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जीवन एक यात्रा है : रोहित सरदाना की प्यारी सी बेटी नंदिका की कलम से

by Pranjay Kumar
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स्वर्गीय रोहित सरदाना की प्यारी सी बेटी नंदिका ने अपने 8 महीने के अनुभवों को एक कविता के माध्यम से बताने की कोशिश की है। सुनिये और महसूस कीजिये… क्योंकि “जीवन एक यात्रा है”। नंदिका ने जो कहा है, उसका भावार्थ कुछ यूँ है…
जीवन एक यात्रा है…
मेरी 11 साल की ज़िंदगी… किसी परी-कथा सी थी
8 महीने गुज़र चुके हैं… मैं भगवान से बहुत नाराज़ थी
मुझे लगा मेरे साथ नाइंसाफी हुई है… आखिर मेरे साथ ही क्यों ???
तब मेरी मां ने मुझे कहा… ऐसा सोचना स्वार्थ से भरा विचार है
हमारी तरह बहुत से लोग हैं… जो इसी तरह संघर्ष कर रहे हैं
सब अपना-अपना युद्ध लड़ रहे हैं
लेकिन किसी को अकेला छोड़ देना… इंसानियत नहीं हैं
आओ… हम सब एक दूसरे के साथी बनें
और मिलकर इस पथरीले सफर को पूरा करें
माना अभी बादल काले और गहरे हैं
लेकिन एक दिन सुबह होगी… रौशनी होगी !!!
नंदिका बिटिया की इस कविता को सुनने के बाद आज फिर  रोहित भाई बहुत याद आ रहे हैं। हम किन छोटी-छोटी बातों के लिए लड़ते-झगड़ते रहते हैं, कितना शिकायती हो जाते हैं और दुनिया उजड़ जाने के बाद भी लोग हैं, जो हौसला नहीं छोड़ते, देने का भाव रखते हैं। रोहित भाई की मृत्यु पर लिखा यह पोस्ट पुनः साझा कर रहा हूँ।
*उनकी मृत्यु की दुःखद सूचना मिलने पर यह लिखा था।*
 भावभीनी_श्रद्धांजलि
 रोहित_सरदाना जी आप बहुत याद आएँगें! आपकी सरलता व सहजता उससे भी अधिक याद आएगी!
मेरे जैसे अदना लेखक के लेख पर आपकी यह टिप्पणी कि ”आप छाए हुए हैं- चहुँ ओर’ मेरे वैशिष्ट्य को कम आपकी महानता एवं बड़प्पन को अधिक दर्शाता है।
आपके ऐसे बहुत-से संदेश अब मेरे जीवन की पूँजी हैं। अब स्वयं को बस इतना दिलासा देना है कि जाने वाले चले जाते हैं, पर उनकी यादें रह जाती हैं! जो कभी मधुरिम स्मृतियाँ बन तो कभी टीस बन भीतर उठती और पिराती हैं।
आप सदैव राष्ट्रीय भाव से ओत-प्रोत पत्रकारिता को जीते रहे। आपका अध्ययन विद्या-भारती के विद्यालय में हुआ। आपके पूज्य पिताजी विद्या भारती के आवासीय विद्यालय में प्राचार्य रहे। आपके दिल को सदैव यह बात कचोटती थी कि लोग हिंदी की खाते हैं, पर अंग्रेजी की गाते हैं।
मुझे अच्छी तरह याद है कि आप जब मेरे आमंत्रण पर एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर जोधपुर पधारे थे तो आपसे पूर्व के वक्ता (केंद्रीय मंत्री) अंग्रेजी में व्याख्यान देकर मंच से उतरे। सबको यही लग रहा था कि माहौल के अनुरूप आप भी अंग्रेजी में बोलेंगें। पर आपने यही से शुरु किया कि चूँकि यहाँ का माहौल अंग्रेजीमय है, इसलिए मैंने तय किया कि मैं हिंदी में ही बोलूँगा। यह मैंने इसलिए भी तय किया कि मैं हिंदी की खाता हूँ, हिंदी ने मुझे पहचान दी है, हिंदी के कारण आपने मुझे यहाँ मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। चूँकि कार्यक्रम देर तक खिंच गया था और आप अंतिम वक्ता थे। आपने 11.30 बजे से 11.50 तक सभा को संबोधित किया, पर मजाल क्या कि कोई अपनी जगह से उठ जाए! कार्यक्रम में एक केंद्रीय मंत्री भी थे। लोगों को उनका व्याख्यान भले याद रहा हो या नहीं, पर रोहित भाई की बातें दिल तक पहुँची और याद रह गईं। वैसे भी दिल से निकली बातें दिल तक पहुँचती हैं।
आप दो दिन हमारे यहाँ रहे। जब मैं आपको लंच के लिए जोधपुर के सबसे प्रसिद्ध होटल *उम्मेद पैलेस* के बाद दूसरे क्रम पर आने वाले वहाँ के सबसे बड़े होटल *ताज हरि महल* लेकर गया तो बोले कि प्रणय जी ‘यहाँ कोई अच्छा राजस्थानी खाना खिलाने वाला स्थानीय होटल नहीं है, वहीं ले चलिए।’ फिर हम उन्हें ‘जिप्सी’ ले गए। अभी कुछ दिन पूर्व सुबह-सुबह 7.00 बजे उनका कॉल आया-
