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नरेन्द्र मोदी के जीवन पर मंडरा रहा खतरा

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नरेन्द्र मोदी के जीवन पर मंडरा रहा खतरा आज से कई गुना बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कांग्रेस पर जमकर कृपा बरसी हैं।

 

ध्यान से पढ़ें…..
प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश पर सुप्रीमकोर्ट ने आज एक नयी जांच कमेटी बना दी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की जांच समिति पर पंजाब सरकार की आपत्तियां मान लीं हैं। पंजाब सरकार की तरफ से केंद्र की जांच समिति की निष्पक्षता पर संदेह उठाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की कमेटी द्वारा की जा रही जांच पर रोक लगा दी है। पंजाब के पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई पर गहराई नाराजगी जताते हुए उस कार्रवाई पर भी रोक लगा दी है। अर्थात अब तक जो और जितने तथ्य सामने आये थे। जो भी कार्रवाई हुई थी उन सब पर पानी फेर दिया गया है।
आज के इस घटनाक्रम के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनायी गयी कमेटी की रिपोर्ट आने तक उन खालिस्तानी गुंडों और पंजाब की कांग्रेसी सरकार को क्लीनचिट मिल गयी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनायी गयी कमेटी अपनी रिपोर्ट कब तक देगी.? उस रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला कब सुनाएगा.? इसी साल सुनाएगा या 2-4 साल बाद सुनाएगा.? यह कोई नहीं जानता। लेकिन आज यह जरूर तय हो गया है कि प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश में शामिल रहा हर खालिस्तानी गुंडा तब तक बेखौफ खुलेआम घूमेगा। देश का प्रधानमंत्री अगर अब कल पंजाब जाए तो वो खालिस्तानी गुंडे बिल्कुल उसी तरह खुलकर अपनी उसी साज़िश को दोबारा अंजाम देने के लिए उसी तरह स्वतंत्र हो गए हैं, जिस तरह 5 जनवरी की साज़िश को अंजाम देने की कोशिश की थी। आज के बाद उन खालिस्तानी गुंडों को इसबात की खुली छूट मिल गयी है। पंजाब की कांग्रेसी सरकार को भी अब खुली छूट मिल गयी है। खालिस्तानी गुंडों को किसान बता कर चन्नी, सिद्धू और उसकी कांग्रेस उन गुंडों की दूसरी ऐसी साज़िश को साधारण सामान्य प्रदर्शन बता कर उसका सहयोग और समर्थन अब उसी तरह खुलकर कर सकती है, जिस तरह उसने 5 जनवरी को किया था। इस पूरे घटनाक्रम का अर्थ यह ही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जीवन पर मंडरा रहा खतरा आज से कई गुना बढ़ गया है। इस खतरे से देश का ध्यान हटाने के लिए खालिस्तानी गुंडों द्वारा जजों और वकीलों को धमकी वाली चिट्ठी भेजने का ड्रामा भी रच दिया गया है। लुटियन मीडिया उस चिट्ठी का ढोल जमकर बजाने में जुट गयी है ताकि प्रधानमंत्री की जान पर आज से कई गुना अधिक बढ़ गए खतरे की तरफ देश के लोगों का ध्यान ही नहीं जाए।
याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला पहली बार नहीं किया है। पिछले वर्ष 2021 में भी सुप्रीम कोर्ट ऐसा हो एक फैसला सुना चुका है। उसने 12 जनवरी 2021 को भारत सरकार के 3 कृषि कानूनों पर रोक लगा कर उनकी जांच के लिए भी कमेटी बना दी थी। उस कमेटी ने 2 महीने बाद 19 मार्च को अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप भी दी थी। लेकिन उस रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट 8 महीने (19 नवंबर तक) बाद तक चुप्पी साधे बैठा रहा था।
उन 8 महीनों के दौरान किसान आंदोलन के नाम पर खालिस्तानी गुंडों के कैंपों में हत्या भी हुई, बलात्कार भी हुआ, आत्महत्या भी हुई। किसान आंदोलन के नाम पर कुछ सौ या कुछ हजार गुंडे उन 8 महीनों के दौरान लाखों नागरिकों का रास्ता रोक कर उनका जीना भी रोज हराम करते रहे लेकिन सुप्रीमकोर्ट अपनी बनायी हुई कमेटी के निष्कर्षों पर खामोश रहा। आदेश के बजाए उपदेश और प्रवचन देता रहा। लेकिन किसान कानूनों पर कमेटी की रिपोर्ट पर सुनवाई और फैसला सुनाने की फुर्सत सुप्रीमकोर्ट को नहीं मिली। उन 8 महीनों के दौरान खालिस्तानी गुंडों द्वारा खुलेआम खेला जाता रहा हत्या आत्महत्या बलात्कार, रास्ता रोकने का खूनी खेल लगातार इस हद तक खौफनाक होता गया कि देश के प्रधानमंत्री को 19 नवंबर को उन 3 कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी जो इस देश के 11 करोड़ छोटे और गरीब किसानों का भाग्य बदलने जा रहे थे। यह बात मैं अपने किसी आंकलन या विश्लेषण के आधार पर नहीं कह रहा हूं। कृषि कानूनों की जांच के लिए बनी कमेटी के सदस्य रहे अनिल घनवट ने कृषि कानूनों की वापसी से आहत और क्षुब्ध होकर 24 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कमेटी के निष्कर्षों निर्णयों को वो सार्वजनिक करे। अनिल घनवट ने यह सच भी सार्वजनिक कर दिया था कि कमेटी ने तीनों कृषि कानूनों को किसानों के लिए लाभदायक पाया था। उनके पक्ष में निर्णय दिया था।
देश के लिए बहुत खतरनाक शर्मनाक संकेत संदेश यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आजतक देश को यह नहीं बताया है कि तीनों कृषि कानूनों की जांच के लिए उसके द्वारा बनायी गयी कनेटी द्वारा 10 महीने पहले सुप्रीम कोर्ट को दे दी गयी रिपोर्ट के निष्कर्ष निर्णय क्या हैं। इसी का नतीजा है कि खालिस्तानी गुंडे अब देश के प्रधानमंत्री के खून से होली खेलने पर उतारू हो चुके हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अब भी खामोश है… कोई फैसला लेने के बजाए केन्द्र सरकार के बनाए कानून, केन्द्र सरकार द्वारा की गयी जांच पर रोक लगाने और कमेटियां बनाने में व्यस्त है। परिणामस्वरूप खालिस्तानी गुंडे, उनकी हमदर्द कांग्रेस लगातार बेखौफ और निरंकुश होते जा रहे हैं। देश के भविष्य पर गम्भीर खतरे के बादल काले और घने होते जा रहे हैं।

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