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ज्ञान व शोध की वास्तविक भूख बनाम तथाकथित विशेषज्ञता, तथाकथित शोध व बीमार इगो

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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बहुत लोग फेसबुक पर मिल जाते हैं जो किसी भी मुद्दे या विषय पर कुछ भी अंडबंड बोलते हैं। अपने पूर्वाग्रहों या पसंद-नापसंद या रोमांस के आधार पर तर्कों का तड़का लगाकर मनमर्जी कुछ भी ठेल देते हैं। पहले जैसे लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ने पर खुद को शोधार्थी व विशिष्ट मान लेते थे, वैसे ही चूंकि अब इंटरनेट है तो लोग विदेशी अखबारों में खबरें पढ़ने को शोध करना मान लेते हैं, खुद को विशिष्ट ज्ञानी मान लेते हैं। विदेशी अखबार तो सैकड़ों की संख्या में हैं, इसलिए ये लोग कुछ अखबारों को अपनी सहूलियत के हिसाब से चुन लेते हैं और इन अखबारों में खबरों को पढ़ने को गहरा व व्यापक शोध करना मान लेते हैं। और फिर उस आधार पर अपना एजेंडा सेट करते हुए, अपने पूर्वाग्रहों या पसंद नापसंद या रोमांस के आधार पर तर्क का तड़का लगाकर ठेलना शुरू कर देते हैं।
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दरअसल इन लोगों को लगता है कि जैसे भारत में अखबारों में संपादकीय पृष्ठों पर आलेख लिखने वालों को उन विषयों का धुरंधर ज्ञानी मान लिया जाता है (जबकि अधिकतर लोग जो लेख लिखते आए हैं, वे विशेषज्ञ होते ही नहीं, उनको विशेषज्ञों के रूप में प्लांट किया जाता रहा है)। वैसे ही पूरी दुनिया में होता है, इसलिए ये लोग अखबारों पर लेख भी नहीं खबरों को पढ़ने को ही शोध करना मान लेते हैं। इतना ही नहीं, अहंकार के साथ आपके साथ बहसबाजी भी करने को तत्पर रहते हैं।
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चीन, रूस व अंतर्राष्ट्रीय मामलों में तो ये लोग गजब ढाते हैं। ऐसा लगता है कि पूरा चीन, पूरा रूस वहां का व्यवस्था तंत्र की हर एक बात, सबकुछ ये लोग अपनी दिव्यदृष्टि से प्रतिक्षण देखते हैं, मजाल है कि इन दोनों देशों की कुल जनसंख्या लगभग पौने दो अरब लोगों में से कोई एक भी आदमी इनकी दिव्यदृष्टि से छूट जाए। ऐसा लगता है कि दुनिया के देश इन्हीं से पूछकर सबकुछ करते हैं। इन लोगों में एक बात सबसे कामन है वह यह कि वेस्टर्न मीडिया सबकुछ झूठ बोलता है, चीनी व रूसी मीडिया सबकुछ सही बताता है। जबकि इनके अपने खुद के परिवार वालों व बच्चों में से सब के सब वेस्टर्न देशों में ही जाना चाहते होंगे। जिन लोगों का जुगाड़ नहीं बन पाता है, वे मजबूरी में चीन व रूस का रूख करते हैं। लेकिन बकैती ऐसी कि रातदिन पानी पी-पी कर वेस्ट को गालियां देंगे। जबकि इन लोगों को आता जाता कुछ नहीं, कभी ढंग का अध्ययन नहीं करते हैं।
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सबसे बड़ी हास्यापद बात यह है कि अपने देश भारत में अधिकतर लोग वेस्ट के कुछ लोगों को चुन लेते हैं, यह चुनाव भी उसी तरह होता है जैसे कि अपना जनप्रतिनिधि का चुनाव करते समय करते हैं। मतलब जिसके बारे में बात की जाए उसको मतदान करना है। विश्लेषण मूल्यांकन इत्यादि का दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं।
कुछ गिनेचुने लोग हैं भारत में उन्हीं लोगों को सबकुछ मान लिया जाता है। हम भारतीयों को यही लगता है कि जैसे हमारे समाज में शोध नहीं होते हैं, जो बता दिया गया वह मान लेना है। जो सरकारी नौकरी पा गया वह प्रकांड योग्य, जो नहीं पाया वह लोफर व अयोग्य। उसी तरह दुनिया के हर देश में होता है।
