपने पढ़े अब आगे


बुंदेला राजा बीर सिंह देव

ओरछा में राजा बीर सिंह देव जिन्हे कई जगह नर सिंह देव भी लिखा गया है – अकबर काल में अकबर की गुड बुक्स में नहीं थे – तत्कालीन ओरछा राजा राम शाह ने उन्हें पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। बीर सिंह जी ने सलीम उर्फ़ जहांगीर से संधि की और अबुल फज़ल को खुदा के पास पहुंचाया – जहांगीर के कहने पर। जब सलीम जहांगीर बना तो उसने ओरछा का राज्य बीर सिंह देव के सुपुर्द कर दिया। चूँकि बीर सिंह देव ने जहांगीर का सबसे बड़ा काँटा अबुल फज़ल हटाया था – वो राजा से बहुत खुश था। इस बात की पुष्टि स्वयं जहांगीर ने अपनी किताब जहांगीरनामा में की है। इस काण्ड को अकबरी दरबारी असद बेग ने अपनी किताब विकाया में भी लिखा है।

राजा बीर सिंह देव १६१४ में मथुरा गए थे और विश्रामघाट पर उनका तुला दान हुआ। स्वर्ण तुला दान में उनके वजन के अतिरिक्त ८१ और मन स्वर्ण उन्होंने उधर दान में दिया। जिस तुला में उनका वजन तोला गया था – कहते है वो तुला आज भी विश्रामघाट पर है। १६१८ में राजा बीर सिंह देव जी ने कृष्ण जन्भूमि पर केशव देव मंदिर बनवाया था – जहांगीर से इसकी इजाजत ली गयी – फरमान जारी हुआ और राजा जी के तेंतीस लाख रुपये की लागत से ये अद्भुत मंदिर तैयार हुआ। इस बात की पुष्टि निम्नलिखित स्त्रोतो से होती है :

    1. मासिर ए आलमगीरी : साक़ी मुस्तैद खान (ये औरंगेजब के मुंशी का चेला था )
      मथुरा के अँगरेज़ कलेक्टर १८८० मे – growse की पुस्तक – a डिस्ट्रिक्ट मेमॉयर
      इलियट और डॉसन वॉल्यूम सात
      ईस्टर्न स्टेट गजट वॉल्यूम ६ : इस पुस्तक के लेखक लुआर्ड ब्रिटिश भारत सेन्सस के फाउंडर मेम्बरान थे
      the न्यू कैंब्रिज हिस्ट्री – आर्किटेक्चर ऑफ़ मुग़ल इंडिया
      Enwhistle की पुस्तक ब्रज सेण्टर ऑफ़ कृष्णा पिल्ग्रिमेज
      खाफी खान की किताब muntakha al lubab में ये वाला चैप्टर पूर्ण रूप से गायब है – कदाचित जो वर्शन मेरे पास है – उनमे ये वाले चैप्टर मिसिंग है।

      औरंगजेब की मानस पुत्रियाँ रोमी Aunty,ऑड्री truschke, औरंगज़ेब के लाड़ले मानसपुत्र हबीब इस बात की भी बाक़ायदा पुष्टि करते है।

  • 1618में बना ये मंदिर राजा बीर सिंह जी ने तेंतीस लाख रुपये की लागत से बनवाया था – ये बात सौ प्रतिशत ऊपर दिए गए स्त्रोतों से कन्फर्म होती है।
    ये मंदिर तीन तिलंगे – टेवेर्निएर , मनूची और बेर्नियर ने देखा था – उन्होंने इस भव्य मंदिर का क्या वर्णन किया वो आप इस सीरीज की अगली कड़ी में पढ़ेंगे।
    इस मंदिर का विध्वंस औरंगेजब द्वारा 1661 में करवाया गया – यानी ५१ साल तक ये मंदिर रहा।

    आगे भी जारी रहेगा ….

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