*’ सर, उम्मेद पैलेस में एक मित्र को डिनर करवाना है। कैसे प्रबंध होगा?* मैंने प्रयास प्रारंभ ही किया था कि 9.30 बजे उनका फिर कॉल आया- *’हो गई है व्यवस्था।’* जो अपने लिए सादगी-सरलता का आग्रही था, वह मित्र की बारी आने पर सहयोग से क़दम पीछे न हटाता था।
मुझसे प्रायः कहते कि आपको *’आज तक’* पर पैनल डिस्कसन में बुलाना है, आपके लिए कौन-सा समय उपयुक्त रहेगा?’ कदाचित वह मुझे प्रोत्साहित करने के लिए यह मान देते हों! मित्रों-परिचितों की मदद का यह उनका अपना तरीका था।
मेरी पहली भेंट उनसे *’जी न्यूज़’* के स्टूडियो में हुई थी। बिना किसी पूर्व सूचना व संदर्भ के मिलने पहुँचा था, पर भागते हुए आए। उसके बाद तो जब भी मिला या पूर्व सूचना दी तो रास्ते भर कॉल कर पूछते रहते, ‘कहाँ पहुँचे?’ जब मैं नोएडा स्थित *जी न्यूज़* के स्टूडियो पहुँचता, वे मुझसे पूर्व से अतिथियों के लिए निर्धारित बैठक-कक्ष में मेरी प्रतीक्षा कर रहे होते। नामचीन एवं प्रसिद्ध व्यक्तियों को मिलने-जुलने वालों को घंटा-दो-घंटा इंतज़ार कराए अपनी प्रिसिद्धि का एहसास ही कहाँ होता है! पर रोहित भाई ज़मीन के आदमी थे। ज़मीन का दर्द और संघर्ष समझते थे। *कदाचित यह भी जानते थे कि मनुष्य का मनुष्य हो जाना ही उसकी चरम उपलब्धि है!*
प्रायः आयोजकों को लगता है कि अतिथियों को दी जाने वाली भेंट कोई बड़ी चीज या बड़ा आकर्षण होता है। बहुतों के लिए होता भी है। पर रोहित भाई ने मेरा यह भ्रम क्या खूब तोड़ा! जाते हुए वह ‘भेंट’ लेकर नहीं गए। न ही इसे लेकर कोई त्याग जैसा ढिंढ़ोरा पीटा। मैंने जब-जब उन्हें कॉल किया कि भाईसाहब आपका मोमेंटो आप तक पहुँचाना है। हँसकर यही बोलते रहे, अरे, कहीं रखा ही है, ले लेंगें, फिर कभी। वहीं रहने दीजिए। जब लेकर दिल्ली पहुँचा तो बोले, प्रणय भाई, जतलाना नहीं था, पर लेना भी नहीं था। अफ़सोस, रोहित भाई का वह मोमेंटो अब उन्हें कभी नहीं सौंपा जा सकेगा। पर उनकी यादें हमेशा ताजी रहेंगीं। अपने किसी मित्र के बच्चे का एडमिसन किसी आवासीय विद्यालय में कराना चाहते थे। अब जब सुन रहा हूँ कि उनकी बेटी उतनी ही बड़ी है, तो आभास हो रहा है कि मित्र का तो बहाना था, शायद वे अपनी बेटी के बारे में ही बात कर रहे थे! बहरहाल, जीवन की राहें हम कहाँ तय करते, तय तो कोई और ही कर रहा होता है!
वे अंतिम समय तक मेरे संपर्क में रहे। अभी रामनवमी पर उनसे बातचीत हुई थी। कुशल-क्षेम पूछने पर बोले सब राम की कृपा है। अब उसी कृपालु, करुणानिधि राम के पास कभी न लौटकर आने के लिए चले गए। कदाचित ईश्वर को भी अच्छे लोगों को बुलाने की शीघ्रता रहती है। पर रोहित भाई राष्ट्रीयता व सनातन संस्कृति की जो अलख पत्रकारिता जगत में जलाकर गए हैं, उसे अंतिम साँस तक न बुझने देना ही उनके प्रति हमारी सच्ची और अंतिम श्रद्धांजलि होगी।
अलविदा रोहित भाई……
आपका प्रणय..
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आप सबके शोक-संदेश आपकी संवेदना के परिचायक हैं। मैंने एक-एक को पढ़ा है, पर लाइक का बटन दबाना उचित नहीं समझा।
रोहित भाई की सरलता का परिचय देने के लिए मैंने उनके साथ हुई बातचीत को सार्वजनिक किया है। उन्हें सार्वजनिक करते हुए मुझे एहसास है कि किसी माँ ने अपना बेटा, किसी पत्नी ने अपना हमसाया और किसी बेटी ने अपना पिता खोया है!
आप सबकी संवेदना निश्चित दिवंगत आत्मा को शांति एवं शोक-संतप्त परिजनों को सांत्वना प्रदान करेगी। मनुष्यता को इससे अधिक विवश हम सबने कभी नहीं देखा। पर एक-दूसरे को धीरज और हौसला देते रहें। निराशा और हताशा हमें और तोड़ देगी।
जितना बन सके एक-दूसरे का सहयोग करते रहें। पारस्परिक सहयोग के बल कल पुनः हम विध्वंस में से खड़े होंगें और मनावीय जिजीविषा एवं जीवन की अजेयता का जयघोष करेंगें

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