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अरे भई जिस समाज ने दुनिया के आम लोगों को दिव्यदृष्टि, दूरदृष्टि, दूरश्रवण इत्यादि से संपन्न कर दिया। जिस समाज ने आम लोगों को हवा में उड़कर यात्रा करने लायक बना दिया। जिस समाज ने अंतरिक्ष में निर्वात में बड़े-बड़े शहरनुमा स्टेशन बना लिए। चंद्रमा पहुंच गए। खोज दिया कि लाखों सूर्य हैं। सूर्य चंद्र को भगवान मानने, स्वर्ग-नर्क की कल्पनाओं की चिंदी-चिंदी कर उड़ा दी।
वह समाज इतना मूर्ख है कि उस समाज ने केवल फ्रायड, सीमोन, ज्या पाल सात्र, कार्ल-मार्क्स ही पैदा किए। अरे ये लोग तो उस समाज की चिंतन प्रक्रिया का वेस्टेज हैं, जैसे कि होमियोपैथ एलौपैथ आधुनिक चिकित्सा की ओर बढ़ने की प्रक्रिया का वेस्टेज हैं। जिन लोगों को हम भारतीय अपने सर-माथे बैठाए रहते हैं। उनकी कुछ किताबें या कुछ पढ़कर उसी को पूर्ण मानकर अपना माइंडसेट, अपनी विचारधारा, अपने सोचने की दिशा, अपने तर्कों का चरित्र इत्यादि सबकुछ तय कर देते हैं। ये लोग पाश्चात्य समाज की चिंतन प्रक्रिया में खर-पतवार से अधिक की हैसियत नहीं रखते हैं।
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**चलते-चलते**
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हमें लगता है कि पाश्चात्य का समाज भी हमारी ही तरह ठहरा हुआ समाज है, इसलिए आज भी फ्रायड, ज्या पाल सात्र, सीमोन बोवर व मार्क्स इत्यादि पर खड़ा है। हमें तो यह तक पता नहीं कि इन फ्रायड, सात्र, सीमोन व मार्क्स इत्यादि के पहले भी इनसे अधिक धुरंधर पैदा हुए और इनके रहते हुए भी, और इनके बाद भी। ये लोग तो खर-पतवार हैं, जिनको पाश्चात्य समाज प्रक्रिया का बहुत ही छोटा हिस्सा मानता है। पता नहीं कितना पानी बह गया, पता नहीं कितना आगे के विचार आ गए, पता नहीं कितना शोध हो चुके, हमको लगता है कि दुनिया वहीं ठहरी हुई है। हमको लगता है कि जैसे हम ठहरे हुए जड़ समाज हैं, वैसे ही दुनिया के सभी समाज हैं।
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दरअसल हममें ज्ञान व शोध की असल भूख नहीं होती है। हम ज्ञान को प्राप्त करने की बजाय, अपने आपको दूसरों के सामने ज्ञानी के रूप स्थापित करने की क्षुद्र मानसिकता में अधिक जीते हैं। हमें ज्ञान की नहीं बल्कि खोखली प्रशंसा की भूख होती है।
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चूंकि हमें खुद को विद्वान दिखाना होता है, इसलिए हम एक आभामंडल क्रिएट करते हैं, और चूंकि हमें लगता है कि आभामंडल ही मुख्य तत्व है, इसलिए हम व्यापक व गंभीर शोध करने अपने अंदर ज्ञान के प्रति वास्तविक भूख जगाने की बजाय विभिन्न प्रकार की सत्ताओं या लिप्साओं द्वारा क्रिएट किए गए आभामंडलों से प्रभावित भी होते हैं, उसी को सच मान कर विश्वास भी करते हैं। हमारा बीमार इगो हमको दावे के साथ बताता है कि जैसे हम हैं, वैसे ही दुनिया के सभी लोग हैं, जैसे हम खोखले हैं वैसे ही शेष सभी हैं। जबकि ऐसा नहीं होता है।
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जिनको वास्तव में ज्ञान की भूख होती है, जिनको वास्तव में ऑब्जेक्टिव समझ की भूख होती है, वे अखबारों, खबरिया पत्रिकाओं इत्यादि को नहीं बल्कि सैकड़ों हजारों पेजों वाली गंभीर किताबें पढ़ते हैं, गंभीर शोध पढ़ते हैं। पारस्परिक विरोधी चरित्र वालों को पढ़ते हैं, जितनी भी दिशाएं हो सकती हैं, उनको पढ़ते हैं खंगालते हैं। वह भी निष्पक्ष भाव से मूल्यों के आधार, न कि अपने पूर्वाग्रहों अपनी पसंद नापसंद अपने रोमांस या पहले से तय किए गए एजेंडा को सही साबित करने की जद्दोजहद के लिए।
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हमें बहुत-बहुत-बहुत-बहुत ही अधिक ईमानदार व ऑब्जेक्टिव होना पड़ता है।

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