Home नए लेखकओम लवानिया एक नजरिया आदिपुरुष के अंतिम टीजर पर

एक नजरिया आदिपुरुष के अंतिम टीजर पर

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पहली बात तो ये मैं हर उस कंटेंट के बारे में लिखता आया हूँ और आगे भी लिखूंगा जो सनातन व भारत की बात करेगा…असल घटनाक्रम को दिखलाएंगे, जिन्हें छिपाकर रखा गया। द कश्मीर फाइल्स, द केरला स्टोरी, अजमेर 1992, गोधरा, द ताशकेंट फाइल्स आदि।
इनका बॉक्स ऑफिस परिणाम कुछ भी रहे, कोई फ़र्क न है। लेकिन उन फ़िल्म मेकर्स को धन्यवाद जो अपने किसी भी मकसद से इन कंटेंट को सिनेमा में उतार रहे है। आखिर में बात तो हो रही है, विमर्श शुरू हुआ है।
ओम राउत की तानाजी देखी, तो तानाजी मालुसरे के बारे में जान पाया, छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के वीर योद्धा रहे…ऐसे ही 18 अगस्त 2020 के दिन राउत ने अपने अगले प्रॉजेक्ट की घोषणा की और इसके टाइटल में आदिपुरुष लिखा। तब भी लिखा था और हर अपडेट के साथ लिखता रहा हूँ। महीने भर से न लिख रहा हूँ।
पहला टीजर उम्मीदें तोड़ गया तो आलोचना स्वरूप लिखा, और 2-4 दिनों तक ख़ूब लिखा। जब इसके नए पोस्टर्स आने लगे, उनपर भी लिखा और पहला ट्रेलर अच्छा लगा तो लिखा, फिर लिखता रहा। कल जब फाइनल ट्रेलर आया तो बढ़िया रहा, कुछ डायलॉग व लुक ठीक न लगे तो सहमति न दिखाई।
राम कथा है।
सिनेमाई फॉर्मेट में है, यक़ीनन सिनेमाई लिबर्टी भी ली गई है। रामानंद सागर जी वाली राम कथा देखी है तो उस जैसी या तुलनात्मक बनाने का कोई औचित्य न है।
लेखक-निर्देशक ओम राउत ने इसे जापानी युगो के वर्जन को अडॉप्ट किया है और रेफरेंस में वाल्मीकि रामायण को रखा है। उनका विजन क्लियर है कि वे युवा को ऐसे फॉर्मेट में राम कथा सुनाने निकले है जिसे वे कनेक्ट कर सके। इसलिए राम सेना में वानर रखे है और सीजी किरदारों को मोशन कैप्चर दिया है।
जिसे पसंद न आ रही है मत देखिए। दबाव कौन डाल रहा है?
जरूरी थोड़े है सबका नजरिया समान हो…लेकिन एक बात तय है कि सोशल मीडियाई दौर में लोगों का कोई अपना स्टैंड न है। जहाँ फेसबुक दद्दा कंटेंट के इर्दगिर्द सकारात्मक व नकारात्मक पक्ष में लिख देते है तब वे उसी अनुरूप स्टैंड लेकर पॉजिटिव-नेगेटिव राय बना लेते है। अरे भाई, अपना नजरिया दूसरों को देखकर मत बनाओ…दूसरा हर सिनेमाई राम कथा को सागर जी वाली कंपेयर करोगे, कुछ ठीक न लगेगा।
और हां कार्टून वाली बातें सुनकर 1992 भारत सरकार को डर था। लोग युगो वाली राम कथा पर भड़क जाएंगे। जबकि वे सरकार को समझाते रहे कि एनीमेशन जापान में गंभीर कला है, लेकिन सरकार न समझ पाई और प्रोजेक्ट से हाथ पीछे खींच लिए थे। बाद में टीवी पर रिलीज हुई..
उसका कंटेंट व संगीत सुनिए, अद्भुत है।
जब युगो राम कथा बना रहे थे, तब लाइव एक्शन में बहुत सीक्वेंस पॉसिबल न थे। जबकि एनीमेशन का दायरा शुरू से विशाल रहा है।
मुझे टारगेट करके कुछ हासिल न होगा।
अपुन को फ़िल्म देखनी है परिवार व दोस्तों के साथ देखूंगा, उम्मीद के हिसाब से रही तो पुनः जाऊंगा…आप को प्रभाष में राम और देवदत्त में हनुमान न दिख रहे है तो घर बैठिए, दूसरे पर निशाना मत साधिए…कुछ लिख रहा हूँ तो पढ़ने को फोर्स भी नहीं कर रहा…जब तक आदिपुरुष जैसे कंटेंट सामने न आएंगे। तब तक आगे के ऐसे कंटेंट की कमियां और पॉजिटिव सिनेमाई तकनीक साइड कैसे मालूम होगी।
बाहुबली ने भारतीय सिनेमाई जगत में ट्यूटोरियल रूप में उदाहरण रखा है तो अन्य निर्माता प्रेरित होकर और फ्लोर पर जाने लगे है। जेम्स कैमरून ने मोशन कैप्चर टेक्नोलॉजी को दुनिया के बीच बड़े स्केल पर रखा तो पीटर जैक्सन व स्टीव स्पीलबर्ग ‘एडवेंचर ऑफ टिन टिन’ लेकर आए।
एजेंडा और वाहियात कंटेंट से इतर जो निर्देशक कोई कोशिश करेगा, तो उसके कंटेंट के बारे में अवश्य लिखूंगा…झूठे नैरेटिव से चिढ़ है। उसका बहिष्कार रहेगा…बाक़ी होगा वही जो राम रचि राखा… प्रभु श्रीराम को तय करने दीजिए, उनकी कथा है तो वे ही निर्णय लेंगे। आदिपुरुष कैसी है। आप काहे बिन देखें, जज बन रहे है।
बॉलीवुड फिल्म रहते, इसका प्री-रिलीज तिरुपति बालाजी प्रांगण में हुआ है, क्योंकि इससे डार्लिंग प्रभाष जुड़े है। वरना तो बॉलीवुडिया अजमेर दौड़ लागते दिखलाई देते है।

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