Home विषयभारत निर्माण अनसंग हीरोज : इंदु से सिंधु तक -मतांतरण= राष्ट्रान्तरण

अनसंग हीरोज : इंदु से सिंधु तक -मतांतरण= राष्ट्रान्तरण

देवेन्द्र सिकरवार

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मैं ईश्वर के संदर्भ में संदेहवादी भले ही हूँ लेकिन हिंदुत्व से मुझे सीमातीत प्रेम है। इसलिये नहीं कि हिंदू परिवार में जन्म लिया बल्कि इसलिए कि ऋग्वेद से लेकर चामत्कारिक घटनाओं में गुंथे पुराणों तक और ऋषियों से लेकर आम हिंदू की उल्लासपूर्ण श्रद्धा व आस्था में मुझे जिस वैचारिक व क्रियात्मक स्वतंत्रता के दर्शन होते हैं वैसा संसार में अन्यत्र दुर्लभ है।

मेरे जैसा जन्मजात विद्रोही व्यक्ति केवल इसी वैचारिक स्वतंत्रता की परंपरा के कारण हिंदुत्व से गहन रूप से जुड़ा है, जिसे मेरे पूर्वजों यथा महारुद्रशिव, सुयज्ञ, राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, आदिशंकराचार्य ने स्थापित किया और पोसा है अन्यथा मैं कभी का इसे त्याग चुका होता।
इसका यह विरोधाभास मुझे चिढ़ाता भी है और मुग्ध भी करता है।

बनारस में ‘महादेsssव’ के उद्घोष के साथ स्वच्छंद रूप से ‘अबे भो@#% के’ जैसी उन्मुक्त गालियों का यह अद्भुत पैराडॉक्स मुझे ही नहीं फोर्ड से लेकर विल स्मिथ को हिंदुत्व की ओर खींचता आया है।

मुझे याद है ‘सांख्य संतो’ से मिलने की चाह मुझे कोलायत के साधुओं के सम्मेलन की ओर खींचकर ले गई लेकिन वहाँ की गंदगी व अव्यवस्था पर मेरी खिन्नता को लक्षित कर भाई अशोक सुथार ने एक गंभीर बात कही थी–

“अगर आप अनुशासन ऊपर से थोप देंगे तो भौतिक रूप से यहाँ सबकुछ अच्छा दिखेगा पर चारों तरफ बिखरा यह नैसर्गिक उल्लास तिरोहित हो जायेगा। अपना परिष्कार यह तंत्र स्वयं करे तभी वह इस उत्सव की आत्मा को बनाकर रख पायेगा।”

लेकिन जब मैं इतिहास की ओर देखता हूँ तो इस्लाम के उदय के बाद हिंदुत्व की यह शक्ति ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में दिखाई देती है।

केरल के चेर, पांड्य राजा हों या राष्ट्रकूट राजा, #फ्रोम_कैसरो हों या महाराज सूरजमल , हिंदुत्व के इन सभी शक्ति स्तंभों ने इसी विचार स्वतंत्रता की परंपरा के कारण इस्लाम के स्वरूप को ठीक से समझा ही नहीं और आज के हिंदू राजनेता भी नहीं समझ पा रहे हैं।

इस्लाम हिंदू सत्ता के सूर्योदय में तो वैचारिक स्वतंत्रता की छाया में छिपा रहता है और जैसे ही हिंदू सत्ता अंधकार में डूबती है वह हिंदुत्व के रक्षकों को काटकर उन्हें भी रक्तपिशाचों में बदल देता है।

ई स्लाम से मेरी वितृष्णा का मूल कारण यही है कि यह बेटे को बाप का, भाई को भाई का दुश्मन और अपनी ही बहन, बेटी को यौन दासी बना देता है।

न विश्वास हो तो अफगानिस्तान के ऋग्वैदिक काल से द्वाररक्षकों की भूमिका निभा रहे पठानों और बाद में मध्यएशिया से आये हिंदू व बौद्ध तुर्कों को देख लीजिये।

बारा तेगिन का वंशज बन गया सुबकतेगिन
,
गजनी के हिंदू बन गए महमूद गजनवी,
खलज बन गए अलाउद्दीन खलजी
हिंदू गोरी बन गए मुहम्मद गोरी,
सूर्य पूजक जूरी बन गए शेरशाह सूरी,
हिंदू अष्टक बन गये बर्बर खट्टक
हिंदू मधुमंत बन गये क्रूर मोहमद

और तो और गन्धर्ववंशी, अश्विनीकुमारों के उपासक #अश्वकायनों के नाम पर कहलाये गये ये #अफगान स्वयं को ऋग्वैदिक आर्य पूर्वजों को भुलाकर फलस्तीन से आये यहूदी कबीलों से जोड़ने में गर्व का अनुभव करने लगे।

जो काम अरब जैसे विश्वविजेता मुस्लिम न कर सके वह काम हिंदू से मुस्लिम बने इन तुर्कों व पठानों ने कर दिया। यह इस्लाम था जिसने इन्हें योद्धाओं से बर्बर चौपायों में बदल दिया। जिस घर के ये रक्षक थे उसी पर ये टूट पड़े। आज उन्हें छोड़िये, स्वयं हिंदुओं को अफगानिस्तान के इस इतिहास का पता नहीं तो उन्हें तो क्या ही पता होगा।

अगर हमें भारत को पुनः अखंड बनाना है,
हिंदुकुश पर भगवा सूर्यध्वज लहराना है तो,


सबसे पहले हमें इस्लाम की इस प्रवृत्ति व भुला दिए गए इतिहास को बच्चे-बच्चे को जानना होगा।
मेरी पुस्तक इसी दिशा का एक छोटा सा कदम भर है।

यह पुस्तक आपको बताती है, सावधान करती है कि कैसे इस्लाम ने अतीत में भारत के प्रथम द्वाररक्षक ऋग्वैदिक हिंदू पठानों को ही आक्रांता बना डाला और आज भी वही कर रहे हैं।

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