Home चलचित्र डाई हार्ड 4.0 और भारतीय राजनीती | प्रारब्ध

डाई हार्ड 4.0 और भारतीय राजनीती | प्रारब्ध

लेखक - ओम लवानिया

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2007 में लाइव फ्री ओर डाई हार्ड या कहे डाई हार्ड 4.0 हॉलीवुड फिल्म आई थी। ब्रूस विलिस की डाई हार्ड फ्रेंचाइजी की चौथी क़िस्त थी।
इसकी कहानी में ग्रे शेड किरदार थॉमस गैब्रियल किरदार पूरे अमेरिका में तहलका मचा देता है, अमेरिका रुक जाता है। क्योंकि गैब्रियल आईटी सेक्टर को हैक कर लेता।
दरअसल, गैब्रियल यूएसए सरकार के पास जाता और उनकी आईटी सिक्योरिटी के लूप होल्स बतला देता है। यह देख सरकार भड़क जाती और गैब्रियल को जेल में डाल देती है। बस वही से उसका जयकांत शिकरे हर्ट हो जाता है, गैब्रियल मेंटल किस्म का नेचर रखता है और उसे अपनी वाहवाही पसन्द होती है। क्रेडिट का आपार भूखा…..
इसी रील किरदार को रियल में भारतीय राजनीति में देखे, तो हमें प्रशान्त किशोर यानी पीके के अंदर गैब्रियल नजर आएगा। इन्हें शॉर्टकट फॉर्मेट में भारतीय राजनीति का चमकता चेहरा बनना है। उसके लिए अच्छा नेटवर्क बना रखा है। पिछले दिनों स्वतः कांग्रेस को 2024 का फॉर्मूला बतला रहे थे, लेकिन उसमें राहुल गांधी का समीकरण सीमित कर दिया। मामला उसी वक्त खारिज हो चला। इतनी हिम्मत, पीएम इन वेटिंग का इक्वेशन नहीं रखा।
इस निरस्त माहौल के बाद पीके मीडिया में नजर आए और कई इंटरव्यू दे डाले। जहाँ पीके वहाँ बवाल निश्चित होता है।
इससे पहले महाराष्ट्र राजनीति के घाघ नेता शरद पवार से मिले, इधर, मीडिया में अपने अनुरूप ख़बरें चलवाई और ख़ूब अटेंशन खींचा। पीके पूरा तामझाम लेकर निकलते है।
अब ख़बरें है कि वे बिहार राजनीति में जनता के बीच माहौल बनाएंगे। यही तो महत्वाकांक्षा है बिहार का मुखिया बनना है। नए राजनीतिक दल से सालों लग जाएंगे। कोई जमा हुआ कैडर-संगठन मिल जाए, उसी की फिराक में है।
भाजपा से भी यही चाह थी, लेकिन मिली नहीं, भगा दिया।
पीके उसी माहौल को चुनते है जिसके जीतने की संभवना अधिक हो। ममता बनर्जी को पीएम का फॉर्मूला दिया और चने के झाड़ पर चढ़ाकर, राष्ट्रीय दल के तौर पर खड़ा करने के लिए गोवा विधानसभा चुनाव लड़वाया। टीएमसी ने अच्छा-खासा पैसा खर्चा, परिणाम में बाबा का ठुल्लू मिला।
पीके तेलंगाना में केसीआर के पाले में भी दस्तक दिए थे, उधर से भी गैब्रियल की तरह उल्टे पाँव लौटा दिया।
इनके कार्य में जितने भी फ़ॉर्मूले लगते है, नीतीश कुमार बिहार, अमरिंदर सिंह पंजाब, जगह रेड्डी हैदराबाद, ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में मोदी जी की ट्रिक ही लगाई है। पीके की अपनी कोई ट्रिक नहीं है। सब उधार पर लिए है।
पीआर कंपनियां मीडिया फ्रंट में आकर नहीं बोलती है। इनका कार्य पर्दे या कहे चेहरे के पीछे रहता है। रणनीति बनाते है। पीके इतने इंटरव्यू कर जाते है मानो कोई राजनीतिज्ञ कर रहा हो। इनके स्वभाव के कारण इन्हें कोई राजनीतिक दल स्थिरता न दे सका। सबने इन्हें बाहर करके अपने कुनबे को बचाया है।
पीके को कोई राजनीतिक दल बुलाता नहीं है, खुद जाते है। अपनी-अपनी कहते है, दांव पड़ जाता है तो ठीक है, काम मिल जाता है। बाकी अन्य दलों में प्रिजेंटेशन तलाशते रहते है।

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