Home लेखक और लेखअजीत सिंह झूठ बोलना कामरेड का स्पेशलाइजेशन

झूठ बोलना कामरेड का स्पेशलाइजेशन

by Ajit Singh
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झूठ बोलना कामरेड का स्पेशलाइजेशन है… यह तो मालूम ही है. पर बड़ी बात झूठ बोलना नहीं है. बड़ी बात है दिलेरी से झूठ बोलना. बिना लाज शर्म के.
आज किसी ने टैग किया तो एक कामरेड की पोस्ट पढ़ी…सरकार सोना उगलने वाली सरकारी कम्पनी PDIL को बेच रही है… PDIL जो कि पूरे देश में उद्योग धंधे और इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने में जी जान से लगी है और उसके इंजीनियर और साइंटिस्ट दिन रात पसीना बहा कर काम कर रहे हैं.. सरकार ऐसे हीरे की खान को बेच रही है.
मैं तो सीरियसली सोच में पड़ गया, यह वही PDIL है जिसे मैं बचपन से जानता हूँ, जिसकी कॉलोनी में उम्र के 20 साल गुजारे हैं?
इसका हेडऑफिस तब सिन्दरी हुआ करता था, FCI के साथ में. दोनों की कॉलोनी एक ही थी. PDIL में काम करने वाला कोई भी आदमी कम से कम एमएससी, पीएचडी या एमटेक था. आप कह सकते हैं, यह वह जगह थी जहाँ इंटेलिजेंस और इंटेलेक्ट जाकर आत्महत्या करती थी.
औसतन साहब लोग साढ़े दस बजे ऑफिस जाते थे, साढ़े ग्यारह बजे वापस लंच के लिए आ जाते थे. फिर खाना खाकर, एक नींद मार कर तीन साढ़े तीन बजे तक मन मार कर फिर जाते थे, और सवा चार साढ़े चार बजे वापस. यह था PDIL के एक औसत साइंटिस्ट का जीवन. इतने सारे इंटेलीजेंट और क्वालिफाइड लोगों ने दो पैसे का इनोवेशन कर के दिया हो किसी ने नहीं सुना. हाँ, रिसर्च होता था
… कोई शेयर बाजार पर रिसर्च करता था, कोई पोस्ट ऑफिस की FD की रेट पर. कोई यह रिसर्च करता था कि अगर पीएफ से लोन लेकर बैंक में एफडी कर दिया जाए तो 0.5% की इंटरेस्ट का फायदा हो सकता है. किसी की विशेषज्ञता थी कि अगर 100 रुपये का बैंक ड्राफ्ट बनाने के बदले 50-50 रुपये के दो ड्राफ्ट बनाये जाएँ तो बैंक के कमीशन में 50 पैसे की बचत हो सकती है. अब ड्राफ्ट बनाने वाला आपसे कम नवाब तो था नहीं, SBI का था…तो वह एक बार में एक ही ड्राफ्ट का फॉर्म लेता था और दिन में 5 ही ड्राफ्ट बनाता था. तो कोई बात नहीं, दो बार लाइन लग लेंगे…हमको कौन सी टाइम की कमी है.
उन एमटेक और पीएचडी किये हुए लोगों के ऑफिस की सीढियों पर छत तक पान की पीक थूकी होती थी. छत तक कैसे? तो यह कम्पटीशन हुआ कि कौन सबसे ऊँचा थूक सकता है. एक ने बताया, किसी के ऑफिस में गया तो देखा, वह पीएचडी किया बन्दा डेस्क पर बने छेद में चवन्नी पिलाने का खेल बड़े ही कंसंट्रेशन से खेल रहा है.
कामरेड का बहुत बहुत धन्यवाद, मुझे आज पता चला कि समाजवाद का यह महान प्रयोग आज भी चल रहा है, इंटेलेक्ट की कत्लगाह में आज भी बुद्धि की हत्या हो रही है. और सरकार उसे बेच रही है…मुझे आश्चर्य सिर्फ यह है कि उसमें खरीदने लायक कोई वैल्यू बाकी भी है.
Dr राजीव मिश्रा जी की पोस्ट

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